Saturday, March 8, 2014

राजस्थान की मरूभूमि में जागा स्वाभिमान! -प्रियंका दुबे

लापोडि़या गांव में लगन की कहानी....
कहानी पुरानी, पर बात नई है। 80 के दशक में लापोडि़या गांव के युवक लक्ष्मण सिंह 10वीं कक्षा की पढ़ाई के लिए अपने गांव से जयपुर गये और दीवाली की छुट्यिों में जब घर आये, तो यहां अकाल जैसी स्थिति थी। बातचीत के दौरान पड़ोसी गांव के एक आदमी ने कह दिया कि, ‘लापोडि़या तो बहुत खराब गांव है, यहांँ अकाल पड़ता है, लोगों के पास खाने को नहीं है, न पानी है, न तालाब हैं, ऊपर से पूरा गांव एक दूसरे पर झूठे मुकदमें करता है और सब एक दूसरे से लड़ते रहते हैं।’
लक्ष्मण सिंह बताते हैं कि यह बात सुनकर वह बहुत दुखी हुए, जैसा कि वह कहते हैं, ‘इतना दुख हुआ कि फिर वापस पढ़ने जा ही नहीं पाया, मन में यह बात थी कि जहां मैं रहता हूँ, वहां लोग इतनी परेशानी में हैं और आपस में लड़ रहे हैं, मुझे इसे ठीक करना था। उस समय सच में गांव के लोग आपस में बहुत लड़ते थे, एक मोहल्ले का आदमी दूसरे मोहल्ले में पहुंँच जाये तो पिट कर ही वापस आता था। लेकिन ऐसे टूटे हुए समाज को एक और नेक करने का काम भी तालाबों और चरागाहों ने किया, हालांकि सबों को एक साथ लाने में बहुत वक्त और श्रम लगा।’
17 वर्ष की छोटी आयु में ही स्कूल छोड़ने के बाद लक्ष्मण सिंह ने जब गांव के लोगों को बैठक में बुलाना शुरू किया तो 1500 के लगभग लोग आते थे, पर काफी बातचीत के बाद भी दशकों से टूटे पड़े गांव के तालाबों को बनाने के लिए दुबारा तैयार नहीं हुए। परन्तु लक्ष्मण सिंह ने हिम्मत नहीं हारी और गांव के अपने साथियों के साथ मिलकर ‘ग्राम विकास नवयुवक मण्डल, लापोडि़या’ नामक संगठन बनाया और अपने साथियों के साथ खुद फाबड़ा लेकर तालाब ठीक करने निकल पड़े।
शाही राजपूत परिवार के प्रतिनिधि होने के वजह से गांव में उनका सम्मान है और यहां उन्हें ‘बना जी’ कहकर सम्बोधित किया जाता है, अपने ‘बना जी’ को इतनी छोटी आयु में तालाब में काम करता देख धीरे-धीरे और लोग भी तालाब सुधारने के काम में जुट गये। परिणाम स्वरूप थोड़े समय में ही (1981) में ही देवसागर तालाब तैयार हो गया, 1983 तक दो तालाब और बन गये ‘अन्नसागर’ और ‘फूलसागर’।   सिंचाई के लिए सिर्फ ‘अन्नसागर’ का पानी इस्तेमाल किया जाता है, देवसागर का पानी पीने के लिए लिया जाता है और ‘फूलसागर’ का निर्माण मूलतः भूमिगत जलस्तर बढ़ाने के लिए किया गया है। उस तालाब के आस-पास पेड़-पौधों की पट्टियां हैं, जिनकी सिंचाई इस तालाब से होती है। इस प्रकार हर परिवार बारी-बारी से पानी लेते हैं और झगड़ा भी नहीं होता।
गांव के विकास में
गोचर भी महत्वपूर्ण ..
खेती और तालाबों के साथ-साथ लापोडि़या की तस्वीर बदलने में गोचर की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। गोचर मूलतः गांव और खेतों के पास मौजूद पशुआंे के के विशाल पांरंपरिक चरागाह होते हैं, जमीन की ब़ढ़ती कीमतों और खेती में आधुनिक उपकरणों के प्रवेश के बाद से ही भारत में ज्यादातर ग्रामीण इलाकों के  चरागाह खत्म होते गये और पशुओं को एक खूंटे में बांधकर, चारदीवारी में चारा खिलाया जाने लगा।
लक्ष्मण सिंह का मानना है कि पशु किसानी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उनके चरने के लिए खुले चरागाह आवश्यक हैं। अतः लापोडि़या के उलड़े बंजर चरागाह को वापस जीवित करने की उधेड़बुन में उन्होने कई कृषि विश्वविद्यालयों के चक्कर लगाये, विशेषज्ञों से बात की और वहांँ से कोई समाधान न मिलने पर आखिर में स्वयं ‘चैका पद्धति’ का आविष्कार किया। इस चैका प्रणाली के तहत तीन भुजाओं में मिट्टी के पाल बनाकर चरागाह में चैर आकृतियाँ बनाई जाती हैं, जिससे बरसात का पानी इन चैकों में ठहरता है, एक चैके में पूरा भर जाने पर पानी अपने आप दूसरे चैके में चला जाता है, सारे चैकों में पानी भर जाने के पर अतिरिक्त पानी चरागाह के अन्त में  बने नहरनुमा एक तालाब में इकट्ठा हो जाता है। चरागाह को वापस जिन्दा करने की प्रक्रिया को याद करते हुए लक्ष्मण सिंह बताते हैं कि, ‘शुरू-शुरू में काफी विरोध हुआ, राजनीति हुई, गांव के कुछ लोगों को लगा कि संगठन चरागाह पर कब्जा करना चाहता है। लेकिन धीरे-धीरे सभी लोग साथ में आ गए और चरागाह बनाने में पूरे गांव ने श्रमदान किया, सभी जातियों के लोगों ने एक साथ फावड़े चलाए, देखते ही देखते चैका-पद्धति रंग लाई और चरागाह हराभरा हो गया। पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था हुई तो उसके फायदे भी दिखने लगे। लापोडि़या गांव में दूध का उत्पादन बढ़ा, आज गांव से लगभग सालाना 40 लाख रू॰ का दूध जयपुर डेरी को जाता है।
गांव के सबसे बुजुर्ग छोटू रामदास और पुष्पा देवी अपने पशुओं को चराने चरागाह की ओर जा रहे हैं, उनसे इस बदलाव के बारे में पूछने पर हाथ जोड़ कर वह कहते हैं, ‘हमने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इस गांव में इतना अनाज होगा, पीने के लिए इतना पानी होगा, दूध की नदियांँ बहेंगी, लेकिन वाना जी की पे्ररणा से सारे तालाब बन गये और गोचर इतना हरा-भरा हो गया। मुझे याद है शुरू में लोग मान नही रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे हम सबने एक साथ जमीन पर काम किया, अब हमारे गांव में कोई किसी के साथ मार-पीट नहीं करता, झूठे मुकदमे नहीं होते, झगड़े भी खत्म हो गये, जाति के नाम पर कोई किसी को नहीं सताता, आखिर हम सब एक ही तालाब का पानी जो पीते हैं।’ स्चामित्व और स्वाभिमान का एसा सुखद अनुभव किसे नहीं सुहाएगा?
मरूभूमि में ‘एकलापार’ गांव की जीवटभरी!
अनोखी दास्तान ...
तीन तरफ से थार मरूस्थल से घिरा जैसलमेर, जिला मुख्यालय से करीब 65 किमी दूर रामगढ़ भारत-पाकिस्तान सीमा से पहले आखिरी प्रमुख कस्बा है, सीमा की ओर बढ़ते रामगढ़ से लगभग 25 किमी आगे जाने पर रेगिस्तान के बीच ‘एकल पार’ नाम का एक छोटा सा गांव है, जिसमें गाजीराम भील अपने परिवार के साथ रहते हैं।
रेगिस्तान में ठाकुरों के दवंग इलाके में भील होकर पुश्तों से पशु चराने और सड़क निर्माण में मजदूरी करने के बाद, अब गाजीराम 40 डिग्री सेल्सियस पर तपते रेगिस्तान में खेती करके चमत्कार की मिसाल बने हैं। क्योंकि जहांँ कुछ वर्ष पहले तक जहांँ चारो ओर रेत की लहरें बहती थीं, वहांँ वह अब रवी और खरीफ की फसलंे उगाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। आज उनके पास इलाके में सबसे अच्छी नस्ल का ऊँट है, लहलहाते खेत हैं, टैªक्टर है और रहने के लिए दो कमरे का पक्का मकान है, यह सब उन्हें ‘परीकथा’ जैसा लगता है।
आठ साल पहले तक तीन फुट की झोपड़ी में रहकर, रेगिस्तान में अपनी एक-दो बकरियांँ लेकर घूमने बाले गाजीराम का जीवन ‘खड़ीनो’ में खेती की पारम्परिक विधा ने बदल दिया।
रेगिस्तान का ‘नौलखा हार’ कहलाने वाला खड़ीन रेगिस्तान में खेती करने की पिछले 900 साल से चली आरही अनोखी व विशिष्ट तकनीक है, जिसे आज के लोगों ने वर्तमान विकास की मृगमरीचिका में भूला दिया था, जिसके कारण अधिकांश खड़ीनें टूट गई थीं, जिन्हें अब पुनर्जीवित किया जा रहा है। रेगिस्तान की बंजर भूमि के नीचे कुछ जगहों पर जिप्सम की परत पाई जाती है, जो सामान्य वर्षा के पानी को नीचे जाने से रोक लेती है और इस तरह रेत की गर्म सतह के नीचे ठंढ़ा पानी एकत्र होने लगता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘रजवानी पानी’ और ऐसे खेतों को ‘खड़ीन’ कहते हैं। जहां पर जिप्सम की यह पट्टी 60-70 फुट की गहराई पर होती है, वहां कुआं बनाकर पानी निकाला जाता है, पर जहां इसकी परत ऊपर होती है, वहाँ खेती की जाती है।
भारत में खड़ीन खेती सिर्फ राजस्थान के जैसलमेर में की जाती है। पूरे जिले में करीब 300 खड़ीनें हैं, पिछले आठ साल से रामगढ़ क्षेत्र में लगभग टूट चुकी खड़ीनों को दोबारा आबाद करने और छोटे खड़ीनों को प्रोत्साहित करने के काम में जुटे स्थानीय किसान और सामाजिक कार्यकर्ता छतर सिंह बताते हैं कि ‘रामगढ़ में फिलहाल 10-11 बड़े और लगभग 50 छोटे खड़ीन फिर से आबद हो गये हैं, जो लगभग खत्म हो गये थे।’ हुआ यह कि जब इन्दिरा नहर बनी तो लोगों को उससे बहुत उम्मीदें बढ़ी, लोग पुरानी खड़ीन परंपरा को छोड़ नहर की आशा में लगे रहे, जो पूरी नहीं हुईं। फिर 2004 के आस-पास हमने सोचा खड़ीन को फिर से जिन्दा करना चाहिए, यहां लोगों को समझाने में थोड़ा समय तो लगा, लेकिन धीरे-धीरे सभी को अहसास हो गया कि पारंपरिक खड़ीन आधारित खेती ही हमें इस रेगिस्तान में जीवन दे सकती है।’
खड़ीन निर्माण का श्रेय लगभग 900 साल पहले जैसलमेर राजा के प्रस्ताव पर रामगढ़ में आकर बसने वाले पाली ब्राह्मणों को जाता है, जिन्होंने जमीन के कुछ हिस्सों में मौजूद नमी को पहचान कर विशाल खड़ीन बनाये। खड़ीन एक विशिष्ट प्रकार का खेत है, जिसके दो तरफ मिट्टी की ऊँची पाल खड़ी की जाती है और एक तरफ पत्थर की मजबूत चादर बिछाई जाती है। ज्यादातर ढ़लान वाली जगहों पर बने इन खड़ीनों के चैथे छोर से बरसात का पानी भीतर आता है और फिर अस्थाई तालाब की तरह खेत में कई दिन भरा रहता है। धीरे-धीरे जमीन में समाने वाला यह पानी जिप्सम की परत के ऊपर ही ठहर जाता है और उसके बाद किसान आसानी से रबी और खरीफ की फसलें इस नमी में उगा लेते हैं। छतर सिंह बताते हैं कि ‘बरसात में पानी हर साल अपने साथ घुलनशील तत्व, पशुओं का गोबर, सूखे पेड़-पत्ते आदि बहुत कुछ बहाकर ले आता है, जो सड़ने के बाद साल-दर-साल मिट्टी को और ज्यादा उपजाऊ बना देता है।’ वे बताते हैं कि, खड़ीन हमेशा पाटों में विभाजित होते हैं और हर पाट में दस-पन्द्रह परिवारों का हिस्सा होता है, सब मिलकर खड़ीन में खेती करते हैं और फसल काम करने वाले सभी परिवारों में बांट दी जाती है, यदि किसी परिवार में कोई विकलांग है, विधवा है या रोगी है तो उसका हिस्सा भी उनके दरबाजे पर पहुचा दिया जाता है।
छतर सिंह कहते हैं, ‘खड़ीन पर किसी का स्वामित्व नहीं होता बल्कि वे पूरे समाज के होते हैं और सभी को बराबर हिस्सा मिलता है, जिस दिन यहाँ समाज टूटा, खड़ीन भी टूट जायेंगे।
रामगढ़ के खड़ीन किसानों ने शायद कभी समानता और स्वतन्त्रता के फ्रांसीसी सिद्धान्तों के बारे में सुना भी नहीं होगा और न ही उन्हें पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हर रोज सैकड़ों किताबों के बारे में कोई जानकारी होगी। लेकिन अपने समाज में विकसित हुई एक अनोखी न्याय प्रक्रिया के तहत आज खड़ीनों का लाभ रेगिस्तान में अकेले खड़े अन्तिम व्यक्ति तक पहुँच रहा है और थार के लोग दुनियाँ की सबसे कम बारिश में भी रेत में गेहूँ उपजा रहे हैं। इस चमत्कार के विषय में पूछने पर गाजीराम हाथ जोड़ कर कहते हैं, ‘कभी सोचा भी नहीं था कि छत जैसा भी कुछ हो सकता है हमारे सर पर, खड़ीन देवता हैं हमारे, जैसे किसी की जान का मोल नहीं होता, वैसे ही हमारे खड़ीन भी ‘अनमोल’ हैं।''