गंगा जल की यह विशेषता है, ‘‘यदि साधारण पानी में गंगा जल मिला दिया जाये तो 20 मिनट में वह उसे उबले पानी जैसा शुद्ध कीटाणु रहित बना देगा।’’ गंगा जल में यह गुण उसके जल में पाये जाने वाले ‘एन्टीबैक्टीरियल बैट्रिया फोस’ (जीवाणुभक्षी) वायरस के कारण है। क्योंकि यह जीवाणु भक्षक बैट्रिया फोस वायरस गंगा जल में आने वाले ई-कोली जैसे जीवाणुओं का भक्षण कर लेता है और सदैव गंगा जल कीटाणु रहित शुद्ध बना रहता है। इसके अतिरिक्त गंगा जल में कुछ भू-रसायनिक क्रियायें भी होती रहती हैं, जिसके कारण इसके जल में कभी कीड़े पैदा नहीं होते। 1991 में गो-मुख से गंगा जल लाकर राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई), लखनऊ के वायलोजी लैब में ठण्ढ़े व अंधेरे स्थान पर पिछले 16 वर्षों से रखा है, परन्तु न तो वह सड़ा और न ही उसमें कीड़े पड़े, वह ज्यों का त्यों आज भी शुद्ध है। गंगा जल एक एल्क्ेलाइन जल है जिसमें सल्फर, कापर, सल्फेट, साल्ट बड़ी मात्रा में पाये जाते है, जिसके कारण इसमें नहाने से चर्मरोग खत्म हो जाते हैं। गंगा जल की शुद्धता तथा अन्य जल को भी शुद्ध करने की अद्वभुत क्षमता परम्परागत रूप से सभी मानते व स्वीकार करते हैं। परन्तु गंगा जल के सम्बन्ध की जाने वाली यह सारी बाते अब केवल धर्मान्धता का विषय न होकर वैज्ञाानिक रूप से सिद्ध हो चुकी हैं। गंगा जल पर यह प्रयोग एनबीआरआई लखनऊ प्रयोग शाला में मैने खुद किये और पाया कि ‘‘उसमें अन्य विशेषताओं के साथ बैट्रिया फोस वायरस है, जो किसी भी प्रकार के पानी में पैदा होने वाले कीटाणुओं को खा जाता है, जिससे न तो कभी गंगा जल सड़ता है और न ही उसमें कोई कीड़े पड़ते हैं। इसी विशेषता के कारण जब गंगा जल को किसी दूसरे साधारण जल में मिला दिया जाता है तो गंगा जल में पहले से मौजूद बैट्रिया फोस वायरस उस जल के कीटाणुओं को 20 मिनट में ही नष्ट कर जल को कीटाणु रहित शुद्ध बना देता है। ु - वरिष्ठ वैज्ञानिक, राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्धान, (एनबीआरआई,) लखनऊ।





