Sunday, March 2, 2014

जल संकट और उसका समाधान! तालाब परंपरा का पुनरोद्धार - आर.एस.रमन एव पंकज चतुर्वेदी

मानव जीवन के लिए जल का अत्यन्त महत्व है और उसके लिए जलस्रोतों में नदियों के बाद तालाबों का सर्वाधिक महत्व है। तालाबों से सभी जीव-जन्तु अपनी प्यास बुझाते हैं, अर्थात जैव विविधता संरक्षण के लिए तालाबों की अपनी उपयोगिता है तो वहीं किसान तालाबों से खेती की सिंचाई करते हैं। देश में 6.38 लाख गांव हैं, इनमें से डेढ़ लाख से भी अधिक गावों में पेयजल का संकट है। लगभग 70 प्रतिशत छोटे व सीमान्त किसानों की फसलें पानी की कमी के कारण ठीक से फल-फूल नहीं पाती। वर्षा जल या किसी झरने के पानी को रोकने के लिए बनाये जाने वाले तालाबों का प्रचलन अत्यधिक प्राचीन है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक डा॰बी॰वी॰लाल ने पुराने साक्ष्य के आधार पर इलाहाबाद से 60 कि॰मी॰ दूर खुदाई कर रामायण कालीन प्रसिद्ध शृंगवेरपुर सरोवर को खोजा, जो ईसा पूर्व सातवीं सदी का बना हुआ है। महाभारत कालीन तालाबों में कुरूक्षेत्र का ब्रह्मसर, करनाल की कर्णझील और मेरठ के पास हस्तिनापुर का शुक्रताल आज भी हैं। रामायण और महाभारत काल को छोड़ दें, तो पांचवी सदी से पन्द्रहवी सदी तक देश में तालाब बनते ही जा रहे थे। रीवां रियासत में पिछली सदी में 5,000 तालाब थे। वर्ष 1947 तक मद्रास प्रेसीडेन्सी में 53,000 तालाब। वर्ष 1880 तक मैसूर राज्य में 39,000 तालाब थे। अंगेजों के आने से पहले केवल दिल्ली में 350 तालाब थे, जिनमें से अधिकांश अब लुप्त हो चुके हैं। भोपाल का तालाब अपनी विशालता के कारण देश में मशहूर था। इसे ग्यारहवीं सदी में राजा भोज ने बनवाया था। पच्चीस वर्ग मील में फैले इस तालाब में 385 नालों-नदियों का पानी भरता था। वर्ष 1335 में महाराज घड़सी ने घड़सीसर खुदवाया, वहीं जबलपुर के पास कूडन गोंड़ द्वारा खुदवाया तालाब आज लगभग एक हजार वर्ष बाद भी काम आ रहा है। चन्देल-बुन्देलों के समय वर्ष 1737 में ओरछा के नेरश उदित सिंह और 1671 में राजा सुजान सिंह ने एक-एक हजार एकड़ के क्रमशः बरूआ सागर और अरजर सागर बनवाये जो आज भी वर्षा जल के बडे भण्डार हंै। वर्षा जल संग्रहण व भण्डारण के लिए तालाब सर्वोत्तम साधन हैं, परन्तु विकास की वर्तमान प्रक्रिया में वह तालाब कहीं भुला दिये गये थे। सरकार ने यद्यपि तालाबों को ठीक रखने के लिए समय-समय पर प्रयास किये, पर सामाजिक दायित्ववोध व सहभागिता के अभाव में वह निष्फल हो गये। 2001से अब तक सरकार ने 58 तालाबों को पुनः पानीदार बनाने के लिए पौने 900 करोड़ रू॰ से अधिक फंूक दिये और नतीजा वही ‘‘ढ़ाक के तीन पात’’ ही रहा। इसके अन्तर्गत मध्यप्रदेश की सागर झील, रींवा का रानी तालाब, शिवपुरी झील, कर्नाटक के चैदह तालाब, नैनीताल की दो झीलें तथा राजस्थान का पुष्कर कुण्ड़ एवं श्रीनगर की डल झील शामिल हैं। केन्द्रीस जल आयोग ने खर्च के पैसे की पड़ताल की तो चैंकाने वाले तथ्य सामने आये। कई जगह तो गाद निकाली ही नहीं गई थी और उसकी ढ़ुलाई का खर्च दिखा दिया। कुछ जगह गाद निकाल कर किनारों पर ही छोड़ दी गई, जो अगली वारिस में पुनः तालाब में भर गई। वर्तमान भूजल संकट से उबरने के लिए महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत पुराने तालाबों को फिरसे पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया जा रहा है, जहाँ पुराने तालाब नहीं हैं, वहाँ नये तालाब खोदे जा रहे हैं। प्रत्येक गांव में एक आदर्श तालाब बनाया जा रहा है, परन्तु उसमें सामाजिक स्वपे्ररणा का पूर्ण अभाव परिलक्षित हो रहा है। इस सामाजिक दुराभाव को दूर कर सामाजिक दायित्ववोध जागृत करने हेतु मत्स्यपुराण में कहा गया है- ‘‘दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावडि़यों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है। यदि इस भावना से कार्य हो तो जल संकट दूर हो सकता है। ु