लोकतन्त्र का अभ्युदय ही सामन्तवाद के विद्रोह के रूप में हुआ। लोकतन्त्र समता और समानता के सिद्धान्त पर आधारित है, जो प्रजा को नागरिक बना देता है। जहां विकसित लोकतन्त्रों में मन्त्री और सांसद आम आदमी की तरह घूमते नजर आते हैं, वहीं भारत में सामंती विशेषाधिकारों को पुनसर््थापित करने की कोशिशें जारी हैं। हर राजनैतिक दल और सरकार आम आदमी की बात करता है, किन्तु आम जन तथा अभिजन के फर्क को बढ़ाने का काम भी लगातार चलता रहता है। बराबरी का सिद्धान्त सबसे पहले 1976 के अमेरिकी स्वातन्त्रय संग्राम में आया, क्योंकि वहां सामन्तवाद का कोई इतिहास नहीं था। 1947 के अमेरिकी संविधान में समानता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया, हालांकि अश्वेतों को उनका हक नहीं दिया गया। यह नस्ल के आधार पर भेदभाव जरूर था। लेकिन संवैधानिक स्तर पर समानता के सिद्धान्त को स्वीकृति प्राप्त हुई। फ्रान्सीसी क्रान्ति को प्रेरणा मिली। एडमंड बर्क ने इस क्रान्ति के विरूद्ध ब्रिटिश संसद में भाषण दिया और एक किताब भी लिखडाली कि सत्ता विशिष्ट लोगों के हाथ में बनी रहनी चाहिए। इसके जबाव में थाॅमस पेन की चर्चित पुस्तक राइट्स आफ मैन 1771 में प्रकाशित हुई। पेन ने फान्सीसी क्रान्ति का जोरदार स्वागत करते हुए लिखा कि यदि सरकार आम आदमी के हितों की रक्षा करने में नाकाम रहती है तो जनता को हक है कि उसके विरूद्ध आन्दोलन करे। पेन के विरूद्ध ब्रिटेन में देशद्रोह का मुकदमा उनकी अनुपस्थिति में चला और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई, किन्तु फांसी दी नहीं जा सकी, क्योंकि वह फ्रांस में थे।
ब्रिटेन में वैसे तो लोकतन्त्र का प्रारम्भ 1688 क्रान्ति से ही माना जाता है। परन्तु वह सम्राट तथा संसद के बीच वर्चस्व की लड़ाई थी और संसद अभिजात्यवर्ग की ही प्रतिनिधि थी। पहले केवल कुलीनों को ही मताधिकार प्राप्त था। धीरे-धीरे अन्य वर्गों को यह अधिकार मिला। लेबर पार्टी के मजबूत होने पर वहां समाजवाद का भी अच्छा असर पड़ा। अंग्रजों ने अपने यहां तो सामन्ती व्यवस्था काफी हद तक खत्म कर दी, लेकिन अपने उपनिवेशों में जबर्दस्त सांमंतशाही की नींव ड़ाली। इसीलिए दिल्ली में वायसराय के लिए बनाया गया बंगला (जो अभी राष्ट्रपति भवन है) बंकिघम पैलेस से ज्यादा भव्य है। जिलों में कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों की विशाल कोठियां भी उसी की प्रतीक हैं। इसकी एक बजह यह भी थी कि भारत आने वाले अंग्रेजों में अधिकतर स्काटलैंड के थे जो उतने विकसित और संपन्न नहीं थे। इसीलिए उनमें सामंती प्रकृति कुछ ज्यादा ही थी।
स्वाधीनता संग्राम के नेता उदावाद मूल्यों को आत्मसात कर और बडे त्याग कर आन्दोलन में कूदे थे। महात्मा गांधी ने लंगोटी पहनकर स्वयं को आम लोगों से जोड़ा। 1921 की एक घटना है। मोतीलाल, नेहरू जी के साथ ट्रेन से इलाहाबाद से कोलकता जा रहे थे। वह द्वितीय श्रेणी में सफर कर रहे थे। गाड़ी जब पटना पहुँची तो जवाहरलाल नेहरू नीचे उतरकर प्लेटफार्म पर टहलने लगे। जहां उनकी मुलाकात राजेन्द्र प्रसाद से हो गई। राजेन्द्र प्रसाद बाबू भी कोलकता जा रहे थे और उन्होने तृतीय श्रेणी का टिकेट ले रखा था। जवाहर लाल उन्हें अपने पिता से मिलवाने ले गए। मोतीलाल ने राजेन्द्र बाबू से पूछा कि वह किस श्रेणी में यात्रा कर रहे हैं, तो राजेन्द्र बाबू ने बताया कि वह तृतीय श्रेणी में यात्रा कर रहे हैं। मोती लाल ने सुझाव दिया कि थोड़ा ऊपर उठकर वह द्वितीय श्रेणी में यात्रा करें, पर उनकी सलाह के बाबजूद राजेन्द्र प्रसाद ने तृतीय श्रेणी में यात्रा की। 1937 में जब पहली भारतीय सरकार कई प्रान्तों में बनी तो मन्त्री तीसरे क्लास में यात्रा करते थेे। आज यह समृद्ध परम्परा लोप हो गई है। आज सांसद ही नहीं, वह हर व्यक्ति जिसकी थोड़ी हैसियत है अपने को विशिष्ट मानकर आम आदमी से नफरत करता है।
ब्रिटेन में वैसे तो लोकतन्त्र का प्रारम्भ 1688 क्रान्ति से ही माना जाता है। परन्तु वह सम्राट तथा संसद के बीच वर्चस्व की लड़ाई थी और संसद अभिजात्यवर्ग की ही प्रतिनिधि थी। पहले केवल कुलीनों को ही मताधिकार प्राप्त था। धीरे-धीरे अन्य वर्गों को यह अधिकार मिला। लेबर पार्टी के मजबूत होने पर वहां समाजवाद का भी अच्छा असर पड़ा। अंग्रजों ने अपने यहां तो सामन्ती व्यवस्था काफी हद तक खत्म कर दी, लेकिन अपने उपनिवेशों में जबर्दस्त सांमंतशाही की नींव ड़ाली। इसीलिए दिल्ली में वायसराय के लिए बनाया गया बंगला (जो अभी राष्ट्रपति भवन है) बंकिघम पैलेस से ज्यादा भव्य है। जिलों में कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों की विशाल कोठियां भी उसी की प्रतीक हैं। इसकी एक बजह यह भी थी कि भारत आने वाले अंग्रेजों में अधिकतर स्काटलैंड के थे जो उतने विकसित और संपन्न नहीं थे। इसीलिए उनमें सामंती प्रकृति कुछ ज्यादा ही थी।
स्वाधीनता संग्राम के नेता उदावाद मूल्यों को आत्मसात कर और बडे त्याग कर आन्दोलन में कूदे थे। महात्मा गांधी ने लंगोटी पहनकर स्वयं को आम लोगों से जोड़ा। 1921 की एक घटना है। मोतीलाल, नेहरू जी के साथ ट्रेन से इलाहाबाद से कोलकता जा रहे थे। वह द्वितीय श्रेणी में सफर कर रहे थे। गाड़ी जब पटना पहुँची तो जवाहरलाल नेहरू नीचे उतरकर प्लेटफार्म पर टहलने लगे। जहां उनकी मुलाकात राजेन्द्र प्रसाद से हो गई। राजेन्द्र प्रसाद बाबू भी कोलकता जा रहे थे और उन्होने तृतीय श्रेणी का टिकेट ले रखा था। जवाहर लाल उन्हें अपने पिता से मिलवाने ले गए। मोतीलाल ने राजेन्द्र बाबू से पूछा कि वह किस श्रेणी में यात्रा कर रहे हैं, तो राजेन्द्र बाबू ने बताया कि वह तृतीय श्रेणी में यात्रा कर रहे हैं। मोती लाल ने सुझाव दिया कि थोड़ा ऊपर उठकर वह द्वितीय श्रेणी में यात्रा करें, पर उनकी सलाह के बाबजूद राजेन्द्र प्रसाद ने तृतीय श्रेणी में यात्रा की। 1937 में जब पहली भारतीय सरकार कई प्रान्तों में बनी तो मन्त्री तीसरे क्लास में यात्रा करते थेे। आज यह समृद्ध परम्परा लोप हो गई है। आज सांसद ही नहीं, वह हर व्यक्ति जिसकी थोड़ी हैसियत है अपने को विशिष्ट मानकर आम आदमी से नफरत करता है।





