इस समस्त सृष्टि में सूक्ष्म से लेकर स्थूल तक प्रत्येक चर-अचर, जड़-चेतन सापेक्ष्तया एक दूसरे से सम्बद्ध हैं। एक के अस्तित्व के लिए दूसरे का अस्तित्ववान होना, एक के संवर्धन हेतु दूसरे का संरक्षण तथा एक के विकास के लिए दूसरे का विकास आवश्यक है। जैसा कि सर्वविदित है कि जीवन तथा जैविक परिस्थितियों के लिए पंचभौतिक संघटन में समसंतुलन और सामंजस्य आवश्यक है। उसके अभाव में ब्रह्माण्ड में किसी ग्रहोपग्रह पर जीवन सम्भव नहीं। उदाहरणार्थ सूर्य अग्निस्वरूपात्मक होने के कारण ऊर्जा का अनन्त स्रोत भले ही हो, किन्तु प्राणियों की जीवनोत्पत्ति के अनुकूल स्थान नहीं। इसी प्रकार चन्द्रमा सोमात्मक स्वरूप होने के कारण सौम्य, आह्लाद तथा पर्जन्य का हेतु होने पर भी जैविक पर्यावरण के अनुकूल अभी तक नहीं है। इसी मंगलादि ग्रहों पर भी पर्याप्त प्राणवायु के अभाव में आज जीवन नहीं है। कथन का तात्पर्य यह है, कि जब तक किसी ग्रह पर पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश एक दूसरे के अस्तित्व के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न नहीं करते तभी तक वहाँ का पर्यावरण प्राणियों के लिए जीवन प्रद होता है।
आज के 50 वर्ष पूर्व तक अपनी पृथ्वी पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का भय आज की तुलना में अत्यल्प था। अतः ऋतुयें प्रायः समय से आती थीं। पर्याप्त तथा ऋत्वानुकूल वर्षा, ग्रीष्म और शीत वार्षिक ऋतुचक्र में सन्तुलन रखती थी। किन्तु औद्योगिक विश्व की संकल्पना और विकास के नाम पर परम्पराओं की उपेक्षा के कारण ताप की अ¬िधकता विश्वस्तर पर जीव प्रजातियों के लिए अस्तित्व का प्रश्न बन कर उपस्थित हो रही है।
ताप को संतुलित रखने में जल की भूमिका विभिन्न रूपों में रही है। कभी हिम के रूप में वायुमण्डलीय ताप का नियन्त्रक, कभी तुषार आदि के रूप में अन्तरिक्ष में व्याप्त तेज का शामक तथा कभी मेघवृष्टि के रूप में धरती के पृष्ठवर्ती तथा अन्तवर्ती ताप को दूर करने वाला जल पर्यावरण संतुलन का प्रमुख घटक है। वायुमण्डल में सूर्य की किरणों के उग्र तेज को सह्य बनाने वाला तŸव जल ही है।
द्रव रूप में उपस्थित जल प्राणियों का सर्वविध उपकारक ही नहीं, अपितु जीवना धारक है। भोजन, स्नान, वस़्त्रधावन, गृहशुद्धि, पान आदि प्रत्येक दैनन्दिन कार्य का साधक होने के कारण जल को जीवन का पर्याय मान लिया गया। पुष्प-फल-औषधि-अन्न आदि की प्राप्ति के लिए जल अपरिहार्य द्रव्य है। अतः दीर्घ कालीन जैविक परिस्थितियों के लिए संसाधन के रूप में जल का संरक्षण मानव मात्र का दायित्व ही नहीं, धर्म भी है।
दुर्भाग्यवश आज धरती पर जल की मात्रा का तो निरन्तर ह्रास हो ही रहा है, साथ ही शुद्ध जल की मात्रा अत्यन्त अपर्याप्त है। जल के परंपरागत स्रोत विशेषतः मानवकृत धर्म के परिणाम स्वरूप उत्खनित तालाब, कुएँ, बावली आदि नष्टप्राय हैं। पर्वतों से छेड़-छाड़ के कारण निझर-स्रोतों में भी न्यूनता आई है। बढ़ते हुए वैश्विक ताप के कारण पिघलते हुए हिमशैलों के कारण वाही स्रोतों का अस्तित्व भी संकट में है। ऐसी चिन्ताजनक स्थिति में वही स्रोतों के रूप में नदियों का संरक्षण विचारणीय विषय है।
नदियाँ आदि काल से उपलब्ध जल के प्राकृतिक वाही संसाधन के रूप में मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती रही हैं। विभिन्न पर्वतों से बहने वाली नदियों के गुण उन-उन पर्वतों के वानस्पतिक गुणों से युक्त होने के साथ ही अपने प्रवाह क्षेत्र के पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि हिमालय के अंक से निकल कर भारत के सबसे बड़े भूभाग को तृप्त करने वाली गंगा जी का जल हिमालय में विकसित होने वाली वनस्पतियों तथा औषधियों के कारण आज भी इतना पवित्र है कि वर्षों सुरक्षित रखने पर भी गंगाजल में कीटाणु नहीं पनपते। यही स्थिति अन्य पवित्र (शुद्ध जल) नदियों की भी है। किन्तु अपने उद्गम से दूर होते ही मानवीय अधर्माचरण के कारण नदियों का जल भी दूषित हुए विना नहीं रहता। परिणाम यह होता है कि, जिन नदियों पर जनजीवन (कमसे कम भारत वर्ष में तो अवश्य) सर्वाधिक आश्रित रहता है उनके दूषित होने से सम्बन्धित क्षेत्र का भौतिक तथा जलवायवीय पर्यावरण भी दूषित हो जाता है। उदाहरणार्थ कानपुर में गंगा तथा आगरा व दिल्ली में यमुना का जल अपेय की सीमा तक दूषित हो चुका है।
पर्यावरण सरंक्षण के परिपे्रक्ष्य में नदियों की चर्चा के प्रसंग में उल्लेखनीय है कि, आज बुद्धिजीवी, समाजसेवी तथा वैज्ञानिक एकमत से जहाँ नदी संरक्षण की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं; वहीं यह भी चिन्तनीय है कि मात्र कुछ दशाब्दियों में ही यह स्थिति क्यों आई? जिस देश में गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी के पवित्र जल के सन्निधान की प्रत्येक जल में कामना की जाती है, उस देश में नदियां असहाय सी अपनी रक्षा के लिए देश की जनता का मुख देख रही हैं।
नदियां, पृथ्वी शरीर की नाडि़यां हैं; जिसमें पृथ्वीवासियों के प्राणवाहक दृव्य का संचार होता है। यदि नाड़तन्त्र ही अवरूद्ध प्रवाहवाला तथा अशुद्ध हो जायेगा तो शरीर के स्वास्थ्य की कल्पना असंभव है। अतः गुणकारी अन्न के उत्पादन तथा मानवीय स्वास्थ्य के लिए नदी संरक्षण तथा उन्हें प्रदूषण मुक्त करना आवश्यक है। वस्तुतः संरक्षण के दो अंश हैं; शोधन तथा संवर्धन। इसके लिए निश्चय ही तात्कालिक उपाय पर्याप्त प्रभावकारी नहीं हो सकते, क्योंकि रोग के निदान तथा उपचार से अधिक उससे वचाव अधिक आवश्यक है; जो सम्पूर्ण जीवनशैली द्वारा निर्धारित होता है।
खेद का विषय है कि, हम आज अपनी उस परंपरागत जीवनशैली को भूल गए हैं; जिसका एक-एक अंग आत्माहित तथा लोकहित के लिए था। मानव सभ्यता के प्रथम चरण में हमारे मनीषियों ने जल के महŸव तथा नदी जल की उपादेयता को स्वीकार किया है। यही कारण है कि, न केवल प्राचीन सभ्यताओं का विकास नदियों के तट पर हुआ, अपितु मानव ने देवता के रूप में नदियों की पूजा-स्तुति तथा उपासना की। नदी तटों पर तीर्थों की स्थापना तथा उनकी पवित्रता को बनाए रखने का धर्माचरण इसका प्रमाण है।
धरती के वक्ष पर निर्बाध प्रवाहित होने वाली धारा के रूप में नदियों के जिस तटीय क्षेत्र पर मानववस्तियों का निर्माण हुआ, वहाँ नदी की धारा को निर्मल तथा स्वच्छ रखने के लिए अनेक धर्मशास्त्रीय विधिनिषेधों की कल्पना की गई।
मनु ने सूत्र रूप में ‘नदी वेगेन शुद्धयति’ कहकर संकेत किया कि नदी का प्रवाह ही उसकी शुद्धता का हेतु तथा प्रमाण है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करें, तो वेगजन्य आघात अविलेय पदार्थों को बहिष्कृत कर विजातीय विलेयों को भी पृथक् करता है। किन्तु, दूसरी ओर नदी-जल में तथा उसके तीर पर भी अमेेेध्य वस्तुओं यथा मल-मूत्र, स्ष्ठीवन, लोहित, वीर्य, मृत पशु-पक्षी आदि का विसर्जन वर्जित बताया गया है। यहाँ तक कि नदी पर सेतु (बाँध) बनाना भी उचित नहीं कहा गया। नदी के ‘वेग’ की रक्षा की दृष्टि से यह उचित ही प्रतीत होता है। कहना न होगा कि अनपेक्षित पदार्थों के क्षेपण तथा अनावश्यक रूप से जल प्रवाह की प्राकृतिक धारा का अवरोध जल प्रदूषण का कारण हो सकता है।
तीर्थों के माध्यम से नदियों को प्रदूषण रहित रखने का स्थायी प्रयास अपने मनीषियों की सरल तथा सहज जीवन शैली को व्यक्त करता है। वर्तमान समय के समान पहले नदी तटों पर अमेध्य व्यवसायों (चर्म आदि) को धर्म विरूद्ध समझा जाता था।
इस प्रकार पर्यावरण की दृष्टि से नदियों को शुद्ध रखने तथा उनके शुद्ध जल से पाश्र्ववर्ती पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए तीर्थों, देवालयों, तथा नदियों के समीप वृक्षारामों की कल्पना भारतीय परम्परा रही है। आज व्यावसायिक पर्यटन तथा विनोदार्थ नदी तटों के उपयोग के स्थान पर उक्त धार्मिक परम्परा को पुनुरूज्जीवित करने की आवश्यकता है।
आज के 50 वर्ष पूर्व तक अपनी पृथ्वी पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का भय आज की तुलना में अत्यल्प था। अतः ऋतुयें प्रायः समय से आती थीं। पर्याप्त तथा ऋत्वानुकूल वर्षा, ग्रीष्म और शीत वार्षिक ऋतुचक्र में सन्तुलन रखती थी। किन्तु औद्योगिक विश्व की संकल्पना और विकास के नाम पर परम्पराओं की उपेक्षा के कारण ताप की अ¬िधकता विश्वस्तर पर जीव प्रजातियों के लिए अस्तित्व का प्रश्न बन कर उपस्थित हो रही है।
ताप को संतुलित रखने में जल की भूमिका विभिन्न रूपों में रही है। कभी हिम के रूप में वायुमण्डलीय ताप का नियन्त्रक, कभी तुषार आदि के रूप में अन्तरिक्ष में व्याप्त तेज का शामक तथा कभी मेघवृष्टि के रूप में धरती के पृष्ठवर्ती तथा अन्तवर्ती ताप को दूर करने वाला जल पर्यावरण संतुलन का प्रमुख घटक है। वायुमण्डल में सूर्य की किरणों के उग्र तेज को सह्य बनाने वाला तŸव जल ही है।
द्रव रूप में उपस्थित जल प्राणियों का सर्वविध उपकारक ही नहीं, अपितु जीवना धारक है। भोजन, स्नान, वस़्त्रधावन, गृहशुद्धि, पान आदि प्रत्येक दैनन्दिन कार्य का साधक होने के कारण जल को जीवन का पर्याय मान लिया गया। पुष्प-फल-औषधि-अन्न आदि की प्राप्ति के लिए जल अपरिहार्य द्रव्य है। अतः दीर्घ कालीन जैविक परिस्थितियों के लिए संसाधन के रूप में जल का संरक्षण मानव मात्र का दायित्व ही नहीं, धर्म भी है।
दुर्भाग्यवश आज धरती पर जल की मात्रा का तो निरन्तर ह्रास हो ही रहा है, साथ ही शुद्ध जल की मात्रा अत्यन्त अपर्याप्त है। जल के परंपरागत स्रोत विशेषतः मानवकृत धर्म के परिणाम स्वरूप उत्खनित तालाब, कुएँ, बावली आदि नष्टप्राय हैं। पर्वतों से छेड़-छाड़ के कारण निझर-स्रोतों में भी न्यूनता आई है। बढ़ते हुए वैश्विक ताप के कारण पिघलते हुए हिमशैलों के कारण वाही स्रोतों का अस्तित्व भी संकट में है। ऐसी चिन्ताजनक स्थिति में वही स्रोतों के रूप में नदियों का संरक्षण विचारणीय विषय है।
नदियाँ आदि काल से उपलब्ध जल के प्राकृतिक वाही संसाधन के रूप में मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती रही हैं। विभिन्न पर्वतों से बहने वाली नदियों के गुण उन-उन पर्वतों के वानस्पतिक गुणों से युक्त होने के साथ ही अपने प्रवाह क्षेत्र के पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि हिमालय के अंक से निकल कर भारत के सबसे बड़े भूभाग को तृप्त करने वाली गंगा जी का जल हिमालय में विकसित होने वाली वनस्पतियों तथा औषधियों के कारण आज भी इतना पवित्र है कि वर्षों सुरक्षित रखने पर भी गंगाजल में कीटाणु नहीं पनपते। यही स्थिति अन्य पवित्र (शुद्ध जल) नदियों की भी है। किन्तु अपने उद्गम से दूर होते ही मानवीय अधर्माचरण के कारण नदियों का जल भी दूषित हुए विना नहीं रहता। परिणाम यह होता है कि, जिन नदियों पर जनजीवन (कमसे कम भारत वर्ष में तो अवश्य) सर्वाधिक आश्रित रहता है उनके दूषित होने से सम्बन्धित क्षेत्र का भौतिक तथा जलवायवीय पर्यावरण भी दूषित हो जाता है। उदाहरणार्थ कानपुर में गंगा तथा आगरा व दिल्ली में यमुना का जल अपेय की सीमा तक दूषित हो चुका है।
पर्यावरण सरंक्षण के परिपे्रक्ष्य में नदियों की चर्चा के प्रसंग में उल्लेखनीय है कि, आज बुद्धिजीवी, समाजसेवी तथा वैज्ञानिक एकमत से जहाँ नदी संरक्षण की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं; वहीं यह भी चिन्तनीय है कि मात्र कुछ दशाब्दियों में ही यह स्थिति क्यों आई? जिस देश में गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु तथा कावेरी के पवित्र जल के सन्निधान की प्रत्येक जल में कामना की जाती है, उस देश में नदियां असहाय सी अपनी रक्षा के लिए देश की जनता का मुख देख रही हैं।
नदियां, पृथ्वी शरीर की नाडि़यां हैं; जिसमें पृथ्वीवासियों के प्राणवाहक दृव्य का संचार होता है। यदि नाड़तन्त्र ही अवरूद्ध प्रवाहवाला तथा अशुद्ध हो जायेगा तो शरीर के स्वास्थ्य की कल्पना असंभव है। अतः गुणकारी अन्न के उत्पादन तथा मानवीय स्वास्थ्य के लिए नदी संरक्षण तथा उन्हें प्रदूषण मुक्त करना आवश्यक है। वस्तुतः संरक्षण के दो अंश हैं; शोधन तथा संवर्धन। इसके लिए निश्चय ही तात्कालिक उपाय पर्याप्त प्रभावकारी नहीं हो सकते, क्योंकि रोग के निदान तथा उपचार से अधिक उससे वचाव अधिक आवश्यक है; जो सम्पूर्ण जीवनशैली द्वारा निर्धारित होता है।
खेद का विषय है कि, हम आज अपनी उस परंपरागत जीवनशैली को भूल गए हैं; जिसका एक-एक अंग आत्माहित तथा लोकहित के लिए था। मानव सभ्यता के प्रथम चरण में हमारे मनीषियों ने जल के महŸव तथा नदी जल की उपादेयता को स्वीकार किया है। यही कारण है कि, न केवल प्राचीन सभ्यताओं का विकास नदियों के तट पर हुआ, अपितु मानव ने देवता के रूप में नदियों की पूजा-स्तुति तथा उपासना की। नदी तटों पर तीर्थों की स्थापना तथा उनकी पवित्रता को बनाए रखने का धर्माचरण इसका प्रमाण है।
धरती के वक्ष पर निर्बाध प्रवाहित होने वाली धारा के रूप में नदियों के जिस तटीय क्षेत्र पर मानववस्तियों का निर्माण हुआ, वहाँ नदी की धारा को निर्मल तथा स्वच्छ रखने के लिए अनेक धर्मशास्त्रीय विधिनिषेधों की कल्पना की गई।
मनु ने सूत्र रूप में ‘नदी वेगेन शुद्धयति’ कहकर संकेत किया कि नदी का प्रवाह ही उसकी शुद्धता का हेतु तथा प्रमाण है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करें, तो वेगजन्य आघात अविलेय पदार्थों को बहिष्कृत कर विजातीय विलेयों को भी पृथक् करता है। किन्तु, दूसरी ओर नदी-जल में तथा उसके तीर पर भी अमेेेध्य वस्तुओं यथा मल-मूत्र, स्ष्ठीवन, लोहित, वीर्य, मृत पशु-पक्षी आदि का विसर्जन वर्जित बताया गया है। यहाँ तक कि नदी पर सेतु (बाँध) बनाना भी उचित नहीं कहा गया। नदी के ‘वेग’ की रक्षा की दृष्टि से यह उचित ही प्रतीत होता है। कहना न होगा कि अनपेक्षित पदार्थों के क्षेपण तथा अनावश्यक रूप से जल प्रवाह की प्राकृतिक धारा का अवरोध जल प्रदूषण का कारण हो सकता है।
तीर्थों के माध्यम से नदियों को प्रदूषण रहित रखने का स्थायी प्रयास अपने मनीषियों की सरल तथा सहज जीवन शैली को व्यक्त करता है। वर्तमान समय के समान पहले नदी तटों पर अमेध्य व्यवसायों (चर्म आदि) को धर्म विरूद्ध समझा जाता था।
इस प्रकार पर्यावरण की दृष्टि से नदियों को शुद्ध रखने तथा उनके शुद्ध जल से पाश्र्ववर्ती पर्यावरण को शुद्ध रखने के लिए तीर्थों, देवालयों, तथा नदियों के समीप वृक्षारामों की कल्पना भारतीय परम्परा रही है। आज व्यावसायिक पर्यटन तथा विनोदार्थ नदी तटों के उपयोग के स्थान पर उक्त धार्मिक परम्परा को पुनुरूज्जीवित करने की आवश्यकता है।





