Monday, March 3, 2014

लोकतंत्र में सामाजिक पूंजी-डा॰ रेखा त्रिपाठी

एक नागरिक समाज की वास्तविक शक्ति सामाजिक पूंजी की उपलब्धता पर निर्भर करती है। सामाजिक पूंजी मौद्रिक एवम् मानवीय पूंजी से नितांत भिन्न होती है। साधारण शब्दों में अगर हम कहें तो सामाजिक पूंजी सामुदायिक स्रोतों से सम्बद्ध होती है। जो कि एक समुदाय में अंतर्निहित होती है। यह कुछ सीमा तक अस्पष्ट एवम् अव्यक्त होती है। किन्तु जब प्रभावशाली रूप में इसका उपयोग किया जाता है तो इसके परिणाम स्पष्टतः परिलक्षित होते हैं। सामाजिक पूंजी सामाजिक संगठन के तत्वों से भी सम्बद्ध है। यथा विश्वास, मूल्य, संरचना, संस्थाएं, परस्पर सम्बन्ध इत्यादि, जो समाज की कुशलता को समन्यवयात्मक कृत्यों के क्रियान्वयन द्वारा सुधर सकती है। सामाजिक पूंजी का स्तर विकास के लिए अर्थपूर्ण क्रियाकलापों तक सीमित नहीं होता है तथापि वर्तमान लोकतांत्रिक सम्बन्धों मे ंराजनीति के आधार पर ये एक ऐसी विधा के रूप में विकसित हो रही है जिसके द्वारा आम जनमानस में अमीर बनने की कल्पना प्रभावी होती है। आखिरकार राजनीतिक सामाजिक प्रणाली में कुबेरपति बनने की होड़ से ही मानवीय गुणों में भ्रष्ट आचरण जन्म लेता है जिसके गुण और अवगुणों से लोकतंत्र पर आघात और प्रतिघात जैसा असर होता है।
वोटों की बुकिंग:
नागरिक समाज का राजनीति के विकास और उसके विनाशकारी परिणामों के बारे में चर्चा करते समय लोकतंत्र की धारणा में मतदाताओं का स्थान इसीलिए गौण हो जाता है। जिस दौर में बड़े-बडे घोटालों की चारो ओर चर्चा हो रही हो, लोक लुभावन प्रचारों के माध्यम से वोट खरीदने के भ्रष्टाचार की ओर कम ही ध्यान जाता है। कुछ लोग तो इसको भ्रष्टाचार की श्रेणी में रखते ही नहीं है। लोगों को अपने वर्तमान और कार्यक्रमों के बारे में बताना और अपनी उपयोगिता को साबित करना तो राजनीति का मान्य तरीका है। इसमें भ्रष्ट आचरण कहां है? सचमुच नहीं है। अगर वे वादे, वे कार्यक्रम और वे योजनाएं सचमुच दूरगामी लाभ देने वाली हों लेकिन यदि ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से राजनीति से जुडे़ लोग केवल भ्रांति फैलाना चाहते हों तो इसे अनैतिक काम ही कहा जाएगा। भ्रष्ट वे इस अर्थ में होते हैं कि उन पर होने वाला सरकारी खर्च व्यर्थ हो जाता है और जानबूझकर किया गया सार्वजनिक अपव्यय स्पष्ट तौर पर भ्रष्ट आचरण के वर्ग में आता है।
इन्दिरा से आरंभ हुई नीति:
आम भारतीयों को भ्रांति में डालकर उनसे वोट पाने का काम आजादी के बाद से ही राजनीतिक दलों ने किया है। लेकिन इस प्रकार के वादे अधिकतर सपने बुनने जैसे ही होते रहे है। मतदाता एक अस्पष्ट सी आवाज और उम्मीद के बल पर उस दल या नेता को वोट दे देता था। अगर हम देखे तो पुरानी कांग्रेस से अलग होने पर इन्दिरा गांधी को किसी ऐसे नारे की आवश्यकता थी जिसमें अपने कार्यकर्ताओं में ही नहीं अपितु आम जनता में भी नया उत्साह भरने और कांगे्रस को पुनर्जीवन दिलाने का रास्ता मिल जाए। गरीबी हटाओ का नारा देकर उन्होनें उस समय अन्नाभाव से त्रस्त जनता को और गरीबी के अभिशाप तले जी रही करोड़ों आवाजों को आशा दिलाई कि वे अगर सत्ता में आईं तो ऐसा ही चमत्कार होगा। गरीबी मिट जाएगी। यह वह समय था जब लोग छोटी से छोटी राहत से भी नए भविष्य के सपने संजोने लगते थे। राजाओं के प्रीवीपर्स हटाने से न तो देश की अर्थव्यवस्था में कोई बड़ा असर पड़ा न ही गरीबों के जीवन स्तर में कोई सुधार हो सका। लेकिन ये एक सांकेतिक कदम था जिसने तात्कालिक रूप से इन्दिरा गांधी की विश्वसनीयता को बढ़ा दिया था। गरीबी हटी नहीं, क्योंकि गरीबी हटाने का कोई ठोस कार्यक्रम ही नहीं था। लेकिन लोगों को ये एहसास कई वर्षो के बाद जाकर हो सका।
एनटीआर और जयललिता ने बीज बोया:
लेकिन इन्दिरा गांधी ने जो प्रक्रिया आरम्भ कर दी थी उसको उन्हीं के कुछ विरोधियों ने ठोस वादों और कार्यक्रमों में बदल दिया। जो इस मायने में झूठे थे कि उनको लागू तो किया जा सकता है लेकिन उनको देर तक नहीं चलाया जा सकता है। न ही उनकी कोई सामाजिक और आर्थिक उपयोगिता ही साबित थी। नंदमूरि तारक रामाराव ने आंध्र प्रदेश में पहली बार दो रुपये किलो चावल देने का वादा किया और जीतकर कार्यक्रम को लागू भी कर दिया। किसी तरह से कुछ समय  तो वे उसको चलाते रहे लेकिन जल्द ही उनको मालूम हो गया कि राज्य की खराब आर्थिक हालात में सरकार इतने बड़े घाटे को नहीं सह सकती है। उनके वारिसों ने तो इसको चुपचाप भुला दिया। अब इस योजनागत फार्मूले को जयललिता सरकार ने लागू कर दिया है। ऐसे ही कार्यक्रमों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा साइकिल या लैपटाप देनेे का वादा तो किसी को साड़ी बांटने की योजना भी शामिल है लेकिन यूपी की अखिलेश यादव सरकार भी इस फार्मूले की काट की तैयारी में है ताकि सरकार के भारी घाटे को काबू में रखा जा सके।
नारो के गरीब खरीदार:
इस सिलसिले में दो बातों पर ध्यान जाता है। एक ये कि, इस प्रकार के कार्यक्रम केवल उन लोगों के लिए होते हैं, जिनके सामने दो जून की रोटी की समस्या होती है। यानि ये वे आंचलिक लोग हैं जो रोज कुआं खोदकर पानी पीते हैं। उनको कुछ भी मिल जाए वो कितना थी थोड़ा हो और राहत भी अस्थाई ही हो उनके लिए जीवन जीने के एक और चरण को आगे बढ़ाने के समान ही होता है। वे अर्थव्यवस्था के बड़े सवालों को न तो समझ सकते हैं और जो मानते हैं कि हासिए पर रहना ही उनकी नियति है और इसी में जो कुछ मिल जाए, वहीं उनका हक है। वे नहीं जानते हैं कि उनके वोटों से बहुत कुछ बदल सकता है। वोट देना उनके लिए या तो किसी तात्कालिक एहसान का बदला चुकाना होता है या इलाके के नेता के साथ भावी रिश्ता बनाए रखने का जरिया। राजनीति के पुरोधा यह जानते हैं कि मतदान केन्द्रों के सामने सबसे बड़ी पंक्तियां उन्हीं लोगों की होती हैं जिनको वोट की तात्कालिक उपयोगिता तो मालूम है लेकिन वोट की दूरगामी ताकत का उनको अंदाजा नहीं है। उनकी चिंता का सरोकार आज तक ही होता है। वे आगे की चिंता ईश्वर पर छोड़ देते हैं। ऐसे में दो रुपये किलो चावल आजकल की चिंता को कम करता है। आगे इसी अनुदान को सरकार कहां से वसूल करेगी इनका अंदाजा उनको नहीं होता है। उनकी सोच यहां तक भी नहीं जाती है कि इन्हीं सरकारों ने गरीबों के लिए बनायी उचित दर की दुकानों की प्रणाली को बिगाड़कर अंत में बंद ही कर दिया है। अब गरीब आदमी को सस्ती चीनी नहीं मिलेगी। पकाने का तेल नहीं मिलेगा। चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी नहीं मिलेगी। नमक नहीं मिलेगा। मिट्टी का तेल नहीं मिलेगा। ये सारी वस्तुएं उनको बाजार भाव से महंगी मिलेंगी लेकिन कुछ समय तक उनको दो रुपये किलो का चावल मिलता रहेगा। इससे जो कुछ वे चावल की बचत से बचाएंगे उससे अधिक दूसरी तरफ से चुका देंगे।
मुआवजे में वोट की चाहत:
ध्यान देने की बात है कि ऐसी नीतियों का देश की व्यापक अर्थनीति से कोई लेना देना नहीं है। हमारी सरकारें झूठ बोलकर मतदाता को मूर्ख बनाने का प्रयास करती हैं। अगर हमारा देश कल्याणकारी व्यवस्था में विश्वास करता है या वह समाजवादी व्यवस्था को मानता है तो लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति कम से कम मूल्य पर करने का दायित्व सरकार का ही है। तब ऐसे में चावल ही क्यों खाने की सभी आवश्यक वस्तुओं पर सरकार को मूल्य तय करने होंगे। चिकित्सा सेवाओं को सुलभ करना होगा। सबके लिए अच्छी शिक्षा कम कीमत पर सुलभ करानी होगी, परिवहन को भी सस्ता करना होगा। लेकिन सरकार तो निजीकरण में विश्वास करती है और सार्वजनिक सेवाओं को धीरे-धीरे समाप्त करती जा रही है। तब ऐसे में दो रुपये किलो अनाज देने का कार्यक्रम इसमें कहां फिट बैठता है? सरकार गरीब से यह नहीं कह रही है कि सरकार ने अपनी नीति ही बदल दी है। आगे से गरीबों की आवश्यकताओं की पूर्ति सरकार ही करेगी। सरकार केवल ऐसा कह रही है जैसे पहले धनी लोग मंदिरो के बाहर दान देते थे सरकार ने भी उसी तरह से दान देने का फैसला लिया है। लेकिन धनी लोग तुरन्त ही गरीबों से मुआवजा नहीं मांगतंे है पर सरकार मांगती है। सत्ता चाहती है चुनाव में गरीब लोग इस बात का ध्यान रखे कि उनके लिए क्या किया है? कांगे्रस सरकार की अनुदान का प्रत्यक्ष नकद भुगतान करने की योजना भी दो रुपये चावल देने के ही समान है। नकद पैसा पाने का लोभ मतदाताओं को कितना प्रभावित करेगा अभी नहीं कहा जा सकता है। हालांकि सरकार अपनी योजनाओं की समीक्षा में गच्चा खाकर इससे लगातार पीछा छुड़ा रही है। लेकिन अभी इतना साफ है कि एक सी सारी योजनाओं की सरकारों को केवल अपने शासन के अंतिम सालों में याद आती है। ताकि अगर किसी कारण से चुनाव आयोग ने कार्यक्रम को लागू करने में कोई अड़चन डाली तो भी सरकार को ये कहने का मौका मिलेगा कि हमने जो वादा किया था, वह तो पूरा होगा ही चाहे चुनावों के बाद ही सही, बशर्ते हम दोबारा सत्ता में आ जाएं?
शासन की राह कैसे हो आसान:
इस समय भारतीय लोकतंत्र भारी दुविधा में है कि वह कैसे भारत के सुनहरे भविष्य की नई इबारत लिखे। सरकार का सिद्धांत ये है कि प्रशासन और लोकतंत्र दोनों एक दूसरे के पूरक बनें लेकिन भारत में पिछले 20 साल से अधिक समय से लोकतंत्र के कामकाज में प्रशासन की दुविधा सुशासन की राह में बाधा बन कर खड़ी है? दरअसल, बीते इन वर्षो में हमने पाया है कि देश में अधिकतर गठबंधन सरकार का दौर रहा है। देश में बीस से पचीस दलों की मिली जुली सरकार को हमने बनते-गिरते देखा है। अगर ईमानदारी से देखें तो छोटे दलों की मोनापाॅली में कोई हर्ज नहीं है लेकिन इन छोटे दलों के मिश्रण से सरकार कैसे चलाई जाए, अपनी जिम्मेदारी का पालन कैसे किया जाए। सुशासन कैसे स्थापित हो? इसका हल अब तक तलाश करना बाकी है, खासकर ख्ंाडित जनादेश और अस्थिर गठबंधन वाली, तब सारी ऊर्जा सरकार को बनाए रखने में ही खर्च हो जाती है। राजनीतिक प्रबन्धन, सियासी संकट और केन्द्रीय अस्तित्व को बनाए रखने मेें राजनीतिक तबका जुटा रहता है। इस परिस्थिति में प्रशासन, सुशासन और बेहतर राजकीय कामकाज के मसले गौण रह जाते है।  इस लिहाज से आज के लोकतंत्र का ये एक बिगड़ा स्वरूप है जिसके चलते यह बदनाम है। यही वजह है कि आज लोकतांत्रिक ढांचा अस्थिर नजर आता है। इसका श्रेय भी पूर्ववर्ती इन्दिरा गांधी को ही जाता है जिनने भारतीय लोकतंत्र को परिवार तंत्र में बदलने का कार्य किया था। इसीलिए, जब गठबंधन सरकार होती है तब अस्थिर सरकारें लोक-लुभावन फैसले, प्रबन्धकीय कौशल और अपने अस्तित्व की लड़ाई पूरे पांच साल तक लड़ती हंै। ऐसे में, देश का भविष्य उदीयमान नहीं दिखता है। मौजूदा परिदृष्य ये बताता है कि जनआंकाक्षाओं को शासन स्थापित नहीं कर पा रहा है। यही सबसे बड़ी नाकामी है। इस समय भारतीय लोकतंत्र की दो गहरी समस्याएं है। पहली गुटबंदी और दूसरी पाॅलिटिक्स एंड ब्लैक मनी। इन दोनों के स्पष्ट हल हैं परन्तु उसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है। इन दोनों कुरीतियों को रोकने के लिए क्या कदम हो सकते हैं, इन पर अमल अब आवश्यक हो गया है। इनसे जुड़े कानूनी प्रावधानों में अब भारी परिवर्तन समय की मांग है। जैसे, एक प्रावधान है कि दलों को 20 हजार रूपये तक के दान पर दानकर्ता का नाम और उसकी पहचान बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन कई दल इसका फायदा उठाकर कह देती हैं कि हमें तो कुल मिलाकर 19 हजार रूपये ही चंदे में मिले हंै। चुनाव आयोग की बार-बार पेशकश के बाद भी सरकार और दल इसके लिए तैयार नहीं हंै जिससे पता चलता है कि भारतीय राजनीति में ब्लैक मनी के क्या हालात हैं।
भ्रष्टाचार को सोशल वैल्यू बनाने की साजिश:
लोकतंत्र में इसीलिए आंदोलन की आवश्यकता निरन्तर रहती है क्योंकि सत्ता के इस रूप में ज्यादा छलने की गुंजाइश रहती है। लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की इस आंधी का आरम्भ भी स्वतंत्रता के बाद ही हो गया था जब जीप घोटाला कांड में नेहरू सरकार फंस गई थी लेकिन उसकी जांच का रहस्य कभी बाहर नहीं आ सका। बाद में इसको कांग्रेस की अधिनायकवादी महिला नेता और नेहरू जी की पुत्री इन्दिरा ने पूरी तरह से कांग्रेस को स्थिर करने के लिए प्रयोग किया। भ्रष्टाचार को इन्दिरा गांधी ने एक नया मुकाम दे दिया था। संविधान को तोड़-मरोड़ कर हर फैसले अपने लिए कराने में माहिर इन्दिरा गांघी ने देश के स्वरूप को ही कुचल कर रख दिया जिस पर उनके बाद की सरकारें चलती चली र्गइं। लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून का अब कोई अर्थ नहीं होता है। जब तक कि मजबूत संगठन नहीं हो। अगर ध्यान दें तो ये समझ में आता है कि लोकतंत्र में एक-एक कार्यकत्र्ता का कितना महत्व होता है। सामाजिक पूंजी के रक्षक के तौर पर एक कार्यकर्ता के सक्रिय होने से सत्ता को परेशानी होती है। सत्ता बराबर ये कोशिश करती है कार्यकर्ता के जन्मने की सम्भावना को ही समाप्त कर दिया जाए। इस काम को भी भारत में सबसे पहले इन्दिरा गांधी ने ही अंजाम दिया था जब उन्होंने कांग्रेस विभाजन के बाद कार्यकत्र्ता को चरणपादुका में बदलकर चापलूसी की भूमिका में खड़ा कर दिया जिसमें आर के धवन जैसे सैकड़ों उदाहरण भरे हैं। वास्तव में लोकतंत्र को बांझ बनाने का काम सत्ता करती है। आज के राजनीतिक दौर में जितनी तेजी के साथ सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जन्मने देने या पालने की सम्भावनाएं लगभग हर दल से समाप्त कर दी गई हैं। उसकी जगह व्यापक रूप से गुटीय राजनीति ने संभाल लिया है जो कि अधिकांश तौर पर परिवारवाद में बदल गया है। नेहरू से आरम्भ परिपाटी अब सारे दलों की बैशाखी बनकर रह गई है जिसमें केवल अपनों की जगह है। इससे भ्रष्टाचार को ही एक सामाजिक मूल्य के रूप में प्रतिस्थापित किया जा रहा है जिसमें कार्यकर्ता की जगह पर उनके अपने काम को अंजाम दे रहे हैं। अगर देश में सामाजिक मूल्यों को बचाना है तो सबसे पहले लोकतंत्र में वास्तविक कार्यकर्ताओं के बनने की सम्भावनाओं को संरक्षित करना पड़ेगा। अब तक भारत में सत्ता की संस्कृति का ही विस्तार किया गया है। सत्ता संस्कृति की ये कोशिश होती है कि वह अपने विरोधियों को दबाने का प्रयास करके सामाजिक पूंजी को अपने तक सीमित कर दें। हम जिस राजनीतिक व्यवस्था में हैं और उसके नियंत्रण में जिस तरह की तकनीक और विध्वंसक ताकत है वहां पर प्रतिस्पर्धा सामाजिक मूल्यों को बचाने की नहीं है बल्कि उसको नष्ट करने की है।
शक्ति वितरण हो रहा असंतुलित:
पिछले 45 सालों से भारत की समूची संवैघानिक प्रणाली को ही तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। उसको कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों के वितरण व उनके बीच नाजुक असंतुलन के पहलू से भी विकृत किया जा रहा है। हमारे संविधान की केन्द्रियता के पहलू से भी, जिसके तहत सर्वोच्च सम्प्रभु जनता में ही निहित है। हम भारत के लोग अपनी इस सम्प्रभुता का व्यवहार अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के जरिए करते हैं। ये चुने गए प्रतिनिधि स्वयं जनता के प्रति उत्तरदायी हैं और कार्यपालिका इनके प्रति उत्तरदायी है। जवाबदेही की इस कड़ी को अब बुरी तरह से चोट पहुंचायी जा रही है। 70 के दशक में इन्दिरा गांधी ने अपने हितों के लिए और स्वयं को सर्वोच्च बनाने के लिए जिस तरह से संविधान का प्रयोग किया था और उसमें संशोधन किए थे आज का दौर उसको उसी तरह से प्रयोग करने की आजादी को अधिकार सम्पन्न बनाता जा रहा है। जब संसद का कामकाज ठप हो जाता है तो वह कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में असमर्थ हो जाती है। इस प्रकार वह हमारे संविधान की बुनियाद पर ही चोट कर देती है। इससे ये बुनियादी प्रश्न उठता है कि किस तरह से सत्ता के जिन अंगों को संविधान को लागू कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है खुद ही उससे जुड़े लोग उसको नष्ट करने में लगे हैं। जब कार्यपालिका अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती है उस सूरत में न्यायपालिका पर सक्रियतावाद को दोष लगाना श्रेयस्कर नहीं है। क्योंकि संसद और उसके प्रतिनिधियों को पंगु हो जाना उस कड़ी को तोड़ देता है। जिसका हमारी संवैधानिक प्रणाली में केन्द्रीय महत्व है। ये बात गांठ बांधने की है कि न्यायालय का महत्व संसद से कतई कम नहीं है। संसद की व्याख्या का एकाधिकार उसी का है। जिस संविधान से संसद अपनी सत्ता को हासिल करती है उसके बुनियादी ढांचे को किसी संशोधन से परे सर्वोच्च न्यायालय एक फैसले में करार दे चुका है। दूसरे शब्दों मेें संविधान में संशोधन से परे सेंधमार तरीके से न्यायाधीशों की नियुक्ति के नये तरीके को लागू नहीं करने दिया जा सकता है। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की महिमा भी निराली है। उसकी तुलना मुख्य चुनाव आयुक्त या कैग से नहीं की जा सकती है। अगर हम इस देश के भविष्य के बारे में तमाम काले बादलों के मंडराने के बाद भी आशावादी हैं तो केवल न्यायपालिका को लेकर? जो कि नागरिक समाज की सुरक्षा को लेकर तमाम जोखिम उठा रहा है।
कानून की दो श्रेणियां:
भारत का दूसरा बड़ा संकट ये कि इस देश में नागरिकों की दो अलग-अलग श्रेणियां बन चुकी है। एक, जिनको कानूनी राज के अधीन अपना जीवन यापन करना होता है और दूसरा, वे जो स्वयं को कानून से ऊपर समझते हैं। याद करें, उस बहस को जो संसद में लोकपाल विधेयक और सीबीआई को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए की जा रही थी। अनेक सांसदों ने दहाड़कर कहा कि क्या अब ऐसा दिन आने वाला है कि हमसे एक मामूली दारोगा सवाल करने आएगा। हमको हिरासत में लेगा? एक ने तो ऐसी धमकी भी दी कि अगर उनको दारोगा ने छूने का प्रयास किया तो उसकी वर्दी उतरने में देर नहीं लगेगी। निर्वाचित जनप्रतिनिधि बाहुबली हो या धनपिशाच अथवा पेशेवर अपराधी, एक बार चुन लिए जाने के बाद सम्प्रभु, सर्वे-सर्वा कानून बनाने वाला और कानून के ऊपर हो जाता है। या कम से कम वे स्वयं को ऐसा मानने लगते है। ये सच है कि औपनिवेशिक काल से चली आ रही पुलिस प्रणाली को अब सुधारों की जरूरत है पर इसका तात्पर्य ये नहीं कि, उनको राजनीति क्षेत्र के लोग अपना जरखरीद गुलाम मान लें। जब हमारे जनप्रतिनिधियांे की स्वेच्छाचारिता, निरंकुश मानसिकता में अन्तर नहीं आता है तब तक भ्रष्टाचार पर भी काबू नहीं पाया जा सकता है। मौजूदा प्रणाली में भ्रष्टाचार की जडे़ं बहुत गहरी हंै। इसके उपचार के लिए कोई दूसरा चारा नहीं है। उसमें व्यापक संशोधन करने की दरकार है। चुनाव आयोग को और अधिक अधिकार सम्पन्न बनाने की आवश्यकता अब तक बाकी है। चुनाव कानून में इस तरह से संशोधन किया जा सकता है जिससे चुनावी भ्रष्टाचार में कमी आ जाए। हालांकि कोई ये दावा नहीं कर सकता है कि चुनावी भ्रष्टाचार सौ प्रतिशत समाप्त हो जाएगा। ये एक स्थाई भ्रष्टाचार है जो चुनावी भ्रष्टाचार का मूल है। जो लोग चुनाव में दलों को धन देते हैं जाहिर है उसके पीछे उनके निजी हक समाहित होते हैं। इस मामले में कुछ सुधार आगे आए हैं। जिसमें प्रमुख है कि अब दलों को अपने खर्च का पूरा विवरण आयोग को देना होता है। इससे ये पता चलने लगा है कि प्रतिनिधियों समेत दलों के पास कितना धन आ रहा है। हालांकि अभी इसमें बहुत सारी कमियां हैं तथापि यह पता चल जाता है कि राजनीतिक दलों को किन औद्योगिक घरानो से कितना धन मिलता रहा है।
लोकतंत्र की मूल भावना की सुरक्षा:
चुनाव प्रणाली सहित कई व्यवस्थाओं में दोष के बाद भी लोकतंत्र की मूल भावना पर कोई खतरा नहीं दिख रहा है। जनतंत्र की जो मूल भावना है। उसके बारे में संविधान में एक स्थायी व्यवस्था हो गई हैं। कई मामलों में संविधान को अब एक और दो हिस्सों में बांट दिया गया है। प्रथम हिस्सा है संविधान की आत्मा और दूसरा, जो सरकार के कामकाज के लिए अनुच्छेद बनाए गए हैं। संविधान की प्रस्तावना ही उसकी आत्मा है। इस पर 1973 से लेकर 2007 तक कम से कम पांच ऐसे मामले हुए हैं जिसमें देश के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि संसद संविघान के बेसिक फीचर को नहीं बदल सकती है। इस प्रकार लोकतंत्र भी हमारे संविधान का बेसिक फीचर है जिसको संसद और उसके प्रतिनिधि नहीं बदल सकते हैं। लोकतंत्र भी हमारी आत्मा है इसको न तो संसद बदल सकती है न ही कोई सरकार इसको बदलने में सक्षम है। जरूरत इस बात की है लोकतंत्र ठीक से चले यानि कि शासन प्रणाली ठीक से चले। उसके लिए योग्य लोग चुनकर आएं। वे कैसे आएं कम खर्च में कैस चुने जाएं और पैसे का प्रभाव न हो इसके लिए संविधान के तहत जो कुछ सम्भव है वह किया जाना चाहिए तथापि बिना नागरिक समाज की भूमिका के ये भी सम्भव नहीं है।
ताकतवर पीएम का इंतजार:
इस मामले में अब भारत को एक ताकतवर प्रधानमंत्री का इन्तजार है। वह कौन होगा कोई नहीं कह सकता है तथापि उस ओर गुजरात ने एक माॅडल प्रस्तुत किया है। वहां पर भ्रष्टाचार का विकराल स्वरूप नहीं है। गुजरात में चाहे साधारण आदमी हो या उद्योगपति, उसको नरेंन्द्र मोदी को रिश्वत नहीं देनी पड़ती है। रोजमर्रा के कार्यो में वहां पर भ्रष्टाचार पर कुछ अंकुश लगा है। जिसका श्रेय राज्य की सरकार को मिलता है। अगर कोई शक्तिशाली व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद पर आता है और वह ईमानदार है तो भ्रष्टाचार में भारी कमी आ सकती है। व्यवहार में भी और कानूनी स्तर पर भी।  तब सरकारी ढांचे में भी चुस्ती आने की सम्भावना प्रबल है। लेकिन इसके लिए देश की आम जनता को ही आगे बढ़कर पहल करना होगा। कुल मिलाकर सुधार ही एकमात्र उपचार है। अगर किसी माओवादी से उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि वह सुधार करेगा। कुछ पांच साल पूर्व यह कहावत बन गई थी चाहे कितना ही भ्रष्टाचार क्यों न कर लो लेकिन किसी राजनीतिक दल का नेता जेल नहीं जा सकता है। परन्तु जो थोड़े बहुत सुधार हुए हैं उनसे ये बात गलत साबित हो गई है। तमिलनाडु में जयललिता और कर्नाटक में येदुरप्पा और फिर चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव को जेल जाना पड़ा। हरियाणा में तो रिवाज ही है कि वहां पर छोटे से बड़े सारे पद बिकते हैं। लेकिन सुबूत आने पर पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चैटाला को जेल जाना पड़ा। अब ब़ड़े नेता और मंत्री भी जेल जा रहे हैं ये सारे सुधारों के कारण ही सम्भव हो सका है। अगर इसी तरह से जनमत बनता रहा तो भविष्य में गड़बड़ करने वाला प्रधानमंत्री भी जेल जा सकता है। बहरहाल, लोकतंत्र में कानून ऐसा हो और उसको लागू करने की व्यवस्था हो तो हर दोषी को सजा दिलायी जा सकती है। ये मूल बात है और भारत इसी ओर ही बढ़ रहा है। अब सरकार से अधिक देश के भविष्य को लेकर सभी चिंतित है। कारण साफ हैं कि भारत में जांच के तंत्र को ही दीमक लग चुका है ऐसे में जब कानून वास्तव में बिना किसी भेदभाव के और बिना किसी रूकावट के काम करने लगेगा तब हम भारत के लोगों का सपना साकार हो सकेगा?