Saturday, March 8, 2014

सम्पादक की कलम से - रामसरन

अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में लम्बी छलांग लगाते हुए भारत ने मंगलवार दिनाँक 5 नवम्बर, 2013 को भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के आन्ध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा स्थित सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र से अपने मंगल यान का सफल प्रक्षेपण किया है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मंगल ग्रह पर जीवन, जलवायु, भूगर्भिक स्थिति और जीवन की उत्पत्ति एवं संवहनीयता के बारे में आँकड़े जुटाना है। लगभग दस माह में 40 करोड़ कि॰मी॰ की यात्रा के पश्चात् अगले वर्ष 24 सितम्बर, 2014 को यह यान मंगल ग्रह की कक्षा में चक्कर काटते हुए महत्वपूर्ण जानकारियाँ भेजेगा। इस मिशन की लागत रू॰ 450 करोड़ है। अभी तक केवल अमेरिका, रूस और योरोपियन यूनियन ही अपने मंगल मिशन पर सफल हुए हैं। इस अभियान के माध्यम से भारतीय अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने जो उपलब्धि अर्जित की है वह देश को गौरवान्वित करने वाली है तथा इससे केवल अन्तरिक्ष की दुनिया ही नही अपितु सामरिक दुनिया में भी भारत नई ऊचाइयाँ छुएगा।
मंगल यान को मंगल की कक्षा में स्थापित करने में सफलता मिलने पर अमेरिका, रूस और योरोप के बाद भारत मंगल पर सफल अभियान वाला चैथा देश होगा। राष्ट्र के गौरव से जुड़े इस अभियान से अपेक्षित उपलब्धि न भी हो पाएगी तो भी न केवल मंगल ग्रह की अपितु सौर मण्डल के अन्य ग्रहों के बारे में हमारी खोज का दायरा बढ़ेगा और अन्तरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में हमारी बेहतर छवि बनेगी।
जहाँ तक इस अभियान के लाभ-हानि का प्रश्न है तो प्रत्येक कार्य की भाँति इस विषय के भी दो प्रकार के मत होना स्वाभाविक है। जहाँ देश के नकारात्मक सोच के लोग इसका विरोध कर रहे हैं वहीं चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स और अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स ने एक स्वर से कहा है कि जिस देश में प्रत्येक वर्ष हजारों लोग भूख एवं साधारण बीमारियों से मर रहे हैं, उसे प्रथम श्रेणी के स्पेस क्लब में शामिल होने के नाम पर की गई इस फिजूलखर्ची से बचना चाहिए। इस सन्दर्भ में इसरो के पूर्व अध्यक्ष यू॰आर॰ राव ने कहा है कि देश दीवाली की खरीदारी पर अनुमानतः रू॰ 5000 करोड़ व्यय करता है तो मंगल पर पहुँचने के लिए रू॰ 450 करोड़ का व्यय उचित है। कहते हैं कि राष्ट्र मण्डल के खेलों की अगवानी के कार्यक्रम में इससे अधिक व्यय हुआ था। भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था अन्तरिक्ष विज्ञान के लिए इतना व्यय आसानी से कर सकती है। विगत तीन वर्षों में इसरो ने देश के लिए केवल 13 सेटेलाईट प्रक्षेपित किए जबकि ऐसे विदेशी सेटेलाईटों की संख्या 19 रही। इनसे भारत को करोड़ों रूपये की आय हुई है। इस दिशा में इसरो की उपलब्धियाँ रेखांकित किए जाने योग्य है। अतएव, इस प्रकार की आलोचनाओं का कोई बहुत महत्व नहीं है। विशेषज्ञों का मत है कि भारत के सस्ते मंगल अभियान की सफलता आने वाले दिनों में इसरो के लिए आय के नये रास्ते खोल सकती है। वजह साफ है कि नासा के पहले मंगल मिशन का दसवाँ और जापान-चीन के अभियानों की मात्र चैथाई लागत भारत के इस मंगल अभियान की आई है। इसी क्रम में नासा ने एक बार फिर मंगल ग्रह के लिए अपना एक नया स्पेसक्राफ्ट ‘मावेन’ लांच किया है जिसकी लागत रू॰ 4154 करोड़ आई है जो अगले वर्ष सितम्बर में मंगल की कक्षा में पहुँचेगा।
मंगल अभियान के अभी कई चरण बाकी हैं तथा सफलता की कहानी लिखी जानी शेष है। अतएव, हम सभी देशवासियों को इस अभियान की सफलता की कामना करनी चाहिए।
आज हमारे नीति निर्धारकों को गहन अध्ययन, मंथन एवं निष्पादन किए जाने की परम आवश्यकता है ताकि ज्ञान-विज्ञान एवं तकनीकी के समस्त क्षेत्रों के पिछड़ेपन एवं सभी प्रकार की विदेशों पर निर्भरता के कारणों का पता लगाकर इनके निवारण हेतु भारतीय मेधा, संसाधनों का उपयोग, अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों से प्रेरणा प्राप्त करते हुए देश को महाशक्ति बनाने हेतु प्रभावी कार्यवाही निष्पादित हो सके।
- रामशरण