सिसकते लोग, हताहत परिजनों की पथराई आंखें, मदद मांगते हाथों की बेबसी, बहुखण्डी इमारतों और गाडि़यों का तिनके की माफिक जल प्रलय में बह जाने की तस्वीरें समूचे सभ्य समाज को विचलित कर रही हैं। बिलखते, सिसकते सैकड़ों लोगों का कोई न कोई अब तक इस भयानक त्रासदी में लापता है या या फिर हमेशा के लिए इस दुनियाँ को छोड़ कर चला गया है। आखिर इस मातम को क्या नाम दें? इसके साथ ही यह स्थिति जो सवाल पैदा करती है, उसके जबाब किसी के पास नहीं हैं और अन्ततः यह स्थिति पूरी व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर देती है।
दरअसल विकास की अंधी दौड़ में हम सब इतना खो गये हैं कि हमने कुदरत के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया। अपनी जरूरत पूरी करने के लिए प्राकृतिक संपदा का आवश्यकता से अधिक दोहन कर रहे हैं और जंगलो को उजाड़ कर इमारतें खड़ी कर रहे हैं। नदियों को उनके स्वाभाविक प्रवाह से विमुख कर रहे हैं, उन्हें अवरूद्ध कर रहे हैं। इसका खामियाजा सुनामी और विहार की बाढ़ में हम भुगत चुके हैं। फिर भी हम लालची प्रवृत्ति पर कोई रोक नहीं लग रही, उल्टे बढ़ोत्तरी ही हो रही है। विकास और आर्थिक प्रगति के नाम पर मुनाफा कमाने की लूट मची हुई है। दरअसल पहाड़ी शहरों और कस्बों का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है। नदियों के एक दम किनारे तक बहुमंजिला इमारतें, होटल, लाज और रिसोर्ट बनाये जा रहे हैं। साथ ही नदियों में बालू निकालने के लिए अवैध खनन कार्य अलग से चलता रहता है। ‘पर्यटन विकास’ के नाम पर पहाड़ों का लगातार खोखला किया जा रहा है।
अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि मीडि़या की ताजा रिपोर्ट के अनुसार गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बनाई गई तीन सौ से अधिक बहुमंजिला इमारतें, होटल व अन्य व्यावसायिक भवन बाढ़ में बह गये या क्षतिग्रस्त हो गये। ये इमारतें नदियों के बहुत किनारे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में गैरकानूनी तरीके से बनाई गई थीं, जो पहाड़ों पर यह स्थिति आम हो गई है; यह छोटा सा उदाहरण भर है।
पर सबाल उठता है कि यहां प्राकृतिक आपदा क्या पहली बार आयी है? क्या बादलों का फटना, पहाड़ो का खिसकना, बाढ़ का आना यहां के लिए अजूबा है? बिल्कुल नहीं। तो सवाल उठता है कि क्यों नही आपदा से निपटने की समुचित व्यवस्था अबतक की गई। क्यों आज भी इन्सान आदिम सभ्यता के मानव की भांति प्रकृति के सम्मुख बेबस और लाचार है? पिछले दो सौ सत्तर वर्षों में जिस भारतीय उपमहाद्वीप ने दुनियाँ में आये तेईस सबसे बडे़ समुद्री तूफानो में से इक्कीस की मार झेली हो और ये तूफान भारत में 6 लाख जानें लेकर शान्त हुए हों, जिस मुल्क की उन्सठ फीसदी जमीन कभी भी थरथरा सकती हो और पिछले अठारह सालों में आये सबसे बड़े भूकम्पों में जहां 24 हजार से अधिक लोग जान गवां चुके हों, वहां आपदा प्रबन्धन तन्त्र का कोई माई-बाप न होना आपराधिक लापरवाही है।
प्राकृतिक आपदाओं का हल प्रकृति के असीमित संसाधनों में ही खोजा जा सकता है। प्रकृति को माता समझ कर उसके योगिक पदार्थों की खोज, शोधन या उपयोग की बात सोचनी चाहिए। प्रकृति को जननी मानकर सभी धारणाओं में परिमार्जन हो और ऐसी अवधारणाओं को त्यागना चाहिए जो प्रकृति के सिद्धान्तों के विपरीत हों। प्रकृति के वात्सल्य को हम अनुभव नहीं कर पाते। प्रकृति की गोद हमारी माता की गोद की तरह सुरक्षित तथा आनन्ददायक है, इसके ममत्व का सुख उठाया जाये।
दरअसल विकास की अंधी दौड़ में हम सब इतना खो गये हैं कि हमने कुदरत के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया। अपनी जरूरत पूरी करने के लिए प्राकृतिक संपदा का आवश्यकता से अधिक दोहन कर रहे हैं और जंगलो को उजाड़ कर इमारतें खड़ी कर रहे हैं। नदियों को उनके स्वाभाविक प्रवाह से विमुख कर रहे हैं, उन्हें अवरूद्ध कर रहे हैं। इसका खामियाजा सुनामी और विहार की बाढ़ में हम भुगत चुके हैं। फिर भी हम लालची प्रवृत्ति पर कोई रोक नहीं लग रही, उल्टे बढ़ोत्तरी ही हो रही है। विकास और आर्थिक प्रगति के नाम पर मुनाफा कमाने की लूट मची हुई है। दरअसल पहाड़ी शहरों और कस्बों का विस्तार बहुत तेजी से हो रहा है। नदियों के एक दम किनारे तक बहुमंजिला इमारतें, होटल, लाज और रिसोर्ट बनाये जा रहे हैं। साथ ही नदियों में बालू निकालने के लिए अवैध खनन कार्य अलग से चलता रहता है। ‘पर्यटन विकास’ के नाम पर पहाड़ों का लगातार खोखला किया जा रहा है।
अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि मीडि़या की ताजा रिपोर्ट के अनुसार गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बनाई गई तीन सौ से अधिक बहुमंजिला इमारतें, होटल व अन्य व्यावसायिक भवन बाढ़ में बह गये या क्षतिग्रस्त हो गये। ये इमारतें नदियों के बहुत किनारे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में गैरकानूनी तरीके से बनाई गई थीं, जो पहाड़ों पर यह स्थिति आम हो गई है; यह छोटा सा उदाहरण भर है।
पर सबाल उठता है कि यहां प्राकृतिक आपदा क्या पहली बार आयी है? क्या बादलों का फटना, पहाड़ो का खिसकना, बाढ़ का आना यहां के लिए अजूबा है? बिल्कुल नहीं। तो सवाल उठता है कि क्यों नही आपदा से निपटने की समुचित व्यवस्था अबतक की गई। क्यों आज भी इन्सान आदिम सभ्यता के मानव की भांति प्रकृति के सम्मुख बेबस और लाचार है? पिछले दो सौ सत्तर वर्षों में जिस भारतीय उपमहाद्वीप ने दुनियाँ में आये तेईस सबसे बडे़ समुद्री तूफानो में से इक्कीस की मार झेली हो और ये तूफान भारत में 6 लाख जानें लेकर शान्त हुए हों, जिस मुल्क की उन्सठ फीसदी जमीन कभी भी थरथरा सकती हो और पिछले अठारह सालों में आये सबसे बड़े भूकम्पों में जहां 24 हजार से अधिक लोग जान गवां चुके हों, वहां आपदा प्रबन्धन तन्त्र का कोई माई-बाप न होना आपराधिक लापरवाही है।
प्राकृतिक आपदाओं का हल प्रकृति के असीमित संसाधनों में ही खोजा जा सकता है। प्रकृति को माता समझ कर उसके योगिक पदार्थों की खोज, शोधन या उपयोग की बात सोचनी चाहिए। प्रकृति को जननी मानकर सभी धारणाओं में परिमार्जन हो और ऐसी अवधारणाओं को त्यागना चाहिए जो प्रकृति के सिद्धान्तों के विपरीत हों। प्रकृति के वात्सल्य को हम अनुभव नहीं कर पाते। प्रकृति की गोद हमारी माता की गोद की तरह सुरक्षित तथा आनन्ददायक है, इसके ममत्व का सुख उठाया जाये।





