परिवार समाज की इकाई है। परिवारों से मिलकर ही समाज का निर्माण होता है। अगर परिवार के सभी सदस्य स्वस्थ और खुशहाल होंगे, तो समाज भी खुशहाल होगा। पारिवारिक सुख और शान्ति के लिए परिवार के सदस्यों के मध्य अपसी स्नेह, विश्वास और सम्मान आवश्यक है। ‘जैसा बोएंगे वैसा काटेंगे’ के सर्वकालिक सत्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हमारा जो व्यवहार दूसरों के प्रति होगा, वही हमें भी प्रतिफल के रूप में मिलेगा। अगर परिवार के सदस्य आपस में प्रेम से रहेंगे, मेलजोल से रहेंगे तो परिवार में भी सुख वा शान्ति का वास होगा। वस्तुतः सुखद पारिवारिक जीवन के लिए अच्छे संस्कारों और सहिष्णुता का होना जरूरी है। सुख व शान्तिपूर्ण गृहस्थ जीवन व्यतीत करने के लिए सहिष्णुता की बहुत जरूरत है, जिस गुण की आज बहुत कमी होती जा रही है। परिवार के सदस्यों में आम तौर पर सहनशीलता का अभाव होता जा रहा है। पत्नि, माँ-बेटे, माँ-बेटी, भाई-भाई, भाई-बहन, सास-बहू और गुरू-शिष्य के सम्बन्धों में सहनशीलता कम होती जा रही है।
एक व्यक्ति अपने भाई को सहन नहीं करता, माता-पिता को सहन नहीं करता और पड़ोसी को सहन कर लेता है अपने मित्र को सहन कर लेता है। यह प्रकृति की विचित्रता है। सहन करना अच्छी बात है, लेकिन घर में भी एक सीमा तक एक-दूसरे को सहन करना चाहिए, तभी छोटी-छोटी बातों को लेकर मनमुटाव व नित्य होने वाले विवाद नहीं होंगे। प्रत्येक इन्सान की पहचान उसके संस्कारों से हाती है। संस्कार उसके समूचे जीवन को व्याख्यापित करते है। संस्कार हमारी जीवनी शक्ति हैं। संस्कार निरन्तर जलने वाली ऐसी दीपशिखा है जो जीवन के अंधेरे मोड़ों पर भी प्रकाश को महामानव बनाते है। सद्संस्कार अमूल्य सम्पदा हैं, जिसके आगे संसार के धन-दौलत का कुछ भी मोल नहीं है। सद्संस्कार मनुष्य की अमूल्य धरोहर हैं। परिवार के जिन सदस्यों के पास संस्कार व सहनशीलता रूपी धन है, उस परिवार के सदस्य सुख-शान्तिपूर्ण जीवन जीते है। जब अधिकतर परिवार सुख शान्तिपूर्ण जीवन जिएंगे, तभी समाज में सुख-शान्ति कायम होगी।
एक व्यक्ति अपने भाई को सहन नहीं करता, माता-पिता को सहन नहीं करता और पड़ोसी को सहन कर लेता है अपने मित्र को सहन कर लेता है। यह प्रकृति की विचित्रता है। सहन करना अच्छी बात है, लेकिन घर में भी एक सीमा तक एक-दूसरे को सहन करना चाहिए, तभी छोटी-छोटी बातों को लेकर मनमुटाव व नित्य होने वाले विवाद नहीं होंगे। प्रत्येक इन्सान की पहचान उसके संस्कारों से हाती है। संस्कार उसके समूचे जीवन को व्याख्यापित करते है। संस्कार हमारी जीवनी शक्ति हैं। संस्कार निरन्तर जलने वाली ऐसी दीपशिखा है जो जीवन के अंधेरे मोड़ों पर भी प्रकाश को महामानव बनाते है। सद्संस्कार अमूल्य सम्पदा हैं, जिसके आगे संसार के धन-दौलत का कुछ भी मोल नहीं है। सद्संस्कार मनुष्य की अमूल्य धरोहर हैं। परिवार के जिन सदस्यों के पास संस्कार व सहनशीलता रूपी धन है, उस परिवार के सदस्य सुख-शान्तिपूर्ण जीवन जीते है। जब अधिकतर परिवार सुख शान्तिपूर्ण जीवन जिएंगे, तभी समाज में सुख-शान्ति कायम होगी।





