उत्तराखण्ड की त्रासदी संरचनाओं, परिवहन कारीडोर, वनो और कृषि क्षेत्रों के व्यापक पैमाने पर विनाश का नतीजा है। इस कारण आपदा के लिए प्रकृति नहीं मनुष्य जिम्मेदार है। तबाही की व्यापकता और भयावहता के कारण स्थानीय पारिस्थतिकी पर पड़े परिणामों की बजह से इसे आपदा कहा जा रहा है। लेकिन सबसे पहले मनुष्य ने ही पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचाया।
उत्तराखण्ड की पहाडि़यों पर बादल फटने और अत्याधिक वारिश की घटनायें होती रहती हैं। वास्तव में त्रासदी की मुख्य वजह जटिल प्राकृतिक संरचना का निर्मम तरीके से क्षरण, अनियोजित तरीके से विकास और मुनाफे का लालच है। उत्तराखण्ड की पारिस्थितिकी और प्रकृति के मुख्यतः तीन तत्व हैं:
1. वन: केवल पेड़ ही जंगल का निर्माण नहीं करते। इनमें वृक्ष, झाडि़यां और घास-फूस से ढ़की जमीन शामिल है।
2. नदी: यह चैनल (जल प्रवाह का जरिया क्षेत्र) बाढ़ के मैदानों और बाढ़ के मैदानों से सटे दलदलों से बनती है।
3. भू-गर्भ: भू-आकृतिकी और मिट्टी।
मानव के हस्तक्षेप से दो अत्यन्त प्रभावी तथ्य उत्पन्न होते हैं।
1. पर्यटन और इससे जुड़ी गतिविधियों के लिए प्राकृतिक स्रोतों की मांग।
2. विकास जिनमें भवन, सड़के ओर अन्य संरचनाओं का निर्माण शामिल है।
वनों की अन्धाधुन्ध कटाई और अत्यधिक वारिश के कारण हालिया बाढ़ में वन उन्मूलन उत्तराखण्ड़ में पर्यावरणीय आपदा के सबसे प्रमुख कारण रहे। उत्तराखण्ड़ में वनों का सबसे अधिक अनुपात है जो क्षेत्रीय पर्यावरण, लोग और जैवविविधता के टिकाऊपन के लिए आवश्यक है। यह मिट्टी को अपरदन से भी बचाता है और बदले में मिट्टी, कृषि और जंगलों के अस्तित्व के लिए जरूरी है। अतः...
एक: ज्रगलों को पुनर्जीवित किए जाने की जरूरत है। इसके लिए तात्कालिक रूप से क्षतिग्रस्त पेड़ों की देखभाल के साथ जिन जगहों से पेड़ बह गये हैं, उनकी जगह नए सैंपल लगाये जाने की जरूरत हैं। इस लक्ष्य को पाने के लिए पहले की तरह ही 35 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वन होने चाहिए। इसके लिए स्थानीय विशेष परिस्थिति का ध्यान रखकर पौधे लगाये जाने चाहिए तथा स्थानीय आबादी की जरूरतों के लिहाज से उपयोगी क्षेत्र को चारागाह भूमि के रूप में घोषित करना चाहिए ताकि जंगली भूमि की रक्षा हो सके।
दो: नदी केवल चैनल नहीं है। उसके सभी क्षेत्रों के दायित्वों को प्रकृति द्वारा प्रदत्त कार्य करने देना चाहिए। उनमें छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। इस लिहाज से नदी चैनल पर कोई भी निर्माण या अवरोध किसी भी सूरत में नहीं होने देना चाहिए। बाढ़ के मैदान भी उपजाऊ हैं अतः नदी सुरक्षा की दृष्टि से बाढ़ के मैदान से जुड़े क्षेत्र को बफर जोन के रूप में संरक्षित करना चाहिए।
तीन: दुनियां की सबसे नई पर्वत श्रृंखलाओं के चलते उत्तराखण्ड भौगोलिक दृष्टि से अत्यन्त नाजुक है। इसका अधिकांश हिस्सा उच्च रूप से सक्रिय भूकम्प क्षेत्र चार और पांच के तहत आता है। यहां धरती के नीचे की हलचल तेज है, जो कभी भी यहां की भौगोलिक स्थिति और नदियों की संरचना में विक्षोभ पैदा कर सकती है। इस तथ्य के साथ यहां की भौगोलिक संरचना को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि नदियों के पास बड़ी संरचनाओं से परहेज किया जाय। प्रदेश के पुनर्निमाण में इस तथ्य को कड़े मानक के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
चार: क्षेत्र में पर्यटन और पर्यावरण के सहजीवन को बनाए रखने पर जोर देना होगा। पर्यटन के चलते इस क्षेत्र को गंभीर क्षति पहुँचती रही है। इसे रोका जाना चाहिए। पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उन्हें सुविधाएं मुहैया कराने के लिए अनियोजित बुनियादी सुविधाओं के विकास में इजाफा हुआ है। इससे बचने का एक तरीका यह हो सकता है कि पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में पर्यटकों की संख्या को सीमित किया जाना चाहिए। इस नियंत्रण को लागू करने के लिए यात्रियों को बेस केंन्द्रों पर ही रोका जाना चाहिए जहाँ पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए उन्हें सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा सके।
पाँच: अन्त में, यहाँ पर होने वाले विकास को अत्यधिक संगठित तरीके से किया जाना चाहिए और प्लानिंग इस तरह से वर्गीकृत हो जिससे सभी विशिष्ट दिशानिर्देशों का अनुपालन हो सके।
इस सन्दर्भ में प्लानिंग की कार्यप्रणाली में आमतौर पर स्वीकार किए जाने वाले सहज सुझावो की भी समीक्षा की जानी चाहिए और यदि आवश्यक हो तो उत्तराखण्ड के पुनर्निर्माण को लक्षित प्लानिंग और डेवलपमेंट का एक नया तरीका विकसित किया जाना चाहिए। सड़कों पर भी विशेष ध्यान की जरूरत है। आमतौर पर सड़कों को पहाड़ों के किनारे बनाया जाता है यह इसी रेखा में हजारों किलोमीटर तक चली जाती है। इसे बनाये जाने से वहाँ की नाजुक भौगोलिक संरचना को क्षति पहुँचती है। वर्तमान स्थिति में इस पर गंभीर रूप से विचार करने की जरूरत है कि पहाड़ों और सड़कों के जुड़ाव को सीमित किया जाए। इसी के साथ यात्रा की दूरी को कम करने के लिए और पहाड़ों से सटकर पर सड़के बनाने और उससे होने वाले नुकसान में कमी लाने के लिए जितना सम्भव हो पुल बनाया जाए और उनसे सड़कों को जोड़ा जाए। इसके अलावा अत्यधिक भूगर्भीय हलचल वाले क्षेत्रो में सभी भवन निर्माण गतिविधियों पर रोक लगे। - डिपार्टमेंट आफ लैंडस्केप आर्किटेक्चर, स्कूल आफ प्लानिंग एण्ड आर्किटेक्चर, दिल्ली।
उत्तराखण्ड की पहाडि़यों पर बादल फटने और अत्याधिक वारिश की घटनायें होती रहती हैं। वास्तव में त्रासदी की मुख्य वजह जटिल प्राकृतिक संरचना का निर्मम तरीके से क्षरण, अनियोजित तरीके से विकास और मुनाफे का लालच है। उत्तराखण्ड की पारिस्थितिकी और प्रकृति के मुख्यतः तीन तत्व हैं:
1. वन: केवल पेड़ ही जंगल का निर्माण नहीं करते। इनमें वृक्ष, झाडि़यां और घास-फूस से ढ़की जमीन शामिल है।
2. नदी: यह चैनल (जल प्रवाह का जरिया क्षेत्र) बाढ़ के मैदानों और बाढ़ के मैदानों से सटे दलदलों से बनती है।
3. भू-गर्भ: भू-आकृतिकी और मिट्टी।
मानव के हस्तक्षेप से दो अत्यन्त प्रभावी तथ्य उत्पन्न होते हैं।
1. पर्यटन और इससे जुड़ी गतिविधियों के लिए प्राकृतिक स्रोतों की मांग।
2. विकास जिनमें भवन, सड़के ओर अन्य संरचनाओं का निर्माण शामिल है।
वनों की अन्धाधुन्ध कटाई और अत्यधिक वारिश के कारण हालिया बाढ़ में वन उन्मूलन उत्तराखण्ड़ में पर्यावरणीय आपदा के सबसे प्रमुख कारण रहे। उत्तराखण्ड़ में वनों का सबसे अधिक अनुपात है जो क्षेत्रीय पर्यावरण, लोग और जैवविविधता के टिकाऊपन के लिए आवश्यक है। यह मिट्टी को अपरदन से भी बचाता है और बदले में मिट्टी, कृषि और जंगलों के अस्तित्व के लिए जरूरी है। अतः...
एक: ज्रगलों को पुनर्जीवित किए जाने की जरूरत है। इसके लिए तात्कालिक रूप से क्षतिग्रस्त पेड़ों की देखभाल के साथ जिन जगहों से पेड़ बह गये हैं, उनकी जगह नए सैंपल लगाये जाने की जरूरत हैं। इस लक्ष्य को पाने के लिए पहले की तरह ही 35 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वन होने चाहिए। इसके लिए स्थानीय विशेष परिस्थिति का ध्यान रखकर पौधे लगाये जाने चाहिए तथा स्थानीय आबादी की जरूरतों के लिहाज से उपयोगी क्षेत्र को चारागाह भूमि के रूप में घोषित करना चाहिए ताकि जंगली भूमि की रक्षा हो सके।
दो: नदी केवल चैनल नहीं है। उसके सभी क्षेत्रों के दायित्वों को प्रकृति द्वारा प्रदत्त कार्य करने देना चाहिए। उनमें छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। इस लिहाज से नदी चैनल पर कोई भी निर्माण या अवरोध किसी भी सूरत में नहीं होने देना चाहिए। बाढ़ के मैदान भी उपजाऊ हैं अतः नदी सुरक्षा की दृष्टि से बाढ़ के मैदान से जुड़े क्षेत्र को बफर जोन के रूप में संरक्षित करना चाहिए।
तीन: दुनियां की सबसे नई पर्वत श्रृंखलाओं के चलते उत्तराखण्ड भौगोलिक दृष्टि से अत्यन्त नाजुक है। इसका अधिकांश हिस्सा उच्च रूप से सक्रिय भूकम्प क्षेत्र चार और पांच के तहत आता है। यहां धरती के नीचे की हलचल तेज है, जो कभी भी यहां की भौगोलिक स्थिति और नदियों की संरचना में विक्षोभ पैदा कर सकती है। इस तथ्य के साथ यहां की भौगोलिक संरचना को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि नदियों के पास बड़ी संरचनाओं से परहेज किया जाय। प्रदेश के पुनर्निमाण में इस तथ्य को कड़े मानक के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
चार: क्षेत्र में पर्यटन और पर्यावरण के सहजीवन को बनाए रखने पर जोर देना होगा। पर्यटन के चलते इस क्षेत्र को गंभीर क्षति पहुँचती रही है। इसे रोका जाना चाहिए। पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उन्हें सुविधाएं मुहैया कराने के लिए अनियोजित बुनियादी सुविधाओं के विकास में इजाफा हुआ है। इससे बचने का एक तरीका यह हो सकता है कि पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में पर्यटकों की संख्या को सीमित किया जाना चाहिए। इस नियंत्रण को लागू करने के लिए यात्रियों को बेस केंन्द्रों पर ही रोका जाना चाहिए जहाँ पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए उन्हें सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा सके।
पाँच: अन्त में, यहाँ पर होने वाले विकास को अत्यधिक संगठित तरीके से किया जाना चाहिए और प्लानिंग इस तरह से वर्गीकृत हो जिससे सभी विशिष्ट दिशानिर्देशों का अनुपालन हो सके।
इस सन्दर्भ में प्लानिंग की कार्यप्रणाली में आमतौर पर स्वीकार किए जाने वाले सहज सुझावो की भी समीक्षा की जानी चाहिए और यदि आवश्यक हो तो उत्तराखण्ड के पुनर्निर्माण को लक्षित प्लानिंग और डेवलपमेंट का एक नया तरीका विकसित किया जाना चाहिए। सड़कों पर भी विशेष ध्यान की जरूरत है। आमतौर पर सड़कों को पहाड़ों के किनारे बनाया जाता है यह इसी रेखा में हजारों किलोमीटर तक चली जाती है। इसे बनाये जाने से वहाँ की नाजुक भौगोलिक संरचना को क्षति पहुँचती है। वर्तमान स्थिति में इस पर गंभीर रूप से विचार करने की जरूरत है कि पहाड़ों और सड़कों के जुड़ाव को सीमित किया जाए। इसी के साथ यात्रा की दूरी को कम करने के लिए और पहाड़ों से सटकर पर सड़के बनाने और उससे होने वाले नुकसान में कमी लाने के लिए जितना सम्भव हो पुल बनाया जाए और उनसे सड़कों को जोड़ा जाए। इसके अलावा अत्यधिक भूगर्भीय हलचल वाले क्षेत्रो में सभी भवन निर्माण गतिविधियों पर रोक लगे। - डिपार्टमेंट आफ लैंडस्केप आर्किटेक्चर, स्कूल आफ प्लानिंग एण्ड आर्किटेक्चर, दिल्ली।





