Tuesday, March 25, 2014

प्रलय संकेतों पर गौर कीजिए - हृदय नारायण दीक्षित

प्रकृति की शक्तियां देवता हैं, हिमालय देवालय और उत्तराखंड देवभूमि है। फिर, क्या वजह हो सकती है - इन्द्र के कोप की? ऋगवेद के इन्द्र अविरल जल प्रवाह में आनन्दित होते हैं। वृत्ति जल प्रवाह रोकते हैं। इन्द्र उनका वध करते हैं।
वैदिक ऋषियों नें जल की आराधना की है। उन्हे जल माताएं कहा है। बीच में आ गये जल अवरोधक शत्रु। नदियों पर जगह-जगह बांँध बने। जहां नदियां बहती थीं, मन्त्र गूंजते थे, योग, ध्यान और उपासनाएं चलती थीं, वहांँ नदी क्षेत्र में होटल बने। जल, जंगल और जमीन आधुनिक वृत्तासुर अपने कब्जे में लेने लगे।
भगीरथ का तप था कि गंगा उतरीं। यहां वन संरक्षित थे। कथित विकास के नाम पर वन काटे, पहाड़ उजाड़े। डायनामाइट चलाकर पहाड़ और धरती का अन्तस्थल छलनी किया। अर्थववेद के भूमिसूक्त में अर्थवा ने पृथ्वी से कहा ‘हे माता! यज्ञ और मंगल कार्योंं के लिए आपको खोदते हैं, अपको चोट न लगे। हम क्षमा प्रार्थी हैं। पर आज प्रकृति बिरूद्ध जो कुछ हो रह है, हम सबने इसे विकास कहा। वही विकास विनाश के रूप में सामने है।
प्रकृति को जल अवरोध स्वीकार नहीं। ऋगुवेद का ‘वृत्त’ प्रतीक ध्यान देने योग्य है। एक मन्त्र में ‘वृत्त’ का शरीर बहुत व्यापक बताया है। मुनाफाखोर सभ्यता का शरीर भी बहुत बड़ा है। ऋगुवेद (1.52 व 8.12) के अनुसार इन्द्र उनका वध करते हैं और नदी प्रवाह के अवरोध हटाकर बहाव सुनिश्चित करते हैं। हमारे पूर्वजों का ध्यान जल की हर एक गतिविधि पर था। मेंघों पर, मेंघों में दमकती विद्युत पर, वर्षा की बूंदों पर, नदियों और समुद्रो पर भी, लेकिन आधुनिक विकास के मालिकों का ध्यान सिर्फ मुनाफे पर ही है।
शिव ने रोका था गंगा के उद्दाम वेग को और जितना जरूरी था भगीरथी का उतना प्रवाह ही नीचे आया। आज उस संस्कृति के मर्म को समझने हेतु भारत के प्रथम प्रज्ञा पुरूष मनु का संदेश ध्यान देने योग्य है। वह कहते हैं- ‘‘प्रकृति के सभी जीवों, शक्तियों और नियमों का सम्मान करना ही होगा।’’ हम सब भारतवासी इसी प्रकाश में देव भूमि पर आये प्रलय संकेतों को समझें ंऔर आगे का मार्ग प्रशस्त करें।