Tuesday, March 25, 2014

प्रलय का शिलालेख - अनुपम मिश्र

सन् 1971 की जुलाई का तीसरा हफ्ता। चमोली जिले कि बिरही घाटी में आज एक अजीब सी खामोशी है। यों तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा है और इस कारण अलकनंदा की सहायक नदी बिरही का जल स्तर भी बढ़ता जा रहा है। उफनती पहाड़ी नदी की तेज आवाज पूरी घाटी में टकरा कर गूंज भी रही है। फिर भी चमोली-बद्रीनाथ मोटर सड़क से बाई तरफ लगभग 22 किलोमीटर दूर 6500 फुट की ऊंचाई पर बनी इस घाटी के 13 गांवों के लोगों को आज सब कुछ शांत सा लग रहा है। आज से सिर्फ सात बरस पहले ये लोग प्रलय की गर्जना सुन चुके थे, देख चुके थे। उनके घर, खेत व ढोर इस प्रलय में बह चुके थे। उस प्रलय की तुलना में आज बिरही नदी का शोर इन्हें डरा नहीं रहा था। कोई एक मील चैड़ी और पांच मील लम्बी इस घाटी में चारों तरफ बड़ी-बड़ी शिलाएं, पत्थर, रेत और मलबा भरा हुआ रास्ता है, इस सब के बीच से किसी तरह रास्ता बना कर बह रही बिरही नदी सचमुच बड़ी गहरी लगती है। लेकिन सन् 70 की जुलाई का तीसरा हफ्ता ऐसा नहीं था। तब यहां यह घाटी नहीं थी, इसी जगह पर पांच मील लम्बा, एक मील चैड़ा और कोई तीन सौ फुट गहरा एक विशाल तालाब था-गौना ताल। ताल के एक कोने पर गौना गांव था और दूसरे कोने पर दुमरी गांव, इसी लिए कुछ लोग इसे दुमरी ताल भी कहते थे। पर बाहर से आने वाले पर्यटक के लिए यह बिरही ताल था, क्योंकि चमोली-बद्रीनाथ मोटर-मार्ग पर बने बिरही गांव से ही इस ताल तक आने का पैदल रास्ता शुरू होता था। ताल के ऊपरी हिस्से मेें त्रिशूल पर्वत की शाखा कुवांरी पर्वत से निकलने वाली बिरही समेत अन्य छोटी-बड़ी चार नदियों के पानी से ताल में पानी भरता रहता था। ताल के मुंह से निकलने वाले अतिरिक्त पानी की धार फिर से बिरही नदी कहलाती थी। जो लगभग 18 किलोमीटर के बाद अलकनंदा में मिल जाती थी। सन् 70 की जुलाई के तीसरे हफ्ते ने इस सारे दृश्य को एक ही क्षण में बदल कर रख दिया।
दुरमी गांव के प्रधानजी उस दिन की याद करते है, ‘तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा था। पानी तो इन दिनों में हमेशा गिरता है, पर उस दिन की हवा कुछ और थी। ताल के पिछले हिस्से से बड़े-बड़े पेड़ बह-बह कर ताल के चारों ओर चक्कर काटने लगे थे, ताल में उठ रही लहरें उन्हें तिनकांे की तरह यहां से वहां, वहां से यहां फेंक रही थी। देखते-देखते सारा ताल पेड़ों से ढक गया। अधेंरा हो चुका था, हम लोग अपने-अपने घरों मेें बन्द हो गए। हम घबरा रहे थे कि आज कुछ अनहोनी होकर रहेगी।’ खबर भी करते तो किसे करते? जिला प्रशासन उनसे 22 किलोमीटर दूर था। घने अंधेरे ने इन गांव वालों को उस अनहोनी का चश्मदीद न बनने दिया, पर इनके कान तो सब सुन रहे थे। प्रधानजी बताते हैं, ‘रात भर भयानक अवाजें आती रहीं फिर एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई और फिर सब कुछ ठंडा पड़ गया।’ ताल के किनारे की ऊंची चोटियों पर बसने वाले इन लोगों ने सुबह के उजाले में पाया कि गौना ताल टूट चुका है, चारों तरफ बड़ी-बड़ी चट्टानें, हजारों पेड़ों का मलबा, और रेत-ही-रेत पड़ी है।
ताल की पिछली तरफ से आने वाली नदियों के ऊपरी हिस्सों में जगह-जगह भूस्खलन हुआ था, उसके साथ सैकड़ों पेड़ उखड़-उखड़ कर नीचे चले आये थे। इस सारे मलबे को, टूट कर आने वाली बड़ी-बड़ी चट्टानों का गौना ताल अपनी 300 फुट की गहराई में समाता गया, सतह ऊंची होती गई और फिर लगातार ऊपर उठ रहे पानी ने ताल के मुंह पर रखी एक विशाल चट्टान को उखाड़ फंेका और देखते-ही-देखते सारा ताल खाली हो गया। घटना स्थल से लगभग तीन सौ किलोमीटर नीचे हरिद्वार तक इसका असर पड़ा था। गौना ताल ने एक बहुत बड़ी प्रलय को अपनी गहराई में समा कर उसका छोटा सा अंश बाहर फेंका था। उसने सन् 70 में अपने को मिटा कर उत्तराखण्ड, तराई और दूर मैदान तक के हिस्से को बचा लिया था। वह सारा मलबा उसके विशाल विस्तार और गहराई में न समाया होता तो सन् 70 की बाढ़ की तबाही के आँकड़े कुछ और ही होतें। लगता है गौना ताल का जन्म बीसवीं सदी के सभ्यों की मूर्खताओं से आने वाले विनाश को थाम लेने के लिए ही हुआ था।
ठीक आज की तरह ही सन् 1893 तक यहां गौना ताल नहीं था। उन दिनों भी यहां पर विशाल घाटी ही थी। सन् 93 में घाटी के संकरे मुंह पर ऊपर से एक विशाल चट्टान गिरकर अड़ गई थी। घाटी की पिछली तरफ से आने वाली बिरही और उसकी सहायक नदियों का पानी मुंह पर अड़ी चट्टान के कारण धीरे-धीरे गहरी घाटी में फैलने लगा। अंग्रजों का जमाना था, प्रशासनिक क्षमता में वे 1970 के प्रशासन से ज्यादा कुशल साबित हुए। उस समय जन्म ले रहे गौना ताल के ऊपर बसे एक गांव में तारघर स्थापित किया और उसके माध्यम से ताल के जल स्तर की प्रगति पर नजर रखे रहे। एक साल तक वे नदियांँ ताल का पानी भरती रहीं।
जल स्तर लगभग 100 गज ऊंचा उठ गया। तारघर ने खतरे का तार नीचे भेज दिया। बिरही और अलकनंदा के किनारे नीचे दूर तक खतरे की घंटी बज गई। ताल सन् 1894 में फूट पड़ा, पर सन् 1970 की तरह एकाएक नहीं। किनारे के गांव खाली करवा लिए गए थे, प्रलय को झेलने की तैयारी थी। फूटने के बाद 400 गज का जल स्तर 300 फुट मात्र रह गया था। ताल सिर्फ फूटा था सिमटा नहीं था। गोरे साहबों का सम्पर्क न सिर्फ ताल से बल्कि उसके आसपास की चोटियों पर बसे गांवों से भी बना रहा। उन दिनों एक अंग्रेज अधिकारी महीने में एक बार इस दुर्गम इलाके में आकर स्थानीय समस्याओं और झगड़ों को निपटाने के लिए कोर्ट लगाता था। विशाल ताल साहसी पर्यटकों को भी न्योता देता था। ताल मे नावें चलती थी। आजादी के बाद के बाद भी नावें चलती रहीं। सन् 60 के बाद ताल से 22 किलोमीटर दूरी में गुजरने वाली हरिद्वार बद्रीनाथ मोटर-सड़क बन जाने से पर्यटको की संख्या बढ़ गई। ताल में नाव की जगह मोटरं-बोट ने ले ली। ताल में पानी भरने वाली नदियों के जलागम क्षेत्र कुंआरी पर्वत के जंगल भी सन् 60 से 70 के बीच कटते रहे। ताल से प्रशासन का सम्पर्क सिर्फ पर्यटन के विकास के के नाम पर कायम रहा-वह ताल के इर्द-गिर्द बसे 13 गांवों को धीरे-धीरे भूलता गया। फिर सन् 70 जुलाई का वह तीसरा हफ्ता आ गया। ताल फूट जाने के बाद सड़क पूरी करने की जरूरत ही नहीं समझी गई। सन् 1894 में गौना ताल फटने की चेतावनी तार से भेजी थी, पर 1970 में ताल फटते ही खबर लग गई। बहरहाल, अब यहां गौना ताल नहीं है, पर उसमें पड़ी बड़ी-बड़ी चट्टानों पर पर्यावरण का एक स्थाई शिलालेख खुदा हुआ है। इस क्षेत्र में चारो तरफ बिखरी चट्टानें हमें बताना चाहती हैं कि जंगलों खास कर नदियों के जलसंगम क्षेत्र में खड़ें जंगलों का हमारे पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है।  पर हम ‘शिलालेख’ पढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन उŸाराखण्ड का ‘चिपको’ आन्दोलन’ न केबल इस ‘शिला लेख’ को पढ़ चुका है, बल्कि वह अपनी सीमित शक्ति और अति सीमित साधनों से इसकी हिदायतों पर अमल भी कर रहा है।
जुलाई के तीसरे हफ्तेे में आन्दोलन के कार्यकर्ताओं की एक टुकड़ी लगातार बारिश के बीच गौना ताल पहुंची और उसने ताल के मलबे के बीच से बह रही विरही नदी के किनारे-किनारे मजनू नाम के एक पेड़ की कोई तीन हजार कलमें रोपीं। क्योंकि मजनू की जड़ों में नदी के किनारों को बांँध रखने का विशेष गुण है। अतः इस इलाके में मजनू का पेड़ पहली बार लगाया गया है।
गाड़ी गांव में रहने वाले आजाद हिन्द फौज के भूतपूर्व सैनिक ने 1977 के जून माह में सीधे प्रधानमन्त्री को पत्र लिख कर पूंछा था ‘क्या आप इन तेरह गांव के लोगों को भी अपनी प्रजा मानते हैं? यदि हांँ तो तो हमारे लिए बाढ़ के इन दिनों में खाने-पीने का इन्तजाम करवाइए। हम मुफ्त में नहीं तो उचित मूल्य और उचित दर पर मांग रहे हैं।’
1977 में एक भूतपूर्व सैनिक की लिखी बात आज भी प्रासंगिक है। लेकिन तब भूतपूर्व सैनिक के गुस्से में जो दम था, आज वह नहीं है? उत्तराखण्ड के अनेक गांवों में वैसा ही गुस्सा उबल रहा है। पर! क्या आज भी उस सैनिक की भावना को समझ कर उस पर अमल हो पा रहा है?
बाढ़ तो हर बरस आयेगी जब तक हम गौना ताल के मलबे पर लिखे शिलालेख को पढ़ नहीं पायेंगे, पढ़कर समझ नहीं पायेंगे।