लोकतंत्र के फायदे ही फायदे हैं। फायदे इतने की गिनाने लगो, तो मुँह बंद ही न हो। सुनने लगो, तो मुँह खुला का खुला ही रह जाए।
ऐसा क्यों भाई?
क्योंकि जब चाहो तब बोलो। जो चाहो, वो बोलो। जितना चाहो, उतना बोलो। जिसको चाहो, जहाँ चाहो, वहाँ तौलो। जब भी चाहे मंडन करो। जब भी चाहे खंडन करो। अपनी बकवास को बात कहिए। दूसरे की बात को बकवास कहिए। हवा हवाई बातें करिए। कहिए, मैं जमीन से जुड़ा आदमी हूँ। जब कोई आपको बोलने से टोके, तो लोकतंत्र का हवाला देते हुए कहिए- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है भाई। जब आपके विरूद्ध कोई बोले, तो झट यह कहते हुए पिल पडि़ए- आपके ऐसा कहने से हमारी भावनाएं आहत होती है। और जब उन्हीं सज्जन के विरोध में आपको बोलना हो, तो कहिए, लोकतंत्र में सबको बोलने का हक है।
जब आपको कोई ऐसा करने से रोके, तो कहिए, फासीवाद इस देश में नहीं चलेगा जनाब। यहाँ लोकतंत्र है लोकतंत्र। और जब आपको किसी को टोकना हो तो कहिए, लोकतंत्र का मतलब यह नहीं, जो मुँह में आए बक दीजिए। लोकतांत्रिक देश में रहते हुए लोकतंत्र का पूरा-पूरा फायदा न लिया, तो फिर किया क्या आप ने! मतलब यह की लोकतंत्र एक लचीला रबर है। आप जितना चाहें उसे खींच सकते हैं। जिधर चाहें घुमा सकते हैं। जैसा चाहंे मोड़ सकते हैं। कोई टोकने-रोकने वाला नहीं है। अगर ऐसा करने से कोई रोके, तो लोकतंत्र में दिए मौलिक अधिकार की दुहाई दे दीजिए। रोकने वाला खुद रूक जाएगा। इतना ही नहीं, वो आपकी लोकतांत्रिक निष्ठा के आगे नतमस्तक हो जाएगा। क्योंकि वह जनता है मौलिक अधिकार की बात अधिकारपूर्वक कहना ही हमारा मौलिक कर्तव्य है। और जिसे अभी-अभी आप ने बखूबी अंजाम दिया है।
लोकतंत्र का असली फायदा उठाने का विशेष समय चुनाव (इसे परस्पर गलियाने के उत्सव की संज्ञा भी दी जा सकती है) है। लेकिन निष्ठुर चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता लागू कर देने से प्रत्याशी पूरा फायदा उठाने से वंचित रह जाते हैं। इसके बावजूद खरी-खरी से लेकर अपने विराधियों की ऐसी की तैसी तक कर डालने, जैसे को तैसा से लेकर, ईंट का जवाब पत्थर से देने तक बात चली जाती है।
आप वहाँ खड़े-खड़े क्या सोच रहे हैं जनाब? यदि आप के दिल में रत्ती भर भी हिट होने की चाहत दबी है, तो आप भी लोकतंत्र का फायदा उठाइए न! फौरन पकड़ लीजिए किसी महापुरूष को। कुछ बोल दीजिए। कुछ सोचने की आवश्यकता नहीं है। लोकतंत्र है न! अनाप-शनाप कुछ भी बोल दीजिए। यानी बक दीजिए। आप बकेंगे तो लोग समझेंगे कि आप बोल रहे हैं। वर्षों का उनका अनुभव बताता है कि बकने को ही सुसंस्कृत तरीके से भाषण, वक्तव्य, चुनावी घोषणा पत्र कहा जाता है। आप को शायद ही कोई हिट करे। यदि कुछ लोकतंत्र विरोधी मानसिकता वालों से हिट होने का चांस रहता बनता है, तो कह दीजिए मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। यहाँ ऐसा ही किया जाता है। तोड़-मरोड़ करने से भला कैसा गुरेज! तोड़-मरोड़ तो लोकतंत्र का खास लक्षण बन चुका है। चुनाव जीतने-हराने के लिए तोड़-मरोड़। सरकार बनाने-गिराने के लिए तोड़-मरोड़।
सच पूछो तो लोकतंत्र को ही तोड़-मरोड़ कर चलाया जा रहा है। जो जितना ज्यादा तोड़-मरोड़ करने में सिद्धहस्त है उसे ‘किंगमेकर’ जैसी पदवी से अलंकृत किया जाता है। तो जितना जी करे अपने बयान को तोडि़ए। जितना जी करे उतना मरोडि़ए। आपको न तोड़ा जाएगा, न मरोड़ा जाएगा। लोकतंत्र में धनुष की प्रत्यंचा से शब्दभेदी बाण खूब छोडि़ए। निशाने पर लगा तो ठीक, चूक गया तो भी ठीक। लोकतंत्र आपके दोनों हाथों में लड्डू देता है। मन हो तो खाइए। मन हो तो खिलाइए।
ऐसा क्यों भाई?
क्योंकि जब चाहो तब बोलो। जो चाहो, वो बोलो। जितना चाहो, उतना बोलो। जिसको चाहो, जहाँ चाहो, वहाँ तौलो। जब भी चाहे मंडन करो। जब भी चाहे खंडन करो। अपनी बकवास को बात कहिए। दूसरे की बात को बकवास कहिए। हवा हवाई बातें करिए। कहिए, मैं जमीन से जुड़ा आदमी हूँ। जब कोई आपको बोलने से टोके, तो लोकतंत्र का हवाला देते हुए कहिए- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है भाई। जब आपके विरूद्ध कोई बोले, तो झट यह कहते हुए पिल पडि़ए- आपके ऐसा कहने से हमारी भावनाएं आहत होती है। और जब उन्हीं सज्जन के विरोध में आपको बोलना हो, तो कहिए, लोकतंत्र में सबको बोलने का हक है।
जब आपको कोई ऐसा करने से रोके, तो कहिए, फासीवाद इस देश में नहीं चलेगा जनाब। यहाँ लोकतंत्र है लोकतंत्र। और जब आपको किसी को टोकना हो तो कहिए, लोकतंत्र का मतलब यह नहीं, जो मुँह में आए बक दीजिए। लोकतांत्रिक देश में रहते हुए लोकतंत्र का पूरा-पूरा फायदा न लिया, तो फिर किया क्या आप ने! मतलब यह की लोकतंत्र एक लचीला रबर है। आप जितना चाहें उसे खींच सकते हैं। जिधर चाहें घुमा सकते हैं। जैसा चाहंे मोड़ सकते हैं। कोई टोकने-रोकने वाला नहीं है। अगर ऐसा करने से कोई रोके, तो लोकतंत्र में दिए मौलिक अधिकार की दुहाई दे दीजिए। रोकने वाला खुद रूक जाएगा। इतना ही नहीं, वो आपकी लोकतांत्रिक निष्ठा के आगे नतमस्तक हो जाएगा। क्योंकि वह जनता है मौलिक अधिकार की बात अधिकारपूर्वक कहना ही हमारा मौलिक कर्तव्य है। और जिसे अभी-अभी आप ने बखूबी अंजाम दिया है।
लोकतंत्र का असली फायदा उठाने का विशेष समय चुनाव (इसे परस्पर गलियाने के उत्सव की संज्ञा भी दी जा सकती है) है। लेकिन निष्ठुर चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता लागू कर देने से प्रत्याशी पूरा फायदा उठाने से वंचित रह जाते हैं। इसके बावजूद खरी-खरी से लेकर अपने विराधियों की ऐसी की तैसी तक कर डालने, जैसे को तैसा से लेकर, ईंट का जवाब पत्थर से देने तक बात चली जाती है।
आप वहाँ खड़े-खड़े क्या सोच रहे हैं जनाब? यदि आप के दिल में रत्ती भर भी हिट होने की चाहत दबी है, तो आप भी लोकतंत्र का फायदा उठाइए न! फौरन पकड़ लीजिए किसी महापुरूष को। कुछ बोल दीजिए। कुछ सोचने की आवश्यकता नहीं है। लोकतंत्र है न! अनाप-शनाप कुछ भी बोल दीजिए। यानी बक दीजिए। आप बकेंगे तो लोग समझेंगे कि आप बोल रहे हैं। वर्षों का उनका अनुभव बताता है कि बकने को ही सुसंस्कृत तरीके से भाषण, वक्तव्य, चुनावी घोषणा पत्र कहा जाता है। आप को शायद ही कोई हिट करे। यदि कुछ लोकतंत्र विरोधी मानसिकता वालों से हिट होने का चांस रहता बनता है, तो कह दीजिए मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। यहाँ ऐसा ही किया जाता है। तोड़-मरोड़ करने से भला कैसा गुरेज! तोड़-मरोड़ तो लोकतंत्र का खास लक्षण बन चुका है। चुनाव जीतने-हराने के लिए तोड़-मरोड़। सरकार बनाने-गिराने के लिए तोड़-मरोड़।
सच पूछो तो लोकतंत्र को ही तोड़-मरोड़ कर चलाया जा रहा है। जो जितना ज्यादा तोड़-मरोड़ करने में सिद्धहस्त है उसे ‘किंगमेकर’ जैसी पदवी से अलंकृत किया जाता है। तो जितना जी करे अपने बयान को तोडि़ए। जितना जी करे उतना मरोडि़ए। आपको न तोड़ा जाएगा, न मरोड़ा जाएगा। लोकतंत्र में धनुष की प्रत्यंचा से शब्दभेदी बाण खूब छोडि़ए। निशाने पर लगा तो ठीक, चूक गया तो भी ठीक। लोकतंत्र आपके दोनों हाथों में लड्डू देता है। मन हो तो खाइए। मन हो तो खिलाइए।





