Tuesday, November 18, 2014

अब प्राकृतिक रूप से पकाएं कच्चे फल - डाॅ॰ राज किशोर एवं डाॅ॰ वी॰के॰ चैधरी


देश में जनसंख्या बढ़ने तथा स्वास्थ्य के प्रति लोगो की बढ़ती जागरूकता से राष्ट्रीय स्तर पर बड़े शहरों से लेकर सुदूर गाँवों तक बाजार में विभिन्न प्रकार के पके फलों की माँग निरन्तर बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में फलों की खेती करने वाले किसानों तथा फलों का व्यापार करने वाले बड़े-छोटे व्यापारियों के लिए बाजार में पके फलों की जितनी अधिक माँग रहती है उतनी बड़ी मात्रा में फल प्राकृतिक रूप से पक नहीं सकते हैं। इसलिए मांग और आपूर्ति के बीच के इस अन्तर को दूर करने के लिए बागवानों एवं व्यापारियों को फलों को पकाने के लिए कृत्रिम विधियों का सहारा लेना पड़ता है। दूसरी ओर विभिन्न प्रकार के फल व्यावसायिक स्तर पर दूर-दराज के क्षेत्रों और यहाँ तक कि दूसरे प्रदेशों में उगाए जाते है, जहाँ से वे देश के विभिन्न क्षेत्रों में परिवहन के विभिन्न माध्यमों से भेजे जाते है। अब यदि दूर-दराज से भेजे जाने वाले इन फलों को पकी हुई अवस्था में विपणन के लिए तोड़ा जाएगा तों वांछित स्थान तक पहुँचते-पहुँचते ये फल खराब हो जायेंगें या फिर सड़ जायंेगें। इन सभी परिस्थितियों के कारण फलों को कृत्रिम रूप से पकाने का सहारा लिया जाता है।
फलों को कृत्रिम रूप से पकाने की विधियाँ -
फल चाहें प्राकृतिक रूप से पकें या कृत्रिम रूप से पकाएं जायें, इसके लिए इथिलीन और एसिटिलीन गैसें मुख्य कारक हैं। ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है।’ यह कहावत जिसने भी और जिस उद्देश्य से पहली बार कही होगी उसे कृषि कार्यो का गहन अनुभव रहा होगा, क्योंकि इस कहावत का वैज्ञानिक आधार है। खरबूजे के खेत में जब एक खरबूजा पकता है तो इस क्रिया में इथिलीन गैस मुक्त होती है। मुक्त हुई यह गैस खेत के दूसरे खरबूजे को पकाने में उत्प्रेरक का कार्य करती है और धीरे-धीरे पूरे खेत में इथिलीन गैस मुक्त होने लगती है और फलों के पकने की प्रक्रिया तीव्रता से चल पड़ती है। कृत्रिम रूप से फलों को पकाने के लिए बागवानों और व्यापारियों द्वारा कैल्सियम कार्बाइड रसायन (रसायनिक सूत्रःब्ंब्2) का उपयोग किया जाता है। रसायन शास्त्री फ्रेडरिक वोहलर ने वर्ष 1862 में सर्वप्रथम यह ज्ञात किया था कि कैल्सियम कार्बाइड पानी के साथ रसायनिक अभिक्रिया करके एसिटिलीन गैस का निर्माण करती है। इस गैस का उपयोग उसी समय से अनेक औद्योगिक कार्यो के साथ-साथ फलों को पकाने में होता आ रहा है। यद्यपि एसिटिलीन इथिलीन सदृश गैस होती है और इसका व्यावसायिक स्तर पर उपयोग फलों को पकाने के लिए किया जाता है, लेकिन यह मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक खतरनाक है, जिसके कारण कैल्शियम कार्बाइड से पकाएं फलों को खाने से आँख, फेफड़े, गुर्दे एवं हृदय पर अत्यधिक दुष्प्रभाव पड़ता है। कैल्शियम के इन्हीं दुष्प्रभावों को देखते हुए फलों को पकाने के लिए शासन द्वारा इसे प्रतिबन्धित कर दिया गया है और विकल्प के रूप में इथेफान या इथेरल नामक तरल रसायनों के उपयोग की अनुमति प्रदान की गयी है।
इथेफान या इथेरल के द्वारा अलग-अलग प्रकार के फलों को पकाने के लिए इन रसायनों की अलग-अलग मात्राओं का प्रयोग किया जाता है। आम एवं केला पकाने के लिए 12.5 मि॰ली॰, पपीता पकाने के लिए 18 मि॰ली॰ तथा टमाटर को पकाने के लिए 6.5 मि॰ली॰ रसायन प्रति दस लीटर पानी में घोलकर और उसमें 10 मि॰ली॰ तरल साबुन मिलाकर घोल तैयार करके फलों को इस घोल में 10 से 15 मिनट तक (फलों के आकार के अनुसार) डुबोकर निकाल लिया जाता है। 5 से 7 दिन के भीतर सारे फल समान रूप से पक जाते हैं। रसायनों की माप के लिए कोई साधन न होने पर चाय की चम्मच का प्रयोग करना चाहिए। चाय की एक चम्मच में पाँच  मि॰ली॰ दवा आती है।
फलों को पकाने के प्राकृतिक उपाय -
नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, नरेन्द्र नगर, कुमारगंज, फैजाबाद के फल प्रसंस्करण एवं संरक्षण विभाग के अध्यक्ष डाॅ॰ संजय पाठक द्वारा विभिन्न प्रकार के कच्चे फलों में मिठास बढ़ाने तथा पेड़ों पर फलों को देर से पकाने जैसे अनेक कार्यों के लिए सरल विधियों का विकास किया गया है। पोस्ट-हार्वेस्ट टेक्नोलाॅजी के विशेषज्ञ डाॅ॰ संजय पाठक के अनुसार कच्चा केला, पपीता, आम तथा टमाटर जैसे फलों को प्राकृतिक रूप से पकाने के लिए इन फलों के साथ पका पपीता, सेब, आम, केला या पका शरीफा रख देने से कच्चे फल आसानी से पक जाते है। प्राकृतिक रूप से पके हुए इस प्रकार के फल रंग एवं स्वाद में उत्तम किस्म के रहते है और उपभोक्ता के शरीर पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं डालते हैं। आम को पकाने के लिए 22 डिग्री तापमान एवं केले को पकाने के लिए 18 डिग्री तापमान उचित रहता है। डाॅ॰ पाठक के अनुसार शरीफा एक ऐसा फल है जिसके पकने पर और फलों की तुलना में सबसे ज्यादा इथीलीन गैस का उत्सर्जन होता है जो कच्चे फलों को पकाने के लिए सबसे सुरक्षित गैस मानी जाती है।
डाॅ॰ संजय पाठक द्वारा किए गए शोधों के अनुसार पेड़ों पर लगे फलों का जीवन काल और भण्डारण समय बढ़ाने के लिए बागवान को फल लगे पेड़ों पर कैल्सियम क्लोराईड के दो प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव करना चाहिए। आम के फलों में मिठास बढ़ाने के लिए फलों के पकने के एक माह पूर्व पोटैशियम सल्फेट के एक प्रतिशत जलीय घोल का छिड़काव किया जा सकता है। दूसरी ओर यदि बागवान आम या अन्य फलों को पेड़ों पर देर से पकाना चाहते है तो उन्हें पेड़ों पर लगे फलों पर दो प्रतिशत यूरिया के जलीय घोल का छिड़काव करना चाहिए। ु
- कुमारगंज, कृषि विश्वविद्यालय, फैजावाद।