मई, २०१३ को उत्तराखण्ड में आई विभीषिका का प्रत्यक्ष कारण ग्लोबल वार्मिंग दिखता है। धरती का तापमान बढ़ने से बरसात तेज और कम समय में हो रही है। भीषण बरसात और सूखे के दौरे पड़ रहे हैं। वायुमण्डल की विशेष परिस्थिति में बादल फटते हैं। सामान्य परिस्थिति में हवा पानी की बूंदों को लेकर ऊपर उठती रहती है। छोटी बूंदे बड़ी होती जाती हैं। तापमान कम होता है तो यह बूंदें बर्फ बन जाती है और ओले का रूप धारण कर लेती हैं। विशेष परिस्थितियों में हवा ऊपर नहीं उठ पाती, परन्तु पानी की बूंदें बड़ी होती जाती हैं और ये बड़ी बूंदें एकदम से गिर पड़ती हैं, जिसे बादल फटना कहते है।
गिरने वाले इस पानी को यदि पहाड़ सहन कर लेता है तो विशेष नुकसान नहीं होता है। पहाड़ कमजोर हो तो वही पानी विभीषिका का रूप धारण कर लेता है। बड़ी मात्रा में पेड़ लगे हों तो पानी उनकी जड़ों के सहारे पहाड़ के अन्दर तालाबों में समा जाता है, जिन्हे एक्वीफर कहते हैं। पेड़ न हों तो वही पानी सीधी धारा बनाकर नीचे गिरता है और तब उफनती नदी अपनें साथ पेड़ों और पत्थरोें को लेकर बहती है। इनकी टक्कर से मकान और पुल घ्वस्त हो जाते है, जैसा कि हाल में हुआ है।
केदारनाथ के नीचे फाटा व्यूंग और सिंगोली भटवारी जल विद्युत परियोजनाएंँ बनाई जा रही हंै। इनमें लगभग 30 किलोमीटर की सुरंग खोदी जा रही है। भारी मात्रा में डायनामाईट का प्रयोग किया जा रहा है। इन विस्फोटों से पहाड़ के एक्वीफर फूट रहे हंै और जमा पानी रिस कर सुरंग के रास्ते निकल रहा है। जिससे पहाड़ के जल स्रोत सूख रहे हैं। पेड़ों को पानी नहीं मिल रहा है और वे कमजोर हो रहे हैं। धमाकों से पहाड़ कमजोर व जर्जर हो रहे हैं। फलस्वरूप पानी बरसने से चट्टानें धसक रही हंै तथा पत्थर नीचे आ रहे हैं। मैने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत डाइरेक्टर जनरल आफ माइन सेफ्टी से पूछा कि विस्फोट की मात्रा के निर्धारण संम्बन्धी फाईल मुझे उपलब्ध कराई जाए। उत्तर दिया गया कि फाईल गुम हो गई है। इससे ज्ञात होता है कि कम्पनियांँ विस्फोटों पर परदा डालना चाहती हैं। वर्तमान विभीषिका में श्रीनगर परियोजना का विशेष योगदान रहा है। कम्पनी ने भारी मात्रा में मिट्टी को नदी के किनारे डाल दिया था। जलस्तर बढ़ने पर यह मिट्टी नदी के साथ बहकर घरों में घुस गई और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जमा हो गई। राजमार्ग सात दिनों से बंद है।
सारांश है कि बादल फटना सामान्य बात है, परन्तु गिरे पानी को ग्रहण करने की धरती की शक्ति को हमने जलविद्युत परियोजनाआंें को बनाने के लिए किए जा रहे विस्फोटों से कमजोर बना दिया है। ऐसा ही प्रभाव सड़कों को बनाने के लिए गए विस्फोटों और गैरकानूनी खनन का होता है। नदी के पाट पर किए जा रहे अतिक्रमण से व्यक्ति अपने को बाढ़ के मुंह में डालता है।
जल विद्युत परियाजनाओं से उत्पन्न विद्युत का लाभ शहरी उपभोक्ताओं को होता है। उत्तराखण्ड के पास अपनी जरूरत भर बिजली उपलब्ध है, लेकिन राजस्व कमाने के लिए राज्य सरकार प्रत्येक नदी के प्रत्येक इंच के बहाव पर जल विद्युत परियोजना बनाने का प्रयास कर रही है। इन परियोजनाओं से राज्य को 12 प्रतिशत बिजली फ्री मिलती है। इसे बेचकर सरकार राजस्व कमाती है। इस राजस्व में आधा सरकारी कर्मियों के वेतन को जाता है। शेष में बड़ा हिस्सा अन्य प्रशासनिक खर्चों में जाता है, जैसे गाड़ी इत्यादि में। बची रकम विकास कार्यों में खर्च की जाती है। इसमें 20 से 50 प्रतिशत घूस में जाता है। आम आदमी को राजस्व का केवल 20-25 प्रतिशत ही मिलता है, लेकिन परियोजना के 100 प्रतिशत दुष्परिणाम को आम आदमी झेलता है। उसकी बालू-मछली से होने वाली आय बंद हो जाती है। परियोजना में उत्पन्न मच्छरों से आम आदमी की मृत्यु होती है। विस्फोटों से आई विभीषिका का ठीकरा भी आम आदमी के सिर ही फूटता है।
इसी प्रकार का प्रभाव दूसरे विकास कार्यों का होता है। अंधाधुंध खनन से लाभ खनन माफिया को होता है। खनिज का उपयोग मुख्य रूप अमीरों की इमारत बनाने के लिए किया जाता है। सरकार को अवैद्य खनन से राजस्व कम और सरकारी कर्मियों को घूस ज्यादा मिलती है। नदी के पाट में अतिक्रमण का प्रभाव भी ऐसा ही है। अतिक्रमण प्रभावी वर्ग ही करता है। अमीर को सस्ती भूमि मिल जाती है। सरकार को रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं मिलता है। हाँं घूस भरपूर मिलती है। इनके कार्यों के विपरीत सड़क निर्माण का आम आदमी पर सुप्रभाव पड़ता है। उसके लिए आवागमन सुगम हो जाता है। कालेज, अस्पताल और साफ्टवेयर पार्क बनाने का आधार बनता है। इनसे दीर्घकालीन और उच्चकोटि के रोजगार स्थापित होते हैं, जैसे लेक्चरर या साइंटिस्ट के।
समग्र दृष्टि से देखने पर विभीषिका के कारणों में मात्र सड़क बनाना ही लाभप्रद दिखता है। सड़क निर्माण से आपदा में वृद्धि न हो, इसके लिए डायनामाइट का उपयोग अपरिर्हाय स्थिति में ही किया जाए। छेनी और सब्बल से ही पहाड़ काटना चाहिए। हां इससे निर्माण कार्य धीमी गति से होगा, पर पहाड़ जर्जर होने से बच जाएंगे।
अवैध खनन, अतिक्रमण और जल विद्युत परियोजनाएँं इस विभीषिका के कारण हंै। इन परियोजनाओं में घूस वसूलने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। जानकार बताते हैं कि जल विद्युत परियोजनाओं के अनुबन्ध पर दस्तखत करने की एक करोड़ रूपये प्रति मेगावाट की घूस दी जाती है?
उत्तराखण्ड में 40,000 मेगावाट की सम्भावना को देखते हुए घूस की इस विशाल राशि का अनुमान लगाया जा सकता है। इन कार्यों से राज्य सरकार गरीब पर आपदा डालकर अमीर को लाभ पहुँचा रही है और इस पाप में अपना हिस्सा बटोर रही है। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।)
गम्भीर गुनाह
बादल फटना सामान्य बात है, परन्तु गिरे पानी को ग्रहण करने की धरती की शक्ति को हमने परियोजनाओं को बनाने के लिए किए जा रहे विस्फोटों से कमजोर बना दिया है।
गिरने वाले इस पानी को यदि पहाड़ सहन कर लेता है तो विशेष नुकसान नहीं होता है। पहाड़ कमजोर हो तो वही पानी विभीषिका का रूप धारण कर लेता है। बड़ी मात्रा में पेड़ लगे हों तो पानी उनकी जड़ों के सहारे पहाड़ के अन्दर तालाबों में समा जाता है, जिन्हे एक्वीफर कहते हैं। पेड़ न हों तो वही पानी सीधी धारा बनाकर नीचे गिरता है और तब उफनती नदी अपनें साथ पेड़ों और पत्थरोें को लेकर बहती है। इनकी टक्कर से मकान और पुल घ्वस्त हो जाते है, जैसा कि हाल में हुआ है।
केदारनाथ के नीचे फाटा व्यूंग और सिंगोली भटवारी जल विद्युत परियोजनाएंँ बनाई जा रही हंै। इनमें लगभग 30 किलोमीटर की सुरंग खोदी जा रही है। भारी मात्रा में डायनामाईट का प्रयोग किया जा रहा है। इन विस्फोटों से पहाड़ के एक्वीफर फूट रहे हंै और जमा पानी रिस कर सुरंग के रास्ते निकल रहा है। जिससे पहाड़ के जल स्रोत सूख रहे हैं। पेड़ों को पानी नहीं मिल रहा है और वे कमजोर हो रहे हैं। धमाकों से पहाड़ कमजोर व जर्जर हो रहे हैं। फलस्वरूप पानी बरसने से चट्टानें धसक रही हंै तथा पत्थर नीचे आ रहे हैं। मैने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत डाइरेक्टर जनरल आफ माइन सेफ्टी से पूछा कि विस्फोट की मात्रा के निर्धारण संम्बन्धी फाईल मुझे उपलब्ध कराई जाए। उत्तर दिया गया कि फाईल गुम हो गई है। इससे ज्ञात होता है कि कम्पनियांँ विस्फोटों पर परदा डालना चाहती हैं। वर्तमान विभीषिका में श्रीनगर परियोजना का विशेष योगदान रहा है। कम्पनी ने भारी मात्रा में मिट्टी को नदी के किनारे डाल दिया था। जलस्तर बढ़ने पर यह मिट्टी नदी के साथ बहकर घरों में घुस गई और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जमा हो गई। राजमार्ग सात दिनों से बंद है।
सारांश है कि बादल फटना सामान्य बात है, परन्तु गिरे पानी को ग्रहण करने की धरती की शक्ति को हमने जलविद्युत परियोजनाआंें को बनाने के लिए किए जा रहे विस्फोटों से कमजोर बना दिया है। ऐसा ही प्रभाव सड़कों को बनाने के लिए गए विस्फोटों और गैरकानूनी खनन का होता है। नदी के पाट पर किए जा रहे अतिक्रमण से व्यक्ति अपने को बाढ़ के मुंह में डालता है।
जल विद्युत परियाजनाओं से उत्पन्न विद्युत का लाभ शहरी उपभोक्ताओं को होता है। उत्तराखण्ड के पास अपनी जरूरत भर बिजली उपलब्ध है, लेकिन राजस्व कमाने के लिए राज्य सरकार प्रत्येक नदी के प्रत्येक इंच के बहाव पर जल विद्युत परियोजना बनाने का प्रयास कर रही है। इन परियोजनाओं से राज्य को 12 प्रतिशत बिजली फ्री मिलती है। इसे बेचकर सरकार राजस्व कमाती है। इस राजस्व में आधा सरकारी कर्मियों के वेतन को जाता है। शेष में बड़ा हिस्सा अन्य प्रशासनिक खर्चों में जाता है, जैसे गाड़ी इत्यादि में। बची रकम विकास कार्यों में खर्च की जाती है। इसमें 20 से 50 प्रतिशत घूस में जाता है। आम आदमी को राजस्व का केवल 20-25 प्रतिशत ही मिलता है, लेकिन परियोजना के 100 प्रतिशत दुष्परिणाम को आम आदमी झेलता है। उसकी बालू-मछली से होने वाली आय बंद हो जाती है। परियोजना में उत्पन्न मच्छरों से आम आदमी की मृत्यु होती है। विस्फोटों से आई विभीषिका का ठीकरा भी आम आदमी के सिर ही फूटता है।
इसी प्रकार का प्रभाव दूसरे विकास कार्यों का होता है। अंधाधुंध खनन से लाभ खनन माफिया को होता है। खनिज का उपयोग मुख्य रूप अमीरों की इमारत बनाने के लिए किया जाता है। सरकार को अवैद्य खनन से राजस्व कम और सरकारी कर्मियों को घूस ज्यादा मिलती है। नदी के पाट में अतिक्रमण का प्रभाव भी ऐसा ही है। अतिक्रमण प्रभावी वर्ग ही करता है। अमीर को सस्ती भूमि मिल जाती है। सरकार को रजिस्ट्रेशन शुल्क नहीं मिलता है। हाँं घूस भरपूर मिलती है। इनके कार्यों के विपरीत सड़क निर्माण का आम आदमी पर सुप्रभाव पड़ता है। उसके लिए आवागमन सुगम हो जाता है। कालेज, अस्पताल और साफ्टवेयर पार्क बनाने का आधार बनता है। इनसे दीर्घकालीन और उच्चकोटि के रोजगार स्थापित होते हैं, जैसे लेक्चरर या साइंटिस्ट के।
समग्र दृष्टि से देखने पर विभीषिका के कारणों में मात्र सड़क बनाना ही लाभप्रद दिखता है। सड़क निर्माण से आपदा में वृद्धि न हो, इसके लिए डायनामाइट का उपयोग अपरिर्हाय स्थिति में ही किया जाए। छेनी और सब्बल से ही पहाड़ काटना चाहिए। हां इससे निर्माण कार्य धीमी गति से होगा, पर पहाड़ जर्जर होने से बच जाएंगे।
अवैध खनन, अतिक्रमण और जल विद्युत परियोजनाएँं इस विभीषिका के कारण हंै। इन परियोजनाओं में घूस वसूलने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। जानकार बताते हैं कि जल विद्युत परियोजनाओं के अनुबन्ध पर दस्तखत करने की एक करोड़ रूपये प्रति मेगावाट की घूस दी जाती है?
उत्तराखण्ड में 40,000 मेगावाट की सम्भावना को देखते हुए घूस की इस विशाल राशि का अनुमान लगाया जा सकता है। इन कार्यों से राज्य सरकार गरीब पर आपदा डालकर अमीर को लाभ पहुँचा रही है और इस पाप में अपना हिस्सा बटोर रही है। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।)
गम्भीर गुनाह
बादल फटना सामान्य बात है, परन्तु गिरे पानी को ग्रहण करने की धरती की शक्ति को हमने परियोजनाओं को बनाने के लिए किए जा रहे विस्फोटों से कमजोर बना दिया है।





