Saturday, March 8, 2014

कृषि के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों का कहना है! खेती की पुरानी पद्धति कारगर- एन॰बी॰आर॰आई॰ वैज्ञानिक, लखनऊ

नेशनल बाटनिकल रिसर्च इन्स्टीटियुट, एन॰बी॰आर॰आई॰ में आयोजित राष्ट्रीय कृषि सम्बन्धी परिचर्चा में वैज्ञानिकों का मत था कि, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग पर्यावरण में मौजूद प्रकृति चक्र को बिगाड़ रहा है। उनका कहना था, एक सदी के पहले तक हम जिस पद्धति का खेती में प्रयोग करते रह थे, वही अब वैज्ञानिक तथ्यों के साथ आर्गेनिक खेती की शक्ल ले चुकी है। इस अवसर पर  आशियान एग्री-हिस्ट्री फाउन्डेशन के अध्यक्ष प्रो॰ वाई॰एल॰ नेने ने बताया कि आर्गेनिक खेती के साथ ही हम अपनी हजारों साल पुरानी पद्धति को दोबारा विकसित करने की कोशिश में जुटे हैं। रसायन के उपयोग से मृदा की उर्वरता और उसमें मौजूद लाभदायक सूक्ष्मजीव खत्म हो रहे हैं। उन्होने कहा कि गोबर हजारों लाभदायक सूक्ष्मजीवों को पनपने का मौका देते हैं, इसीलिए पुरानी पद्धति में गोबर की खाद का प्रयोग होता था।
उदयपुर के कृषि विश्वविद्यालय में नेमेटोलाॅजी विशेषज्ञ डा॰ सुभाष भार्गव ने बताया कि सूक्ष्मजीवी मृदा को समृद्ध करने का काम करते हैं, जिसको हमारे कृषक बखूबी जानते थे। परन्तु बीच में हमने रसायनों के उपयोग से जो नुकसान किया है, उसकी भरपाई लम्बे समय में हो सकेगी।
गोमूत्र से बढ़ती है पैदावार (सीमैप संगोष्ठी) -
केन्द्रीय औषधीय एवं सुगन्ध पौधा संस्थान, सीमैप में आयोजित संगोष्ठी में पूर्व उप महानिदेशक इंटरनेशनल क्राप रिसर्च इंस्टीट्यिुट फॅार द सेमी एरिडट्रापिक्स हैदराबाद के यशवन्त लक्ष्मण नेने बताया, गोमूत्र व गोबर अच्छे कीटनाशक का काम करते हैं। किसानों को एक सप्ताह में इनका छिड़काव अपनी फसल पर करना परमावश्यक है, इसके प्रयोग से पैदावार बढ़ती है।