मंगल उर की निश्छलता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
हिमगिरि से निकली, बन निर्झर
फिर प्रवह मान, कल-कल’कल स्वर
सिकता - प्रस्तर रख उर अन्तर
पीड़ा सह कर भी देती हूँ वर
जीवन-धुन में जन-कविता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
युग-युग से हूँ मोक्ष-दायिनी
सर्व मंगला पाप नाशिनी
प्राणि मात्र सेवा मेरा व्रत
पिलर रही हूँ, जीवन-अमृत
सरल-तरल अक्षय ममता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
भू-सिंचन ही परम धम है
वृक्ष-पुत्र, पावन सुकम है
अगणित तीर्थ वसे हैं तट पर
संस्कृति-सृष्टि रचूं मरघट पर
दिव्य शक्ति पूरित क्षमता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
मानव, बन बैठा दानव
डाल रहा अपशिष्ट और शव
दूर करो अपने ही अवगुण
मंगल उर की निश्छलता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
हिमगिरि से निकली, बन निर्झर
फिर प्रवह मान, कल-कल’कल स्वर
सिकता - प्रस्तर रख उर अन्तर
पीड़ा सह कर भी देती हूँ वर
जीवन-धुन में जन-कविता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
युग-युग से हूँ मोक्ष-दायिनी
सर्व मंगला पाप नाशिनी
प्राणि मात्र सेवा मेरा व्रत
पिलर रही हूँ, जीवन-अमृत
सरल-तरल अक्षय ममता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
भू-सिंचन ही परम धम है
वृक्ष-पुत्र, पावन सुकम है
अगणित तीर्थ वसे हैं तट पर
संस्कृति-सृष्टि रचूं मरघट पर
दिव्य शक्ति पूरित क्षमता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
मानव, बन बैठा दानव
डाल रहा अपशिष्ट और शव
दूर करो अपने ही अवगुण
मंगल उर की निश्छलता हूँ





