देवभूमि माना जानेवाला राज्य उŸाराखण्ड़ इन दिनों जबरदस्त त्रासदी से गुजर रहा है। हालात यह है कि जनता सरकार को और सरकार प्रकृति को दोषी ठहरा रही है। दोष प्रत्यारोपण की बजाय यह समझना आवश्यक है कि प्रकृति का यह कहर क्यों बरपा और इसमें हमारा कितना हाथ है। साथ ही भविष्य में बचाव की रणनीति पर भी विचार करने की आवश्यकता है।
आज से मात्र 5 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट की तिब्बती प्लेट से हुई जबरदस्त टक्कर के कारण जन्मा हमारा हिमालय है। आज भी भारतीय प्लेट, तिब्बती प्लेट के अन्दर 5 सेमी प्रति वर्ष की दर से धंसती जा रही है। जिसके फलस्वरूप हिमालय के गर्भ में हर समय तनाव एवं संवेदनशीलता बनी रहती है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि हिमालय की भू-वैज्ञानिक एवं भू-आकृतिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि वे हिमस्खलन, भूस्खलन, भूकम्प एवं अचानक वाढ़ आदि प्रकृतिक आपदाओं से कभी भी ग्रसित हो सकती हैं। अतः हिमालय में कोई भी विकास योजना बनाने से पूर्व इन बातों को जेहन में रखना आवश्यक है।
जहांँ तक प्रकृति के प्रकोप की बात है, तो उसे रोका नहीं जा सकता और आने वाले समय में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति नकारी नहीं जा सकती। कुछ प्राकृतिक आपदायें हिमस्खलन, भूस्खलन एवं बाढ़ का पूर्वनुमान संभव है, परन्तु भूकम्प का नहीं। प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक प्रो॰खड़गसिंह वल्दिया एवं प्रसिद्ध अमेरिकी भूकम्पविद रोगर विल्हैम के मुताविक केन्द्रीय कुमाऊंँ क्षेत्र जिसमें वागेश्वर और अल्मोड़ा भी आते हैं, बड़े भूकम्प की आशंका है। परन्तु कब यह भूकम्प आयेगा, कोई नहीं कह सकता। परन्तु शायद हम इन चेतावनियो से अनभिज्ञ हैं।
यदि हम कुछ पुराने भूस्खलनों की बात यहाँं दोहरायें तो अनुचित न होगा। सैलानियों के स्वर्ग नैनीताल को अंग्रेज व्यापारी तथा शिकारी पी॰बैरन नें 1841 में चुना और 1858 तक नैनीताल में अंग्रेजों की भरमार हो गई। पर तभी 1867 नैना पीक की ओर से हुए भूस्खलन से पिलग्रिम के घर का कुछ भाग भी ध्वस्त हो गया। आनन-फानन में अंग्रजों ने नैनीताल में जल निकासी के लिए नालों का जाल फैला दिया। तभी 1880 में शेर का डांडा की ओर से हुए भूस्खलन के कारण 193 लोग मारे गये तथा झील का एक भाग आज के फ्लैट्स के रूप में आ गया। इसके बाबजूद नैनीताल में निर्माण पर कोई रोक नहीं लगी। आज भी शेर का डांडा उतना ही खतरनाक है जितना 1880 में था।
दूसरा उदाहरण है उत्तरकाशी का। 2003 में उŸारकाशी के वरूणाव्रत पर्वत पर कार्य कर रहे भारतीय भूवैज्ञानिकों ने सर्वेक्षण में देखा, चोटी से धीरे-धीरे भूस्खलन हो रहा है। उन्होने तुरन्त जिलाधिकारी को सूचित किया और सरकारी तन्त्र ने तत्काल नीचे बसी आबादी को सुरक्षित स्थानों में भेज दिया। लगातार वर्षा हो रही थी और पानी के दवाव से 24 सितम्बर को बरूणाव्रत पर्वत पूरे जोर-शोर के साथ नीचे चल दिया और अपने साथ ले गया 40 से 50 हजार क्युविक मीटर मलबा। जान का नुकसान तो बच गया लेकिन नीचे सड़क के किनारे बने घर, होटल सब ध्वस्त हो गये। शायद हमारी याददास्त बहुत ही कमजोर है और उससे भी घनी आबादी जोखिम भरे क्षेत्र में फिर से बस गई। इतिहास गवाह है कि वरूणाव्रत पर्वत से पूर्व में ताम्बाखाण्डी तथा ज्ञानसू में भी इसी प्रकार के भयंकर भूस्लखलन हो चुके हैं।
ऐसे उदाहरण अनेक हैं, जैसे 1893 में गौना में पर्वत गिरने से बिरही गंगा अवरूद्ध हो गई थी और वन गया था गौना ताल। अंगे्रज भूवैज्ञानिक टीएच हालैण्ड ने हरिद्वार से 160 मील की पैदल (उस समय हैलीकैप्टर नहीं होते थे) यात्रा करके रिपोर्ट में लिखा था कि 25-26 अगस्त 1984 तक बांध टूट जायेगा और नियत समय पर बांध टूटा जिससे चमौली में नदी का जल स्तर 160 फिट तथा हरिद्वार में 1 फिट चढ़ा। चूंकि उस समय भूवैज्ञानिकों की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जाता था, सरकार ने बन्दोवस्त कर रखा था और जान का नुकसान नहीं हुआ।
अब विज्ञान का युग है और पूर्वानुमान के लिए सेटेलाइट हैं, जिसके माध्यम से इस क्षेत्र में हो रहे हर क्षण हो रहे बदलाव पर नजर रखी जा सकती है। स्वचालित मौसम सूचना एकत्रित करने के सैकड़ों केन्द्र स्थापित कर समस्त सूचना मौसम के पूर्वानुमान लगा रहे केन्द्रों को पे्रषित की जानी चाहिए। जहांँ से समस्त जिलाधिकारियों को नित्य मौसम की बुलेटिन भेजी जा सकती है और वह आवश्यकतानुसार तैयारी कर सकते हैं।
हमारे पर्वत जितने विशाल और स्थितिप्रज्ञ दिखते हैं, उतने हैं नहीं। इन पर निर्माण से पूर्व स्थापत्य एवं जल निकासी आदि का ध्यान रखना आवश्यक है। पिछले दशक में उŸाराखण्ड में अन्धाधुन्ध निर्माण हुआ है, पर क्या सारा निर्माण पर्यावरण सुरक्षा को मद्देनजर रख कर किया गया है? शायद नहीं। इस प्रकार के निर्माण पर ंस्थानीय सरकार को सख्ती से रोक लगानी होगी तथा स्थानीय निवासियों को स्वनुशासन का पालन करना होगा तभी शायद देवभूमि भविष्य में सही मायनों में ‘देवभूमि सिद्ध’ हो सकेगी। -प्रसिद्ध पर्यावरणविद।
आज से मात्र 5 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय प्लेट की तिब्बती प्लेट से हुई जबरदस्त टक्कर के कारण जन्मा हमारा हिमालय है। आज भी भारतीय प्लेट, तिब्बती प्लेट के अन्दर 5 सेमी प्रति वर्ष की दर से धंसती जा रही है। जिसके फलस्वरूप हिमालय के गर्भ में हर समय तनाव एवं संवेदनशीलता बनी रहती है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि हिमालय की भू-वैज्ञानिक एवं भू-आकृतिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि वे हिमस्खलन, भूस्खलन, भूकम्प एवं अचानक वाढ़ आदि प्रकृतिक आपदाओं से कभी भी ग्रसित हो सकती हैं। अतः हिमालय में कोई भी विकास योजना बनाने से पूर्व इन बातों को जेहन में रखना आवश्यक है।
जहांँ तक प्रकृति के प्रकोप की बात है, तो उसे रोका नहीं जा सकता और आने वाले समय में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति नकारी नहीं जा सकती। कुछ प्राकृतिक आपदायें हिमस्खलन, भूस्खलन एवं बाढ़ का पूर्वनुमान संभव है, परन्तु भूकम्प का नहीं। प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक प्रो॰खड़गसिंह वल्दिया एवं प्रसिद्ध अमेरिकी भूकम्पविद रोगर विल्हैम के मुताविक केन्द्रीय कुमाऊंँ क्षेत्र जिसमें वागेश्वर और अल्मोड़ा भी आते हैं, बड़े भूकम्प की आशंका है। परन्तु कब यह भूकम्प आयेगा, कोई नहीं कह सकता। परन्तु शायद हम इन चेतावनियो से अनभिज्ञ हैं।
यदि हम कुछ पुराने भूस्खलनों की बात यहाँं दोहरायें तो अनुचित न होगा। सैलानियों के स्वर्ग नैनीताल को अंग्रेज व्यापारी तथा शिकारी पी॰बैरन नें 1841 में चुना और 1858 तक नैनीताल में अंग्रेजों की भरमार हो गई। पर तभी 1867 नैना पीक की ओर से हुए भूस्खलन से पिलग्रिम के घर का कुछ भाग भी ध्वस्त हो गया। आनन-फानन में अंग्रजों ने नैनीताल में जल निकासी के लिए नालों का जाल फैला दिया। तभी 1880 में शेर का डांडा की ओर से हुए भूस्खलन के कारण 193 लोग मारे गये तथा झील का एक भाग आज के फ्लैट्स के रूप में आ गया। इसके बाबजूद नैनीताल में निर्माण पर कोई रोक नहीं लगी। आज भी शेर का डांडा उतना ही खतरनाक है जितना 1880 में था।
दूसरा उदाहरण है उत्तरकाशी का। 2003 में उŸारकाशी के वरूणाव्रत पर्वत पर कार्य कर रहे भारतीय भूवैज्ञानिकों ने सर्वेक्षण में देखा, चोटी से धीरे-धीरे भूस्खलन हो रहा है। उन्होने तुरन्त जिलाधिकारी को सूचित किया और सरकारी तन्त्र ने तत्काल नीचे बसी आबादी को सुरक्षित स्थानों में भेज दिया। लगातार वर्षा हो रही थी और पानी के दवाव से 24 सितम्बर को बरूणाव्रत पर्वत पूरे जोर-शोर के साथ नीचे चल दिया और अपने साथ ले गया 40 से 50 हजार क्युविक मीटर मलबा। जान का नुकसान तो बच गया लेकिन नीचे सड़क के किनारे बने घर, होटल सब ध्वस्त हो गये। शायद हमारी याददास्त बहुत ही कमजोर है और उससे भी घनी आबादी जोखिम भरे क्षेत्र में फिर से बस गई। इतिहास गवाह है कि वरूणाव्रत पर्वत से पूर्व में ताम्बाखाण्डी तथा ज्ञानसू में भी इसी प्रकार के भयंकर भूस्लखलन हो चुके हैं।
ऐसे उदाहरण अनेक हैं, जैसे 1893 में गौना में पर्वत गिरने से बिरही गंगा अवरूद्ध हो गई थी और वन गया था गौना ताल। अंगे्रज भूवैज्ञानिक टीएच हालैण्ड ने हरिद्वार से 160 मील की पैदल (उस समय हैलीकैप्टर नहीं होते थे) यात्रा करके रिपोर्ट में लिखा था कि 25-26 अगस्त 1984 तक बांध टूट जायेगा और नियत समय पर बांध टूटा जिससे चमौली में नदी का जल स्तर 160 फिट तथा हरिद्वार में 1 फिट चढ़ा। चूंकि उस समय भूवैज्ञानिकों की रिपोर्ट को गंभीरता से लिया जाता था, सरकार ने बन्दोवस्त कर रखा था और जान का नुकसान नहीं हुआ।
अब विज्ञान का युग है और पूर्वानुमान के लिए सेटेलाइट हैं, जिसके माध्यम से इस क्षेत्र में हो रहे हर क्षण हो रहे बदलाव पर नजर रखी जा सकती है। स्वचालित मौसम सूचना एकत्रित करने के सैकड़ों केन्द्र स्थापित कर समस्त सूचना मौसम के पूर्वानुमान लगा रहे केन्द्रों को पे्रषित की जानी चाहिए। जहांँ से समस्त जिलाधिकारियों को नित्य मौसम की बुलेटिन भेजी जा सकती है और वह आवश्यकतानुसार तैयारी कर सकते हैं।
हमारे पर्वत जितने विशाल और स्थितिप्रज्ञ दिखते हैं, उतने हैं नहीं। इन पर निर्माण से पूर्व स्थापत्य एवं जल निकासी आदि का ध्यान रखना आवश्यक है। पिछले दशक में उŸाराखण्ड में अन्धाधुन्ध निर्माण हुआ है, पर क्या सारा निर्माण पर्यावरण सुरक्षा को मद्देनजर रख कर किया गया है? शायद नहीं। इस प्रकार के निर्माण पर ंस्थानीय सरकार को सख्ती से रोक लगानी होगी तथा स्थानीय निवासियों को स्वनुशासन का पालन करना होगा तभी शायद देवभूमि भविष्य में सही मायनों में ‘देवभूमि सिद्ध’ हो सकेगी। -प्रसिद्ध पर्यावरणविद।





