Saturday, March 8, 2014

युवा पीढ़ी में आज भी है बड़ों के प्रति आदर और कर्तव्य भावना! - ब्रजेन्द पाल सिंह

समाचार पत्र के रविवारीय परिशिष्ठ में ‘कृतघ्न्’ शीर्षक की कथा पढ़ी, जिससे लगा क्या पूरा समाज ‘कृतघ्न्ता’ की ओर बढ़ रहा है, या ‘कृतज्ञता’ भी कहीं शेष है? विचार करने पर अनुभव जन्य कुछ घटनायें स्मरण हो आयीं, जिनके लिए मैं सदैव कृतज्ञ रहूंँगा।
(1) एक दिन दिल्ली की भीड़ भरी बस में मुश्किल से खड़े होने की जगह होने पर भी यात्रा प्रारम्भ की। पर! कुछ दूर यात्रा करने पर अकल्पनीय सुखद अहसास हुआ। जब एक युवक ने मुझे खड़े होकर यात्रा करते देखा, तो उसने अपनी सीट से उठ कर, मुझे बैठाया और बोला, ‘‘हम तो इस भीड़ में खड़े होकर यात्रा करने के आदी है, लेकिन आप जैसे बड़े लोगों (बुजुर्गों) के लिए खड़े हो कर यात्रा करने में भी अच्छा लगता है’’।
(2) एक बार दिल्ली मैट्रो में चढ़ा तो देखा रोज की तरह ही अनेक यात्री खड़े-खड़े यात्रा कर रहे हैं। यद्यपि मैट्रो में महिलाओं, विकलांग वरिष्ठ नागरिको के लिए कुछ सीटें आरक्षित रहती हैं, फिर भी मैं चुपचाप खड़े होकर यात्रा करने लगा। कुछ छड़ तक आरक्षित सीट पर बैठे युवक हमें देखते रहे कि शायद हम उन्हें उठने के लिए कहेंगे। पर, जब मैने वैसा कुछ नहीं किया, तो वह स्वयं खड़े हो गये और मेरे लिऐ सीट छोड़ दी।
(3) जब मैं, मुम्बई से रात के समय वेटिंग टिकेट के साथ ट्रेन में चढ़ा और कुछ दूर तक एक सीट के कोने में बैठ कर यात्रा प्रारम्भ की, तो मेरी स्थिति समझ कर एक युवक बोला, आप हमारी बर्थ पर सो लीजिये, अभी मैं अपने दोस्तों के साथ बैठ कर चलूंँगा। मुझे लगा! जैसे भगवान ने ही हमारी मदद के लिए इस युवको भेजा हो, नहीं तो जहां ट्रेनों में सीट के लिए मारा-मारी रहती है, वहाँ एक युवक हमारे लिए अपनी सीट देने का प्रस्ताव क्यों करता?
हाँ! उन युवकों से हमें एक सीख अवश्य मिली, ‘‘अभी इन्सानियत मरी नहीं है। युवा पीढ़ी में अपने से बड़ों के लिए आदर व कर्तव्य भावना है, यह समाज के लिए ‘शुभ सकेत’ और हमारे लिए ‘शुभ् संदेश’ है, बशर्ते हम सब अपना कर्तव्य निभायें।