Tuesday, March 25, 2014

मैं निर्मल-पावन सरिता हूँ - गौरी शंकर ‘‘विनम्र’’

मंगल उर की निश्छलता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
        हिमगिरि से निकली, बन निर्झर
        फिर प्रवह मान, कल-कल’कल स्वर
        सिकता - प्रस्तर रख उर अन्तर
        पीड़ा सह कर भी देती हूँ वर
जीवन-धुन में जन-कविता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
        युग-युग से हूँ  मोक्ष-दायिनी
        सर्व मंगला पाप नाशिनी
        प्राणि मात्र सेवा मेरा व्रत
        पिलर रही हूँ, जीवन-अमृत
सरल-तरल अक्षय ममता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
        भू-सिंचन ही परम धम है
        वृक्ष-पुत्र, पावन सुकम है
        अगणित तीर्थ वसे हैं तट पर
        संस्कृति-सृष्टि रचूं मरघट पर
दिव्य शक्ति पूरित क्षमता हूँ
मै निर्मल - पावन सरिता हूँ
        मानव, बन बैठा दानव
        डाल रहा अपशिष्ट और शव
        दूर करो अपने ही अवगुण
        मंगल उर की निश्छलता हूँ