Monday, March 3, 2014

लोकतन्त्र के भाग्य विधाता हे! मतदाता - त्रिलोचन शास्त्री

वर्तमान लोकसभा में 162 सदस्य (30 प्रतिशत) ऐेसे हैं, जिनके खिलाफ किसी न किसी तरीके के आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से 76 सदस्यों (14 प्रतिशत) के अपराधों की प्रवृत्ति गंभीर है। एक तरफ जहां राजनीतिक दल इस बात के कसूरवार हैं कि उन्होने ऐसे लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया, वहीं मतदाता भी अपने वोट के इस्तेमाल से उन्हें चुनने के लिए जिम्मेदार हैं। यद्यपि कभी-कभी मतदाताओं को दो में से किसी कम आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार के चयन पर विवस होना पड़ता है।
कभी-कभी राजनैतिक लाभ हासिल करने के लिए भी संसद का इस्तेमाल किया जाता है। सत्ताधारी गठबंधन गरीबों को दी जाने वाली सुविधाओं और सहूलियतों के नाम पर सभी तरीके के कानून पारित करवाने की कोशिश करता है, वहीं विपक्षी दल सत्ताधारी गठबंधन के हर एक कदम का विरोध करतें हैं, चाहें वह अच्छा हो या बुरा। यह सब क्यों हो रहा हैं? पहली बात, सभी पार्टियां चुनावी बढ़त हासिल करने की मंशा से ऐसा करती हैं। दूसरी चीज यह है कि अन्य लोकतन्त्रों की तुलना में भारत में वोट के लिए बहुत प्रतिस्पर्धा है। हमारे यहां 150 से अधिक राजनैतिक दल हैं, जिन्होनें 2009 के लोकसभा चुनाव में 543 सीटों के लिए चुनाव लड़ा था। 35 से अधिक दलों ने मौजूदा लोकसभा में एक या एक से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की। तीसरी बात, चुनाव लड़ने का खर्च अप्रत्याशित रूप से बढ़ चुका है। दुनियां में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों की सबसे बड़ी आबादी के साथ यहां कभी-कभार वोट खरीद कर भी चुनाव लड़े जाते हैं। जनसेवा और मर्यादित आचरण अभी भी हमारी प्राथमिकता में नहीं है।
इसलिए मतदाताओं को शिक्षित करने और जागरूकता फैलाने की जरूरत है। केवल चुनिंदा लोगों की उपलब्धियों से ही भारत महान नहीं बनने वाला, वह महान तब बनेगा जब बड़ी संख्या में लोग अपने जीवन में जिम्मेदारी के प्रति गंभीर होंगे और अपने मतदाता अधिकार का सही प्रयोग करेंगे।
- संस्थापक चेयरमैन, एसोसियशन फार डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स