हम अपने संस्कारों, पूजाविधियों और विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन्स पर गौर करें तो वे बहुत मिलते-जुलते लगेंगे। हम उन संस्कारों को भूल रहे हैं, लेकिन सही बात यह है कि वे स्वास्थ्य के अच्छे इन साइक्लोपीडिया हैं। हमारे संस्कार हमें प्रकृति के करीब लाने वाले हैं। हम प्रकृति से दूर होते जा रह हैं और उसी का परिणाम हैं कि हम लगातार जानलेवा रोगों के जाल में फंसते जा रहे हैं। अगर हम स्वस्थ रहना चाहते हैं, तो हमें फिर से पुरानी परम्पराओं में छिपे स्वास्थ्य के मन्त्रों को अपने जीवन में उतारना होगा।
हमारे पारिवारिक या सामाजिक संस्कारों के अवसर पर अब घरों में हवन होना बन्द हो रहे हैं। यही वजह है कि आज मलेरिया और डेंगू का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है। हर घर में फिर से हवन की प्रथा प्रारम्भ हो जाये तो इन रोगों का प्रकोप निश्चित रूप से बहुत हद तक कम हो जायेगा। अगर घर में हवन होते रहें तो वहांँ मच्छर नहीं आयेंगे। हवन में काम आने वाली सामग्रियों की खासियत यह होती है कि उनके निकले धुएंँ से न तो अस्थमा बढ़ता है, न ही होता है। हवन से वातावरण शुद्ध होता है न कि प्रदूषित। हवन को अगर हम अपने संस्कारों का केन्द्र मान ले तो कह सकते हैं कि हवन में सारे रोगों को भस्म करने या उन्हें भगाने की ताकत है।
हमारे संस्कार में शामिल था कि शाम का खाना सोने से तीन घंटा पहले खा लेना चाहिए। लेकिन अब हम उसे भूलकर देर रात को खाना खाने लगे हैं। आज यह एसिडिटी (अम्लता) की सबसे बड़ी देन बन रही है। खाने-पीने को लेकर जो संस्कार बने थे, वे स्वास्थ्य के हिसाब से बनाये गये थे। वे संस्कार आज भी उतने ही प्रासांगिक हैं, बल्कि आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान उन्हीं की ओर संकेत कर रहे है।
परम्परा को देखें तो घर में किसी अतिथि के आने पर हम उनका स्वागत गुड़-चने से करते थे। अगर हम आयरन की कमी से बचना चाहते हैं तो सप्ताह में एक दिन हमें गुड़-चने का सेवन करना चाहिए। सन्तोषी माँ की पूजा में गुड़-चना चढ़ाते हैं। यह पूजा सिर्फ महिलाएँ करती हैं। हम सभी जानते हैं कि महिलाएँ एनीमिया (खून की कमी) की शिकार रहती हैं। आज एनीमिया का इलाज है आयरन की गोली खाना, जो कार्य गुड़-चना करता था।
माघ, वैशाख एवं कार्तिक महीने में स्नान करके सूर्य की पूजा करना, प्राचीन संस्कार का हिस्सा है। इन महीनों में कैल्शियम की अच्छी मात्रा पाने के लिए उड़द की दाल और तिल खाते है। एक अन्र्राष्ट्रीय अध्ययन कहता है कि कैल्शियम की गोली बिना विटामिन डी की गोली के नहीं दी जानी चाहिए। यह कार्य परम्परागत संस्कारों से सूर्य उपासना पूरा करती थी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब यह भी कहा है कि सप्ताह में एक बार 60 मिली. ग्राम की आयरन की गोली जरूर खानी चाहिए। एक सप्ताह में एक दिन व्रत का मतलब है सप्ताह में एक दिन अनाज नहीं खाना। हर दिन अनाज खाते रहना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान भी कहता है कि रोज कार्बोहाइडेªट, चीनी, चावल, मैदा खाने से मधुमेय, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग बढ़ रहे हैं। हमारी परम्परा में खाना-पान सम्बन्धी उपवास के साथ ही मन के उपवास पर भी जोर दिया गया है। मन के उपवास का अर्थ है अच्छा सोचो, अच्छा करो, अच्छा बोलो, अच्छा लिखो। राजसी ओर तामसी भोजन से दूर रहो। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान ने भी मान लिया है कि अवसाद (डिपे्रशन) से बचने के लिए अच्छी जीवनशैली अपनानी चाहिए। हमारे संस्कार हमें अनेक प्रकार की बीमारियों से बचाते है।
हर दो महीने में ऋतु बदलती है और हर दो पक्षों में मास बदलता है। हमारे संस्कार कहते हैं कि हमें इस परिवर्तन के हिसाब से अपने खान-पान को तय करना चाहिए। जैसे फागुन के महीने में नमक और खट्टा कम खाना चाहिए। पूर्णिमा के दिन रक्तचाप ऊपर-नीचे होता है, गुस्सा बढ़ता है। इसका ध्यान रखे तो दुष्प्रभाव से बच सकते हैं।
मौसम के अनुसार पूजा में जो प्रसाद खाया जाता है वह भी स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर बना था। जिस अन्न या फल का दान दिया जाता है, उसमें यह पाठ छिपा रहता है कि उन्हें खाओ लेकिन कम खाओ। माघ महीने में तिल की पूजा होती है, तिल का दान दिया जाता है। इसलिए हम तिल खाते जरूर हैं, लेकिन उसे कम मात्रा में खाना चाहिए। ताजेे फलों में कोलोस्ट्राॅल नहीं होता, इसलिए फल भगवान को चढ़ाते हैं और हम उसे प्रसाद के रूप में खाते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि स्वास्थ्य के लिए फलों को सबसे अधिक जरूरी माना गया है। जो चीजे भगवान को भोग नहीं लगाया जाता, उन्हे मत खाओ तो अच्छा है। भगवान को मूली नहीं चढ़ाते, जो चीजे जमीन के नीचे से आती हैं उन्हें भी हम भगवान को नहीं चढ़ाते, अतः ऐसी चीजों को कम खाएँ तो अच्छा है। हमारे संस्कार या जीवन पद्धति स्वास्थ रहने के लिए सदैव उपयोगी है। - पर्यावरण चेतना से साभार
हमारे पारिवारिक या सामाजिक संस्कारों के अवसर पर अब घरों में हवन होना बन्द हो रहे हैं। यही वजह है कि आज मलेरिया और डेंगू का प्रकोप लगातार बढ़ रहा है। हर घर में फिर से हवन की प्रथा प्रारम्भ हो जाये तो इन रोगों का प्रकोप निश्चित रूप से बहुत हद तक कम हो जायेगा। अगर घर में हवन होते रहें तो वहांँ मच्छर नहीं आयेंगे। हवन में काम आने वाली सामग्रियों की खासियत यह होती है कि उनके निकले धुएंँ से न तो अस्थमा बढ़ता है, न ही होता है। हवन से वातावरण शुद्ध होता है न कि प्रदूषित। हवन को अगर हम अपने संस्कारों का केन्द्र मान ले तो कह सकते हैं कि हवन में सारे रोगों को भस्म करने या उन्हें भगाने की ताकत है।
हमारे संस्कार में शामिल था कि शाम का खाना सोने से तीन घंटा पहले खा लेना चाहिए। लेकिन अब हम उसे भूलकर देर रात को खाना खाने लगे हैं। आज यह एसिडिटी (अम्लता) की सबसे बड़ी देन बन रही है। खाने-पीने को लेकर जो संस्कार बने थे, वे स्वास्थ्य के हिसाब से बनाये गये थे। वे संस्कार आज भी उतने ही प्रासांगिक हैं, बल्कि आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान उन्हीं की ओर संकेत कर रहे है।
परम्परा को देखें तो घर में किसी अतिथि के आने पर हम उनका स्वागत गुड़-चने से करते थे। अगर हम आयरन की कमी से बचना चाहते हैं तो सप्ताह में एक दिन हमें गुड़-चने का सेवन करना चाहिए। सन्तोषी माँ की पूजा में गुड़-चना चढ़ाते हैं। यह पूजा सिर्फ महिलाएँ करती हैं। हम सभी जानते हैं कि महिलाएँ एनीमिया (खून की कमी) की शिकार रहती हैं। आज एनीमिया का इलाज है आयरन की गोली खाना, जो कार्य गुड़-चना करता था।
माघ, वैशाख एवं कार्तिक महीने में स्नान करके सूर्य की पूजा करना, प्राचीन संस्कार का हिस्सा है। इन महीनों में कैल्शियम की अच्छी मात्रा पाने के लिए उड़द की दाल और तिल खाते है। एक अन्र्राष्ट्रीय अध्ययन कहता है कि कैल्शियम की गोली बिना विटामिन डी की गोली के नहीं दी जानी चाहिए। यह कार्य परम्परागत संस्कारों से सूर्य उपासना पूरा करती थी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब यह भी कहा है कि सप्ताह में एक बार 60 मिली. ग्राम की आयरन की गोली जरूर खानी चाहिए। एक सप्ताह में एक दिन व्रत का मतलब है सप्ताह में एक दिन अनाज नहीं खाना। हर दिन अनाज खाते रहना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान भी कहता है कि रोज कार्बोहाइडेªट, चीनी, चावल, मैदा खाने से मधुमेय, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग बढ़ रहे हैं। हमारी परम्परा में खाना-पान सम्बन्धी उपवास के साथ ही मन के उपवास पर भी जोर दिया गया है। मन के उपवास का अर्थ है अच्छा सोचो, अच्छा करो, अच्छा बोलो, अच्छा लिखो। राजसी ओर तामसी भोजन से दूर रहो। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान ने भी मान लिया है कि अवसाद (डिपे्रशन) से बचने के लिए अच्छी जीवनशैली अपनानी चाहिए। हमारे संस्कार हमें अनेक प्रकार की बीमारियों से बचाते है।
हर दो महीने में ऋतु बदलती है और हर दो पक्षों में मास बदलता है। हमारे संस्कार कहते हैं कि हमें इस परिवर्तन के हिसाब से अपने खान-पान को तय करना चाहिए। जैसे फागुन के महीने में नमक और खट्टा कम खाना चाहिए। पूर्णिमा के दिन रक्तचाप ऊपर-नीचे होता है, गुस्सा बढ़ता है। इसका ध्यान रखे तो दुष्प्रभाव से बच सकते हैं।
मौसम के अनुसार पूजा में जो प्रसाद खाया जाता है वह भी स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर बना था। जिस अन्न या फल का दान दिया जाता है, उसमें यह पाठ छिपा रहता है कि उन्हें खाओ लेकिन कम खाओ। माघ महीने में तिल की पूजा होती है, तिल का दान दिया जाता है। इसलिए हम तिल खाते जरूर हैं, लेकिन उसे कम मात्रा में खाना चाहिए। ताजेे फलों में कोलोस्ट्राॅल नहीं होता, इसलिए फल भगवान को चढ़ाते हैं और हम उसे प्रसाद के रूप में खाते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि स्वास्थ्य के लिए फलों को सबसे अधिक जरूरी माना गया है। जो चीजे भगवान को भोग नहीं लगाया जाता, उन्हे मत खाओ तो अच्छा है। भगवान को मूली नहीं चढ़ाते, जो चीजे जमीन के नीचे से आती हैं उन्हें भी हम भगवान को नहीं चढ़ाते, अतः ऐसी चीजों को कम खाएँ तो अच्छा है। हमारे संस्कार या जीवन पद्धति स्वास्थ रहने के लिए सदैव उपयोगी है। - पर्यावरण चेतना से साभार





