Saturday, March 8, 2014

पर्वों की ऋतु शरद् - डा०॰ नवलता




न केवल मनुष्य, अपितु, प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है। अनुकूल वेदनीयता ही सुख है। अर्थात् शरीर और मन अपनी प्रकृति के अनुरूप सहज उल्लास का अनुभव करें, अपने आसपास के वातावरण से सकारात्मक सम्बन्ध का अनुभव करें, तो वह सुख की सामान्य स्थिति कही जा सकती है। इस सुख की प्राप्ति के लिए मानव प्रतिपल प्रयत्नशील रहता है। सामाजिक तथा सांस्कृतिक चेतना के कारण मानव अपने परिवेश में नित्य-नैमित्तिक रूप से ऐसे अवसरों की खोज में रहता है, जहाँ वह सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर सुख तथा उल्लास को परस्पर बाँट कर उन्हें अभिव्यक्त कर सके। विश्व के प्रत्येक देश तथा प्रत्येक संस्कृति में सामूहिक उल्लास की अभिव्यक्ति पर्वोत्सवों के रूप में देखी जाती है। कहना न होगा कि उल्लास और उत्सव का सम्बन्ध स्वाभाविक है।
भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ वर्ष का प्रत्येक दिन व्रत, पर्व तथा उत्सव का हेतु है। हमारे मनीषियों ने न केवल मानव मनोविज्ञान, अपितु उसकी दैहिक स्वास्थ्य सम्बन्धी आवश्यकताओं, पर्यावरणीय अनुकूलता तथा ऋतुगत जलवायु-परिवर्तनों को दृष्टि में रखकर पर्वोत्सवों तथा उनसे सम्बन्धित कर्मकाण्ड को निर्धारित कर धार्मिक विश्वासों के साथ प्रवर्तित किया। परम्परागत विश्वासों तथा धार्मिक मान्यताओं को श्रद्धापूर्वक स्वीकार कर बिना किसी तर्क के लोकपद्धति पर चलते जाना सामान्य मानव समाज की प्रवृत्ति होती है। इन विश्वासों तथा परम्पराओं मंे न केवल धर्मभीरू मानव अपनी अदृष्ट सुरक्षा को देखता है, अपितु समस्याओं एवं विषमताओं से आहत जीवन में उल्लास की ऊर्जा प्राप्त कर नई जीवनी-शक्ति प्राप्त करता है।
षड् ऋतुओं के वैभव से समृद्ध भारत में विविध ऋतुओं के अनुसार पर्वों तथा उनके अन्तर्गत किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों का सांस्कृतिक तात्पर्य तो होता ही है, साथ ही उनका सम्बन्ध जलवायुगत समायोजन तथा मनः शारीरिक स्वास्थ्य से भी होता है। इसी कारण सर्वाधिक पर्वोत्सव तथा व्रतोपवास ऋतुओं के सन्धिकाल तथा सौर व चन्द्र संक्रमण के काल में होते हैं। उदाहरणार्थ  मकर संक्रान्ति, शिव रात्रि, होली, विजयदशमी तथा दीपावली पर्व ऋतुओं के सन्धिकाल में मनाए जाते हैं, तो प्रत्येक मास की चतुर्थी, एकादशी, पौर्णमासी तथा अमावस्या का व्रतोपवास की दृष्टि से विशेष महत्व है।
अस्तु यहाँ शरत् कालीन पर्व परम्परा की चर्चा की जा रही है। ज्ञातव्य है, कि ग्रीष्म से तपती भूमि तथा प्राणि वर्ग वर्षा में जिस तृप्ति तथा ताप शान्ति का अनुभव करते हैं, वह सामान्यतः सुखद प्रतीत होता है, किन्तु अग्नि और जल के संयोग से जो ऊष्मा निकलती है वह वात पित्त कफ के सन्तुलन को बिगाड़ने के साथ ही ऊष्माजन्य जीवों (मच्छर आदि) के प्रजनन तथा वृद्धि में कारक होती है। फलतः बाह्य पर्यावरण में संक्रामक जन्तुओं का प्रकोप बढ़ता है। सीलन तथा आद्रता में वृद्धि होती है। वातावरण में कभी गर्मी, तो कभी ठंडक होने लगती है। वायु में भी शुष्कता का प्रारम्भ हो जाता है। एक ओर वर्षा के वेग मटमैली हुई तथा प्रवाहवाली नदियों का जल निर्मल तथा शान्त होने लगता है, भूमि पर इठलातेे श्वेत बादलों की भाँति कास के कोमल वृन्तों का मन्द नर्तन मन को हरने लगता है, आकाश में फैले रूई से श्वेत तथा जल के भार से मुक्त बादल सुखपूर्वक विचरण करने लगते हैं; तो दूसरी ओर वातावरण में सूक्ष्म जीवाणुओं तथा तैरते हुए परागकणों कि स्थिति त्वक् तथा श्वास सम्बन्धी विकारों का कारण बनती है। बाह्य शुष्कता के प्रभाववश शरीर में भी स्निग्धता का अभाव होने लगता है। इन दृष्टियों से शरद् ऋतु में मनाए जाने वाले पर्वों की विशेष महत्ता है।
गत दो-तीन दशकों में भारतीय पर्वों के प्रति स्वयं को ‘आधुनिक’ समझने वाले लोगों की उपेक्षा यद्यपि बढ़ी है तथा परम्परागत विधियों का स्थान नवीन विधियों ने ले लिया है तथापि कतिपय बिन्दुओं पर ध्यानाकर्षण आवश्यक है।
क्वाँर (आश्विन) तथा कार्तिक (शरद् ऋतु) मंे पितृपक्ष, नवरात्र, विजयदशमी और दीपावली (धनतेरस से यमद्वितिया) तद्नन्तर कार्तिक पूर्णिमा (गंगा स्नान) तक पर्वों की लम्बी श्रंखला है। इनके तार्किक, पर्यावरणीय तथा स्वास्थ्य वैज्ञानिक कारणों पर विचार किया जाए तो निम्ननिर्दिष्ट तथ्य विचारणीय प्रतीत होते हैं।
पितृपक्ष - भाद्र की पूर्णिमा से आश्विन की अमावस्या तक प्रायः प्रत्येक हिन्दु परिवार में पितृतर्पण की परम्परा है। इस अवधि में आवश्यक अनुष्ठान के रूप में सूर्याभिमुख होकर अथवा दक्षिणाभिमुख होकर तिल व जल द्वारा अध्र्य की परम्परा है। उल्लेखनीय है कि, यही वह काल है, जब सूर्य द्वारा अगले वर्ष की वर्षा हेतु समस्त पार्थिव स्रोतों से जल आहरण करने की प्रक्रिया आरम्भ होती है। यह मेघों का गर्भाधान काल होता है। सूर्य अपनी रश्मियों से सूक्ष्म ऊष्मा के रूप में जल ग्रहण करता है। इस दृष्टि से तर्पण हेतु किया गया जल दान उक्त कार्य में साधक होता है। चन्द्र लोक के ऊपर जिस पितृलोक की कल्पना की गई है वह अन्तरिक्ष का वह क्षेत्र ही प्रतीत होता है, जहाँ ऊष्मा के रूप मे जल संग्रहित होता है। सांस्कृतिक रूप से दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धाभाव व्यक्ति के समक्ष एक आदर्श वंश परम्परा के निर्माण के दायित्व का बोध कराता है।
नवरात्र - आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी  तक महिषासुर मर्दिनी भगवती दुर्गा के नव रूपों की आराधना, पूजन, हवन तथा फलाहार द्वारा उपवास व्यक्ति में सात्विक गुणों का बीजारोपण करता है। विचारणीय है कि शरद् ऋतु निर्मल, लघु तथा प्रकाशात्मक होने के कारण सतोगुण प्रधान ऋतु है। अतः इस ऋतु में सतोगुणी प्रवृत्तियाँ उद्दीप्त होती हैं। ‘सर्वमंगलमागल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके’ के सम्बोधन के साथ ‘त्र्यम्बिका गौरी नारायणी’ को नमन तथा उनसे ‘रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि’ की प्रार्थना सुखद तथा लोकमंगलकारी  मनोवैज्ञानिक स्थिति को उत्पन्न करती है। रूप बाह्य लावण्य हो सकता है, जय अन्तर्बाह्य स्वयं से संघर्ष में जय हो सकता है, यश व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है, तथा द्विष (शत्रु), काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य हैं, जिनका नाश होने पर सर्वथा सर्वार्थसिद्धि सम्भव है। -
दुर्गासप्तशती के नित्य पाठ से तो आत्मिक बल तथा आत्मविश्वास प्राप्त होता है, किन्तु नित्य दीपप्रज्जवालन तथा हवन से वातावरण रोगाणुओं से रहित तथा शुद्ध होता है। इस प्रकार वर्षा से प्रदूषित पर्यावरण में शुद्धि का सार्थक तथा वैज्ञानिक उपाय है नवरात्रव्रत पूजन। उपवास तथा फलाहार मेद जन्य विकारों को दूर करता है।
दीपावली - नवरात्र के पश्चात् विजयदशमी में रावणवध अन्याय, अत्याचार तथा दुष्प्रवृत्ति पर विजय का सांस्कृतिक प्रतीक है, तो दीपावली उस विजय का उद्धोष करने वाला पर्व है। धन्वन्तरि जयन्ती (धनतेरस) आज धनलक्ष्मी के संग्रह में स्पर्धा का पर्व बन गया है, क्योंकि लोक बड़ा अन्धविश्वासी होता है। किन्तु पाँच दिनों के इस पर्व महोत्सव का आरम्भ जिन धन्वन्तरि के जन्मोत्सव से होता है वे आयुर्वेद के जनक हैं। उनका स्मरण इस बात का प्रमाण है कि यह समग्र अनुष्ठान स्वास्थ्य रक्षा कि दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भैषज्यवृत्ति में स्थित वैद्यों के लिए मूल तथा वनस्पति-संग्रह के लिए शरद् ऋतु काल उपयुक्ततम काल है, क्योंकि इस काल में औषधियों में स्वाभाविक रस प्रचुर तथा पर्याप्त मात्रा में रहता है। अमावस्या के तमोमय आकाश में कालिमा न होकर निर्मल धुधलापन होता है। कार्तिक की यह निशा अन्धकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक बन कर अनन्त दीपकों के प्रकाश से धरती को आलोकित करती है, तो विध्नविनाशक सर्वमंगल कर गणेश व समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन भी विशेष अर्थ का ज्ञापक है। शारदीय धान्य के पाक का यही काल है। वैदिक परम्परा  से शारदीय धान्य से ही फसल का आरम्भ माना जाता है। कृष्य धान्य ही भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है, अतः उसकी समृद्धि पर ही सामाजिक आर्थिक विकास निर्भर है। किन्तु उस धान्य को प्राप्त करने में नाना प्रकार के प्राकृतिक विध्न सम्भावित होते हैं। अतः विध्नविनाशक गणेश की उपासना की जाती है। उल्लेखनीय है कि गणेश सर्वाधिक युक्ति बुद्धि के देवता हैं। इस दृष्टि से लक्ष्मी गणेश की आराधना उपासना इस तथ्य को व्यक्त करती है, कि युक्तिपूर्वक प्रयुक्त बुद्धि से प्राप्त धन समृद्धि स्थायी होती है।
इलेक्ट्रानिक तथा विद्युत् संसाधनों के वर्तमान युग में मोमबत्ती तथा विद्युत् झालरों से जगमगाते हुए घर-द्वार मनोहर तथा सुदर्शन प्रतीत होते हैं। किन्तु घी तथा सरसों के तेल से असंख्य दीपकों को जलाना कितना वैज्ञानिक है, यह हम भूल रहे हैं। घी, विशेषतः गोघृत दीप्त होकर प्राणवायु को सूक्ष्म रूप से व्याप्त करने में समर्थ होता है तथा प्रदीप्त सरसों का तेल विषध्न ;।दजपेमचजपबद्ध होता है। वातावरणजन्य तम (तमोगुणात्मक, अतः प्राणवायु का अवरोधक तथा जीवाणुओं को उद्बुद्ध करने वाला होता है) के प्रभाव को नष्ट कर स्वास्थ्यप्रद तथा प्राणवायु को उद्दीप्त करने वाली परिस्थिति के उत्पन्न करने के लिए दीपकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमें उक्त बिन्दु पर विचार करना चाहिए। दीपावली के आनुवांशिक पर्वों के रूप में गोवर्द्धन पूजा का सम्बन्ध धनसमृद्धि तथा यमद्वितिया का सम्बन्ध पर्यावरणरक्षण से है। आज गोवंश की उपेक्षित स्थिति किसी से छिपी नहीं है। दूसरी ओर वैज्ञानिक गोमय तथा गो-उत्पाद के बहुआयामी लाभों का उद्घोष कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में गोवर्द्धन (गोवंश का वर्धन-संरक्षण) के वास्तविक तात्पर्य को ग्रहण कर औपचारिक पूजा मात्र को पर्याप्त नहीं समझना चाहिए।
कार्तिकी पूर्णिमा - कार्तिकी पूर्णिमा हिन्दु समाज में गंगास्नान के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन गंगा अथवा पवित्र (सर्वथा शुद्ध जल) नदी में स्नान करने की परम्परा है। स्मरणीय है कि वर्षा ऋतु के अनन्तर नदियों का जल निर्मल हो जाता है। विशेषतः हिमालय से निकली गंगा अपने साथ नाना जड़ी बूटियों का रस वर्षा जल के साथ ले कर आती है तथा शरद् ऋतु में अमेध्य औषधियों के रस से कषाय, निर्दोष तथा आरोग्य प्रदान करने वाली होती है। इसमें स्नान सभी प्रकार के त्वक् रोगों को दूर कर कान्ति प्रदान करने में समर्थ होता है। आज दुख का विषय यह है, कि हम अपने स्वार्थ के लिए इस परम्परा को तो मानते हैं, किन्तु यह भूल जाते हैं, कि मैदानी भागों में आने पर गंगा को स्वच्छ, निर्मल तथा प्रदूषण रहित रखने का दायित्व हमारा है। तभी वह हमारे रोगों को दूर करने में सक्षम होगी।
कार्तिकी पूर्णिमा की एक और विशेष पूजा है तुलसी पूजा। तुलसी अहर्निश प्राणवायु प्रदान करने वाली वनस्पति है। सन्ध्या समय इसके नीचे गोघृत का दीपक जलाने से प्राणवायु प्रदान करने की शक्ति और प्रबल हो जाती है।
इस प्रकार शरद् ऋतु को पर्वोत्सवों का मास कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी। जैसा कि पूर्व पंक्तियों में कहा जा चुका है कि उल्लास तथा उत्सव का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। उसी प्रकार उल्लास और आहार का भी घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। भारतीय परिवारों में पर्वोत्सवों पर पकवान तथा स्निग्ध भोजन की प्रवृत्ति होती है। शरद् ऋतु में पर्वों के बाहुल्य के कारण गरिष्ठ तथा स्निग्ध भोजन भी प्रचुरता से प्रचलित है। इस दृष्टि से शरद् ऋतु चर्या विषयक आयुर्वेदीय अवधारणा का उल्लेख प्रासंगिक होगा।
वर्षा ऋतु में सन्चित पित्त जब शरद् ऋतु में प्रकुपित हो जाता है, तो पित्तनाशक उपायों के रूप विशेष आहार-विहार की आवश्यकता होती है। लघु, स्निग्ध, सुपाच्य, तिक्त, रस प्रधान तथा मधुर भोजन शरद् ऋतु में हितकर होता है। गेहूँ, जौ तथा शालि (धान) का आहार विहित है।
उक्त प्रकार से उल्लासपूर्वक पर्वों का अनुष्ठान करते हुए शरद् ऋतु मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य, बल तथा ऊर्जा को प्रदान करने वाली होकर वैदिक ऋषि की उस कामना का निहितार्थ स्मरण कराती है, जिसमें ‘जीवेम शरदः शतम्’ कह कर शरद् का प्राधान्य बतलाया गया है। ु
- के-680, आशियाना कालोनी, लखनऊ।