Monday, March 3, 2014

आज जल नीति में संशोधन की आवश्यकता - म॰ वि॰ कुबड

बढ़ते हुए जल संकट से बचने के लिए जल नीति में संशोधन की आवश्यकता है, जिसके कुछ पहलू इस प्रकार हो सकते हैं - 1.कृषि नीति में परिवर्तन किया जाये, जिसमें पानी की उपलब्धतानुसार फसलों व कम पानी की मांग वाली खादों के प्रयोग पर बल हो। 2.अत्यधिक रसायनिक खादों व कीटनाशकों के प्रयोग को कम करने के लिए जैविक खेती को ्रोत्साहित करने की नीति अपनाई जाये। 3.बड़े बांधों के साथ-साथ छोटे-छोटे बांध बनाये जायें, जिससे पर्यावरण को कम क्षति पहुँचे। 4.गांवों में तालाबों को ठीक किया जाये तथा नये बनाये जायें, जिनमें वर्षा जल का भरपूर संग्रह िया जा सके। 5.नहरों से निकलने वाली नालियों से पानी की बर्बादी को रोकने के लिए सभी नालियाँ, गूल पक्की की जायें। 6.शहर के गंदे नालों, गटरों का पानी नदियों में न मिलाकर उसे शोधित कर, पुनः अन्य कार्यो में प्रयोग किया जाये, इस हेतु सभी नगरों में शोधक संयन्त्र लगाये जायें। शोध यन्त्रों का संचालन सौर ऊर्जा से हो। 7.नदियों में आज जल की कमी के कारण उसकी स्वच्छता के लिए परंपरागत कार्यों के निषेध पर भी विचार कर,गरपालिकाओं, नगर व ग्राम पंचायतों की मदद से नदियों में शव, अधजले शव, राख आदि प्रवाहित करने से रोकने के लिए स्थायी हल निकाला जाना चाहिए। 8.उद्योगों, कल-कारखानों से निकलने बाले प्रदूषित जल के शोधन के लिए आवश्यक रूप से जल शोधक संयन्त्र लगना और उनका ठीक व नियमित संचालन सुनिश्चित होना चाहिए। शोध यन्त्रों का संचालन सौर ऊर्जा से करना चाहिए। 9.उद्योगों में स्वच्छ पेयजल के उपयोग के स्थान पर वैकल्पिक जल का उपयोग हेतु नियम बनाए जाऐं।