Saturday, March 8, 2014

लौह पुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल के सपनों का भारत - श्रीकृष्ण चैधरी

भारत की स्वतन्त्रा के बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल देश के प्रथम प्रधान मन्त्री होते तो शायद आज अखण्ड भारत का स्वरूप हमारे सामने होता। आजादी के बाद 565 रियासतों को परस्पर विलय करके एक सुदृढ़ भारत बनाना गम्भीर चुनौती थी। सरदार पटेल ने 5 जुलाई, 1947 को देशी रियासतों के लिए एक नये विभाग की स्थापना की तथा वी.पी.मेनन को इसका सचिव नियुक्त किया गया। पटेल ने नवाबों और नरेशों को एक मार्मिक पत्र लिखकर आग्रह किया कि सब लोग समान हितों की रक्षा के लिए मैत्री और सहयोग की भावना से संविधान सभा में शामिल हो जायें। इसके लिए कुछ ऐसे राजाओं और उनके मन्त्रियों की एक बैठक 10 जुलाई 1947 को पटेल जी ने अपने घर पर बुलाई, जो राष्ट्रीय भावना से प्रेरित थी। उन्हांेने बहुत ही होशियारी से बैठक में सर्व सम्मति से यह प्रस्ताव पारित करवा कर समाचार पत्रों में प्रसारित करवाया कि इन लोगों ने सुरक्षा, यातायात तथा विदेश सम्बन्ध के मामलों में भारत संघ के साथ रहने की इच्छा प्रकट की है, जिसका एक अच्छा प्रभाव हुआ।
रियासतों का एक संगठन था चैम्बर आफ प्रिन्सेज, जिसका अध्यक्ष भोपाल का नवाब था, जो मुस्लिमलीग से मिलकर अलग रणनीति बना रहा था। लेकिन सरदार पटेल ने 25 जुलाई को चैम्बर आफ प्रिन्सेज का एक विशेष अधिवेशन बुलाया।
इस अधिवेशन में बोलने के लिए माउन्ट बेटेन को उन्होंने पहले ही सहमत कर लिया था कि भौगोलिक अनिवार्यता के आधार पर रियासतों का भारत संघ में विलय हो। अपने सम्बोधन में माउन्ट बेटेन ने कहा कि बुद्धिमान शासक के रूप में आप सभी भारत संघ से ऐसे सम्बन्ध स्थापित कर लंे जिससे आपकी स्वतन्त्रता के आन्तरिक हित सुरक्षित रहे और सुरक्षा, यातायात और विदेश मामलों की समस्याओं से आप बचे रहें। वस्तुतः यही विजय सरदार की कूटनीतिक सफलता बन गई। जो ब्रिटिश हुकूमत नहीं चाहती वह सब कुछ माउंट बेटेन ने बोल दिया। क्योंकि सरदार पटेल ने 10 जुलाई की बैठक से ही इस प्रकार का वातावरण बना दिया था। मुस्लिम लीग के नेता पाकिस्तान पा कर भी अपनी भूख नहीं मिटा पा रहे थे। वायसराय का राजनैतिक विभाग षड़यंत्रकारियों के हौसले बढ़ा रहा था। उधर भोपाल का नवाब पाकिस्तान में शामिल होने का सपना पाले हुए था किन्तु उदयपुर उनके सपने में बाधक बना हुआ था। उदयपुर राज्य जो पश्चिम में जोधपुर व पूर्व में इंदौर तथा भोपाल के बीच की कड़ी था। इसिलिए जब तक उदयपुर के महाराणा भोपाल को उपनिवेश के रूप में स्थापित करने के लिए सहमत न हो जाए तब तक भोपाल के नवाब का सपना पूरा नहीं हो सकता था। जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर तीनों बड़े राज्य थे। इनकी सीमाएं भी पाकिस्तान से मिलती थी। जोधपुर राज्य भोपाल के नवाब की योजना में शामिल था, उसने उदयपुर के महाराणा को भी इस योजना में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। महाराणा प्रताप के इस वंशज ने जोधपुर नरेश को उत्तर दिया कि मेरा निर्णय तो मेरे पूर्वज ही कर गये हैं, यदि वे चाटुकारी करते तो घास की रोटियां खाकर भी अपने स्वाभिमान के लिए क्यों लड़ते? यदि वे चाटुकारी करते तो हैदरबाद जैसा राज्य हमारा होता। न उन्होंने चटुकारिता की न मैं करूंगा। उदयपुर राज्य भारत के साथ ही रहेगा। अधिकांश नरेशों ने विलय में समस्याएं नहीं खड़ी की किन्तु नवाबों की हरकते भारत के विरूद्ध ही रहीं। वी॰पी॰ मेनन ने लिखा है कि जोधपुर के महाराजा जिन्ना और मुस्लिम लीग से मिलते रहते थे। अन्तिम वार्ता के लिए वे जिन्ना के पास गए। जोधपुर नरेश अपने साथ जैसलमेर के महाराजा कुमार को भी साथ ले गए, क्योंकि बीकानेर नरेश उनके साथ जाने को तैयार नहीं हुए। जिन्ना ने सादे कागज पर हस्ताक्षर करके कागज हतवंत सिंह की ओर बढ़ा दिया कि विलय की शर्ते आप स्वयं लिख लो। हतवंत सिंह ने जैसलमेर के महाराजा कुमार से पूछा कि आप तो हमारा साथ देने के लिए तैयार है न? महाराजा कुमार ने कहा कि देखो यदि हिन्दु-मुसलमानों के बीच कोई भी झगड़ा हुआ तो मैं किसी भी कीमत पर हिन्दुओं के खिलाफ मुस्लिमों का साथ नहीं दूंगा। जोधपुर नरेश इस  बात को सुनकर हतप्रभ रह गए तथा जिन्ना से तीन दिन का समय मांगकर अपने राज्य वापस लौट गए। यहाँ जनता, सामंत और जमींदारों की आवाज जोधपुर के भारत में विलय की थी। किन्तु जोधपुर नरेश लालच में फंस गए थे। तीन दिन बाद जैसे ही जोधपुर नरेश हतवंत सिंह दिल्ली पहुँचे वैसे ही पटेल जी ने उनको अपने वश में कर लिया। क्योंकि सरदार जी को लग गया था कि ये नरेश नवाबों से मिल गया है। तब जाकर महाराज जोधपुर को लगा कि अब भलाई इसी में है कि भारत में शामिल हो जाया जाए। इस प्रकार से भी राज्यों के विलय हुए। जयपुर के राज प्रमुख को सवाई राजा का दर्जा देना पड़ा। मेवाड़, चित्तौड़, बीकानेर को महाराजा प्रमुख की उपाधि देनी पड़ी।
कम्यूनिस्टों ने ओडीशा और छत्तीसगढ़ के नरेशों को उकसाया जिससे 7 जनवरी, 1948 को कुछ नरेशों ने विलय के सम्बन्ध में माउन्ट बैटेन से शिकायत की। सरदार पटेल की दूरदर्शिता ने ओडीशा के 26 नरेशों से दो दिन के अन्दर ही विलय प्रस्तावों पर हस्ताक्षर करवा लिए। सरदार पटेल ने उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, प्रीवी पर्स और सम्पत्ति की रक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। जिसके परिणामस्वरूप युवा राजागण सरदार पटेल को अपने पिता की तरह श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखने लगे। छत्तीसगढ़ की 15 रियासतें तथा काठियावाड़ की 200 से अधिक छोटी-बड़ी रियासतों का विलय भी आनन-फानन में तीन दिन के अन्दर पूरा हो गया। इस विलय के बाद पटेल जी ने कहा था कि अब जनता और नरेश दोनों ही एक दूसरे के हितों का ध्यान रखें तथा सरकार दोनों का ध्यान रखेगी। ग्वालियर और इंदौर के शासकों में कुछ आपसी विवाद थें जिसका समाधान भी सरदार पटेल ने कर दिया।
पंजाब की पटियाला, नाभा, जींद आदि रियासतों ने अलग समूह बना लिया था। लेकिन 14 जनवरी, 1949 को राजपूतों को वीरता का स्मरण दिलाते हुए उन्होंने पूछा कि हम गुलाम क्यों बने? भारत माता बेडि़यों में क्यों जकड़ी गयी? हममें संकुचित भाव क्यो? अंततोगत्वा उनको अपना विलय भारत में करना पड़ा। भोपाल, जूनागढ़ और हैदराबाद के नवाब शराफत की भाषा मानने वाले संस्कारों में पले हुए नहीं थे। उनके प्रति पटेल ने भी कड़ा रूख अपनाया। उधर वायसराय का राजनीतिक विभाग भोपाल के नवाब की पीठ थपथपा रहा था। उनके प्रमुख कोनराड भोपाल के नवाब को तीसरी शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। सरदार पटेल ने इस षड़यन्त्र को परखकर सीधे वायसराय से कहा कि यदि आपके राजनीतिक विभाग को विलय में हस्ताक्षेप करना है तो मैं भारत संघ के राजनीतिक विभाग को बंद कर दूँ। इस पर वायसराय चैंक गये और उन्होंने तुरन्त कोनराड को इंगलैन्ड जाने का आदेश दिया। भोपाल के नवाब को भी इससे तगड़ा झटका लगा। पटेल जी ने दबाव बनाकर भोपाल के नवाब का भी विलय पत्र पर हस्ताक्षर करवाकर भारत संघ का हिस्सा बना दिया।
भारत संघ में विलय में सबसे अधिक पेंचीदगी हैदराबाद, जूनागढ़, जम्मू-कश्मीर और काठियावाड़ के दो देशी राज्य समस्या बने थे। लेकिन सरदार पटेल ने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति, राष्ट्रीयता एवं अपनी दूरदर्शिता पूर्ण नीति के चलते सभी रियासतों को भारत में विलय कराने में सफलता प्राप्त की। जवाहर लाल नेहरू ने मामले को उलझाने का कई बार असफल प्रयास जरूर किया था। सरदार पटेल का सम्पूर्ण जीवन प्रेरणा का पुंज है। जब सोमनाथ मन्दिर जीर्णोद्वार कराये बिना सरदार जी अपने बीच से चले गये, तब नेहरू द्वारा प्रघानमंत्री के रूप में अड़ंगा डालने के बाद भी तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था कि सरदार पटेल के सपने को अपना सपना मानकर उसे पूरा करने के लिए सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में मैं जरूर जाऊँगा। जिस भारत को टुकड़ों और तिनकों से जोड़कर पटेल जी ने सींचा है उस भारत को पुष्पवित, पल्लवित एवं रक्षा करने की जिम्मेदारी हम सभी भारतीयों की है। राष्ट्रीय विचारधारा के पोशक सरदार पटेल के देश में पाकिस्तान और चीन हमें आँखें दिखा रहें हैं, माँ भारती के भक्त पिटें, पाकिस्तानी हमारे सैनिकों का सिर कलम करके ले जाए, अकारण बार-बार सीमा पर गोलाबारी व घुसपैठ हो, हमारे हको पर डाका हो, देश लुटता रहे, रूपये की कीमतों में गिरावट, कमरतोड़ मंहगाई व भ्रष्टाचार से त्रस्त भारतीय क्या यही हमारे लौह पुरूष के प्रति हमारी श्रद्धान्जलि है? इस लौह पुरूष ने कभी भी पैसे, सत्ता व कुर्सी का मोह न करते हुए हमें हमेशा राष्ट्रीय एकता-अखण्डता का ही पाठ पढ़ाया, लेकिन आज हम उनके सपनों का अपमान कर रहें हैं। 31 अक्टूबर सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयन्ती के अवसर पर सभी भारतीय सम्मान के साथ इन राष्ट्र पुरूष को अपनी श्रद्धान्जलि अर्पित करते हुए उनके सपनों पूरा करने के लिए संकल्प लेते हैं।