Tuesday, November 18, 2014

नदियों के किनारे स्थित तीर्थों का सम्यक विकास -डा॰ महेन्द्र प्रताप सिंह


हमारे देश के प्रायः सभी प्राचीन तीर्थस्थल नदियों के किनारे स्थित हैं। नदियों की स्वच्छता हेतु चलाए जा रहे विभिन्न प्रयत्नों के क्रम में नदियोें के किनारे स्थित तीर्थों के सम्यक विकास हेतु कुछ उपयोगी सुझाव निम्न प्रकार हैं -
1. स्वच्छता अभियान -  तीर्थस्थलों पर प्रायः अपेक्षित स्वच्छता नहीं रहती है। धार्मिक भावना से वहाँ के लोगों मुख्यतः साधु-सन्तों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं अन्य प्रबुद्ध लोगों के साथ स्वच्छता का कार्यक्रम चलाया जा सकता है। तीर्थे स्थलों के जलस्रोतों की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
2. पालीथीन मुक्ति - पालीथीन स्थाई गन्दगी का एक प्रमुख स्रोत है। यह हजारों वर्ष तक विघटित नहीं होता तथा गाय एवं अन्य जानवर इसे खाकर मर जाते हैं। धीरे-धीरे तीर्थस्थलों पर पालीथीन का प्रयोग समाप्त किया जाना चाहिए।
3. वृक्षारोपण - तीर्थों को हरा-भरा किया जाना आवश्यक है। तीर्थस्थल स्थित नदी तट पर धार्मिक एवं पर्यावरणीय महत्व की प्रजातियों जैसे- पीपल, पाकड़, बरगद, गूलर आदि एवं लुप्त हो रही प्रजातियों जैसे- कैथा, बड़हल, खिरनी आदि का रोपण किया जाना चाहिये। विभिन्न देवी, देवताओं से जुड़े पौधों का रोपण एवं यदि देखरेख की व्यवस्था हो तो विशिष्ट प्रजातियाँ जैसे- रुद्राक्ष एवं कल्पवृक्ष आदि का रोपण किया जाना चाहिये।
4. चढ़ाए गये फूल आदि का उपयोग - मुख्य मन्दिरों से बड़ी मात्रा में फूल, माला आदि निकलते हैं। इनसे अगरबत्ती एवं धूपबत्ती बनाई जाती हैं। इस कार्य से मन्दिर की सफाई के साथ-साथ स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता है।
5. जलस्रोतों में विसर्जन को हतोत्साहित करना - नदियों एवं पवित्र सरोवर आदि में मूर्तियों एवं प्रयोग की जा चुकी हवन सामग्री को विसर्जित करने की परम्परा है। इसी के साथ बड़ी मात्रा में पालीथीन थैली भी जलस्रोतों में डाल दी जाती हैं। इसे प्रत्येक दशा में रोका जाना चाहिए। इस दिशा में किये गये कतिपय कार्यों का उल्लेख यहाँ पर किया जा रहा है -
माँ चन्द्रिका देवी मन्दिर - लखनऊ से लगभग 30 कि0मी0 दूर बक्शी के तालाब के आगे माँ चन्द्रिका देवी शक्तिपीठ परिसर स्थित है। मन्दिर समिति एवं स्थानीय लोगों के साथ बैठक कर सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि दिनाँक 28.09.2011 से इस परिसर को पालीथीन मुक्त किया जायगा। उसके बाद आस-पास के कुम्हारों के साथ बैठक कर कुल्हड़ आपूर्ति की व्यवस्था की गई। पालीथीन थैली के विकल्प रूप में दुकानदारों को कागज एवं वैकल्पिक थैले उपलब्ध कराये गये। इस प्रकार प्रथम चरण में दुकानों पर पालीथीन कप के स्थान पर कुल्हड़ लाये गये तथा पालीथीन थैलियों के स्थान पर कागज एवं अन्य थैलों का प्रयोग प्रारम्भ किया गया। स्थाई रूप में इस परिसर को पालीथीन मुक्त बनाने के लिये स्थानीय ग्रामवासियों, मन्दिर समिति के लोगों एवं दुकानदारों को दिनाँक 28.09.2011 को नवरात्रि के प्रथम दिवस पर मेरे आध्यात्मिक गुरु सन्त स्वामी महेशानन्द जी द्वारा परिसर को पालीथीन मुक्त करने की शपथ दिलाई गई। इस समय तक परिसर में दुकानों को पालीथीन मुक्त किया जा चुका है। श्रद्धालुओं एवं भक्तों द्वारा पालीथीन का प्रयोग रुकवाने एवं मेला के दिनों में बाहर से आने वालों सेे पालीथीन रुकवाने की दिशा में मन्दिर समिति के सहयोग से प्रयास जारी है।
दिनाँक 28.09.2011 को ही स्वामी जी द्वारा कृष्णवट का रोपण कर परिसर में वृक्षारोपण का शुभारम्भ कर दिया गया जो अब वृक्ष का रूप ले रहे हैं। गोमती तट पर जल भराव वाले क्षेत्र में अर्जुन का रोपण किया गया एवं मन्दिर के आस-पास पीपल, पाकड़ एवं बरगद के साथ-साथ कैथ, बड़हर एवं आमरा जैसी अनेक लुप्त हो रही प्रजातियों को रोपित किया गया। धार्मिक महत्व को देखते हुये यहाँ कल्पवृक्ष, रुद्राक्ष, सिन्दूर का भी रोपण किया गया है। सभी प्रजातियाँ न केवल जीवित हैं बल्कि अच्छी दशा में चल रही हैं।
यहाँ पर चाय आदि की दुकानों पर मिट्टी के कुल्हड़, चाट की दुकानों पर पत्तल एवं अन्य दुकानों पर कागज के थैलों का व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। इससे वहाँ होने वाली गन्दगी में कमी आयी है।
मन्दिर परिसर में चढ़ाए गए फूलों से अगरबत्ती एवं धूपबत्ती बनाने का कार्य किया जा रहा है। अन्य मन्दिर से जुड़े लोगों को दिखाकर यह कार्य अन्यत्र भी प्रारम्भ किया जाना चाहिये।
नैमिशारण्य  - उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में स्थित नैमिशारण्य एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन तीर्थस्थल है। यह प्राचीन ऋषियों की तपस्थली रही है।
परिक्रमा पथ पर स्थानीय लोगों एवं वन विभाग के सहयोग से 88000 ऋषियों की स्मृति में 88000 पौधांें का रोपण कराया गया। दिनाँक 29 दिसम्बर सन् 2012 को नैमिशारण्य के प्रमुख साधु सन्त, व्यापार मण्डल के प्रतिनिधि गण एवं गणमान्य लोगों ने माँ चन्द्रिकादेवी मन्दिर परिसर में आकर वहाँ पर पालीथीन के विकल्प प्रयोग तथा वहाँ गोमती नदी के किनारे किये जा रहे रोपण कार्य को देखा। दिनाँक 27 जनवरी 2013 को पालीथीन के विकल्प के विक्रेता के साथ मैं नैमिशारण्य पहुँचा। इस सभा में पहला आश्रम के महन्त जी एवं अन्य कई लोगों ने पालीथीन के विकल्प के रूप में प्रयोग की जाने वाली थैलियाँ खरीदीं। दिनाँक 8 मार्च 2013 को माँ ललितादेवी परिसर को पालीथीन मुक्त करने का आदेश रिसीवर से निर्गत होने से पालीथीन मुक्ति की दिशा में एक सार्थक प्रयास प्रारम्भ हुआ।
गोमती के तट पर शमशानघाट के निकट स्थानीय गणमान्य नागरिकों के सहयोग से भूमि का प्रस्ताव प्राप्त कर 05 हे0 क्षेत्र में वन विभाग एवं स्थानीय लोगों के सहयोग से विधिवत् पौधारोपण कार्य कराया गया जिससेे उसे अतिक्रमण से भी बचाया जा सका है। इसके अतिरिक्त बालाजी मन्दिर परिसर में पंचवटी, नवग्रह वाटिका एवं नक्षत्र वाटिका की स्थापना कराई गई है।
उक्त के अतिरिक्त गोमतीपार क्षेत्र स्थित पहला आश्रम की भूमि पर भी व्यापक रोपण कराया गया। नैमिशारण्य से थोड़ी दूर स्थित रुद्रावर्त मन्दिर के पास हरिशंकरी स्थापित की गई। यहाँ पर रोपित सभी पौध सुरक्षित एवं प्रफुल्लित हैं।
वृन्दावन -  यहाँ पर विशेष प्रयास करके वन विभाग की सहायता से 2013 वर्षाकाल में 119 एकड़ क्षेत्र में पौधारोपण कार्य कराया गया।
धौम्य ऋषि आश्रम, धोबियाघाट - हरदोई जनपद में गोमती के तट पर स्थित धोबियाघाट एक अद्भुत स्थान है- पहला यहाँ भूमि से अनेक पानी के सोते निकलते हैं जो बाद में गोमती नदी में मिलते हैं तथा दूसरा गोमती के तट पर स्थित मन्दिर के सघन वन क्षेत्र को देखकर प्राचीन आश्रमों की परिकल्पना साकार रूप लेती है। पालीथीन बन्द करने का अभियान यहाँ भी प्रारम्भ हो गया।
सैलानी माता मन्दिर - लखनऊ से लगभग 20 कि0मी0 दूर बाराबंकी जिले में गोमती नदी के तट पर सैलानी माता का मन्दिर स्थित है। वर्ष 2014 वर्षाकाल में यहाँ पर धार्मिक महत्व के एवं लुप्त हो रही वृक्ष प्रजातियों के व्यापक पौधारोपण की योजना बनायी गयी। उक्त पौधारोपण हेतु मन्दिर समिति द्वारा यहाँ पर रोपण हेतु वृत्ताकार खाईं खुदवाई गयी। दिनाँक 04.05.2014 को मन्दिर समिति के अध्यक्ष श्री रामदुलारे यादव एवं मन्दिर के मुख्य पुजारी श्री वासुदेव जी द्वारा रुद्राक्ष के पौधे का रोपण कर पौध रोपण का शुभारम्भ किया गया। दिनाँक 20.07.2014 को सैलानी माता मन्दिर परिसर में कल्पवृक्ष, पारिजात (हरसिंगार), हरिशंकरी (पीपल, पाकड़ एवं बरगद), कैथ, खिरनी, कनकचम्पा, मौलश्री, खैर, बड़हल, गूलर आदि प्रजातियों का रोपण किया गया।
भविष्य के कार्यक्रम -
1. रायबरेली जनपद में सई नदी के किनारे स्थित भौरेश्वर महादेव मन्दिर परिसर में धार्मिक महत्व की प्रजातियों का रोपण।
2. सैलानी माता मन्दिर परिसर में पालीथीन मुक्ति का कार्य।
3. उपरोक्त मन्दिरों में कभी-कभी सफाई कार्य किया जाना। ु
- उप वन संरक्षक, कार्यालय प्रमुख व संरक्षक, 17, राणा प्रताप मार्ग, उŸार प्रदेश, लखनऊ।