प्रजातन्त्र के चार प्रमुख स्तम्भ माने जाते हैं, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडि़या। परन्तु पांपरागत मीडि़या यानी पत्र-पत्रिकाओं और टेलीविजन के मुकाबले सोशल मीडि़या यह बहुत बड़े दायरे तक ‘अपनी बात’ कहने का मौका देती है। कभी-कभी यह दिये को तूफान के मुकाबले भी खड़ा कर सकता है। बेशक, एक हद तक इसमें लोकतान्त्रिक रवैया दिखता है। लेकिन जो ताकतवर है, वह अक्सर इसे भी मैनीपुलेट कर लेता है।
लोकतन्त्र में सार इससे आता है कि आप क्या कहते हैं? कैसे कहते हैं? इस क्या और कैसे का जवाब, सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठमूमि से लेकर विचार-संस्कार तक से जुड़ता है।
करीब दो साल पहले असम में बोडो-मुस्लिम झड़पों के बाद, देश भर मंे तथा खास तौर पर शहरों में पूर्वोत्तर के लोगों को असुरक्षित करने में और फिर बड़े पैमाने पर उनका पलायन कराने में भी, सोशलमीडि़या की भूमिका दर्ज हुई थी। फिर भी समस्या, इन प्रत्यक्ष ‘दुरूपयोगों’ से कहीं बहुत बड़ी है। यह सबसे कटे हुए अकेले मनुष्य की दुनियां है। एक गहरी विड़म्बना में ‘कहने’ की प्रकटतः सामाजिक क्रिया, यहां इस हद तक एकान्तिक हो जाती है कि यहाँ सामान्य सामाजिक-सांस्कृतिक विधि-निषेध भी स्थगित हो जाते हैं। नतीजा यह कि यह ‘कहना’ बहुत बार सपने की सी अवचेतन क्रिया से लेकर, सार्वजनिक शौचालयों के कुंठापूर्ण दीवार लेखन के बीच झूलता सा नजर आता है। जाहिर है कि इसके पीछे सबसे बढ़कर इसका एहसास काम कर रहा होता है कि हमें कोई देख नहीं रहा है।
अचरज नहीं कि पश्चिमी देशों में अब गंभीरता से यह पुरानी सीख बाकायदा याद दिलाई जा रही है कि पहले सोचें, फिर लिखें और जरूरी हो तभी बोलें! इसका अर्थ यह है कि सोशल मीडि़या की सामाजिकता पर निरन्तर सवाल उठाने का समय आ गया ह
लोकतन्त्र में सार इससे आता है कि आप क्या कहते हैं? कैसे कहते हैं? इस क्या और कैसे का जवाब, सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठमूमि से लेकर विचार-संस्कार तक से जुड़ता है।
करीब दो साल पहले असम में बोडो-मुस्लिम झड़पों के बाद, देश भर मंे तथा खास तौर पर शहरों में पूर्वोत्तर के लोगों को असुरक्षित करने में और फिर बड़े पैमाने पर उनका पलायन कराने में भी, सोशलमीडि़या की भूमिका दर्ज हुई थी। फिर भी समस्या, इन प्रत्यक्ष ‘दुरूपयोगों’ से कहीं बहुत बड़ी है। यह सबसे कटे हुए अकेले मनुष्य की दुनियां है। एक गहरी विड़म्बना में ‘कहने’ की प्रकटतः सामाजिक क्रिया, यहां इस हद तक एकान्तिक हो जाती है कि यहाँ सामान्य सामाजिक-सांस्कृतिक विधि-निषेध भी स्थगित हो जाते हैं। नतीजा यह कि यह ‘कहना’ बहुत बार सपने की सी अवचेतन क्रिया से लेकर, सार्वजनिक शौचालयों के कुंठापूर्ण दीवार लेखन के बीच झूलता सा नजर आता है। जाहिर है कि इसके पीछे सबसे बढ़कर इसका एहसास काम कर रहा होता है कि हमें कोई देख नहीं रहा है।
अचरज नहीं कि पश्चिमी देशों में अब गंभीरता से यह पुरानी सीख बाकायदा याद दिलाई जा रही है कि पहले सोचें, फिर लिखें और जरूरी हो तभी बोलें! इसका अर्थ यह है कि सोशल मीडि़या की सामाजिकता पर निरन्तर सवाल उठाने का समय आ गया ह





