उत्तराखण्ड में आई प्राकृतिक आपदा ने सभी को झकझोर दिया है। ऐसे में कई सवाल बनते हैं; क्या पहाड़ में आपदा ऐसे ही आती रहेगी? क्या इसे रोका नहीं जा सकता था? कहां चूक हो रही है? अति संवेदनशील हिमालय क्षेत्र में आपदा की स्थिति में तत्काल बचाव और राहत कार्य प्रभावी ढ़ंग से चलाने के लिए कौन-कौन से उपाय किए जाएँ? क्या पांच हिमालयी राज्यों के लिए एक समग्र व समन्वित राष्ट्रीय नीति नहीं बनाई जानी चाहिए, जिसके तहत ही पहाड़ों की पारिस्थितिकी सन्तुलन बनाते हुए जरूरी और नियोजित विकास के साथ राज्य के नागरिकों को खुशहाल किया जा सके? और इस राष्ट्रीय नीति की कमान सीधे केन्द्र के अधिकार में न दे दी जाय ताकि पर्यावरण और पारिस्थितिकी के अहं सवालों पर राज्यों की मनमानी न चल सके, उसकी नीतियों में समरूपता और समान सरोकार हो? अति संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में जवाबदेह व त्वरित आपदा प्रबन्धन के लिए कैसे उपाय होने चाहिए?
जाहिर है कि यह सवाल अति संवेदनशीलता की अपेक्षा करते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों के संरक्षण और वहां के निवासियों से जुड़े मसलों पर राजनीति से ऊपर उठ कर फैसला लेना होगा। जरूरत ठोस नीति बनाने की है अन्यथा हमें आये दिन इसी तरह की प्राकृतिक आपदाओं से दो-चार होना पड़ेगा। हिमालय क्षेत्र सबसे युवा और नाजुक है। सरकारी आँकड़ों पर यकीन करें तो यहां के पहाड़ में कटाव और मिट्टी के बहाव का प्रतिशत 10 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष है, जबकि चार मीट्रिक टन तक कटान को ही खतरनाक माना जाता है। विकास के नाम पर जंगल काटे जा रहे हैं, बहुमंजिली इमारते और होटल बन रहे हैं। नदियों से रेत और बजरी तेजी से निकाली जा रही है, जिससे पहाड़ और नंगे व कमजोर हो रहे हैं। हमें याद है कि जंगल माफियाओं के खिलाफ समाजसेवी सुन्दरलाल बहुगुणा ने ‘चिपको आन्दोलन’ चलाया था। इसके पीछे पहाड़ को बचाने और पर्यावरण सन्तुलन की सोच थी। किन्तु उŸाराखण्ड बनने के बाद पिछले 12 वर्षों में जिस तरह पहाड़ों का दोहन हुआ, ताजा आपदा उसी का खामियाजा है।
एक सरकारी रिर्पोट के अनुसार पहाड़ के लगभग 233 गांव मौत के मुहाने पर खड़े हैं। इतना ही नहीं, गंगोत्री से लेकरउत्तरकाशी के करीब 150 किमी क्षेत्र को इको सेंसेसिटिव जोन करने का फैसला हुआ था। इस दिशा में उत्तराखण्ड सरकार ने अपने आर्थिक अधिकार प्रभावित होने के ड़र से इस पर अमल नहीं होने दिया। नतीजा यह है कि अनियोजित विकास और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से ग्लैशियर टूट रहे हैं। विशेषज्ञों का मत है कि केदारनाथ धाम का धौराबाड़ी ग्लैशियर भी जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर हो गया था और बादल फटने से केदारनाथ क्षेत्र पूरी तरह तहस-नहस हो गया। अलकनन्दा नदी के रौद्र रूप धारण करने के कारण ही रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, गोपेश्वर आदि में जानमाल का भारी नुकसान हुआ है। इसी तरह भीलांगना और भगीरथी नदियों में भी बाढ़ आयी थी किन्तु टिहरी डैम के कारण फिलहाल बड़ी त्रासदी होने से बच गई। अब सवाल उठने लगा है कि यदि टिहारी की तरह ही अलकनन्दा में भी बांध बंधे होते तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी न होती। फिलहाल यह तर्क पहाड़ की नदियों पर बांध निर्माण समर्थकों का है, परन्तु बड़ा वर्ग पर्यावरण की दुहाई देकर इसके खिलाफ है। किसी बड़ी त्रासदी के बाद इस तरह के किन्तु-परन्तु होते हैं। हमारी कोशिश उन अनछुए सवाल उठाने की है, जिनसे पहाड़ की विनाशलीला पर अंकुश लग सके।
पहाड़ों के अन्धाधुन्ध दोहन को रोकने, विकास की सुसंगठित नीति बनाने और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए जो रणनीति प्रबन्ध होने चाहिए थे, वह हुए ही नहीं। यदि नदियों के किनारे निर्माण प्रतिबन्धित होता तो इस प्राकृतिक आपदा के बावजूद जन-धन की इतनी हानि नहीं होती।
यह सच है कि पहाड़ी राज्यों का पर्यटन सबसे बड़ा उद्योग है, पर इस विनाश को देखते हुए परिस्थितियों की मांग है कि चारधाम के श्रद्धालुओं की संख्या सीमित करने के उपाय करने होगे और दूसरे यात्रा मार्गों पर यात्रियों की सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर सहायता देने के लिए जगह-जगह चैकियाँ बनानी चाहिए। इस कार्य में आईटीबीपी के जवानों और स्थानीय लोगों की सेवायें ली जा सकती हैं ताकि किसी आपदा में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सके।
जलवायु परिवर्तन से होने वाली समस्याओं का समाधान राष्ट्रीय कार्यक्रम का अहं हिस्सा है। अतः केन्द्र सरकार को हिमालयी राज्यों के लिए केन्द्रीयकृत नीति बनानी चाहिए। साथ ही पहाड़ों के दोहन को रोकने के लिए ग्रीन बोनस तथा अति संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों को इको-सेन्सटिव जोन घोषित करना चाहिए।उत्तराखण्ड में बड़े पैमाने पर पेड़ों के कटान, खुदाई और अनियोजित निर्माण के कारण ऐसी विकट स्थिति उत्पन्न हुई है। लिहाजा, पहाड़ की संतुलित पारिस्थितिकी के अनुकूल पेड़-पौधे लगाये जाने चाहिए, क्योंकि अभी वहां चीड़ के जंगल हैं। पर्यावरणविद् मानते हैं कि मैदानी क्षेत्रों से चलने वाली गर्म हवाओं को रोकने की क्षमता चीड़ के पत्तों में नहीं है।





