‘‘अतीत के सोंच में क्यों पड़े हो, क्योंकि अतीत व्यतीत हो गया है। वह सत्ताविहीन हो गया है। भविष्य की चिंन्ता क्यों? क्यों कि वह अभी आया नहीं, और उसकी भी कोई सत्ता नहीं है। सत्ता केवल वर्तमान की है, इसलिये वर्तमान की समग्रता में जियो, वर्तमान को श्रेष्ठ बनाओ, तुम्हारा अतीत भी सुन्दर बनेगा और भविष्य भी श्रेष्ठ होगा।’’ -स्वामी रामदेव
‘‘ईश्वर ने दुनियां की हर चीज बहुत सुन्दर बनाई है, परन्तु अभी हमारे पास सुन्दरता को नापने का जो पैमाना है, वह बहुत छोटा है और उससे ही हम हरचीज को देखते और उसके प्रति निर्णय लेते हैं। सोचो! जब ईश्वर ने हर चीज सुन्दर बनाई है तो उसके पास उसका पैमाना भी होगा। अतः उस ईश्वरीय पैमाने को जिस दिन हम जान जायेंगे, उस दिन यह दुनियां वास्तव में बहुत सुन्दर हो जायेगी।’’- कश्यप
‘‘जो तुम्हारे पास नहीं है, उसका दुःख कैसा? जो तुम्हारे पास है, उसकी खुशी मनाओ।’’ -अज्ञात
हमारे पूर्वर्जों नें हम कैसे जिएँ, यह दिशा-दृष्टि देते हुए सामाजिक सिद्धान्त बताया -
सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे शन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मां कश्चिद् दुःख भाग्भवेत।
और इसी सामाजिक सिद्धान्त के जीवन से हम सम्पूर्ण विश्व में भारतीय मनीषा के इस ध्येय वाक्य, ‘‘वसुधैव कुटुम्बकमं’’ की मान्यता स्थापित कर सकेंगे। जबकि, आज चारो ओर ग्लोबलाइजेशन की चर्चा है, और जिसके पीछे ‘‘विश्व बाजार’’ की पे्ररणा है। यदि ‘‘विश्व बाजार’’ के स्थान पर ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की मान्यता स्थापित करनी है तो हमें पहले अपने भारत को श्रेष्ठ बनाना होंगा, अर्थात ‘‘लोकतन्त्र के महापर्व’’ में श्रेष्ठ भारत के लिए मतदान हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए।
‘‘ईश्वर ने दुनियां की हर चीज बहुत सुन्दर बनाई है, परन्तु अभी हमारे पास सुन्दरता को नापने का जो पैमाना है, वह बहुत छोटा है और उससे ही हम हरचीज को देखते और उसके प्रति निर्णय लेते हैं। सोचो! जब ईश्वर ने हर चीज सुन्दर बनाई है तो उसके पास उसका पैमाना भी होगा। अतः उस ईश्वरीय पैमाने को जिस दिन हम जान जायेंगे, उस दिन यह दुनियां वास्तव में बहुत सुन्दर हो जायेगी।’’- कश्यप
‘‘जो तुम्हारे पास नहीं है, उसका दुःख कैसा? जो तुम्हारे पास है, उसकी खुशी मनाओ।’’ -अज्ञात
हमारे पूर्वर्जों नें हम कैसे जिएँ, यह दिशा-दृष्टि देते हुए सामाजिक सिद्धान्त बताया -
सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे शन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मां कश्चिद् दुःख भाग्भवेत।
और इसी सामाजिक सिद्धान्त के जीवन से हम सम्पूर्ण विश्व में भारतीय मनीषा के इस ध्येय वाक्य, ‘‘वसुधैव कुटुम्बकमं’’ की मान्यता स्थापित कर सकेंगे। जबकि, आज चारो ओर ग्लोबलाइजेशन की चर्चा है, और जिसके पीछे ‘‘विश्व बाजार’’ की पे्ररणा है। यदि ‘‘विश्व बाजार’’ के स्थान पर ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की मान्यता स्थापित करनी है तो हमें पहले अपने भारत को श्रेष्ठ बनाना होंगा, अर्थात ‘‘लोकतन्त्र के महापर्व’’ में श्रेष्ठ भारत के लिए मतदान हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए।





