Saturday, March 8, 2014

बड़ा बनने के लिए "देना सीखो" - - डेविड जे॰ श्वार्टज

जब मैं छोटा था तो मेरे पिता जी पास के कस्बे में मक्के के भुट्टे बेचते थे। जब मैने गिनती सीख ली, तो पिता जी ने मुझे मक्के के एक दर्जन भुट्््टों की ढ़ेरियाँ बनाने की जिम्मेदारी सौंपी। इसमें मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ। मैं पाँच साल का था, मगर मुझे लगा जैसे मैं भी पिता जी के काम में योगदान दे रहा हूंँ। इसीलिए मैने पिता जी के आदेश का पालन करते हुए भुट्टों की ढ़ेरियाँ बना दीं। हर ढ़ेरी में पूरे बारह भुट्टे थे। जब पिता जी ने मेरी बनाई गई कुछ ढ़ेरियों के नमूने देखे, तो वे बोरी के पास गये और उन्होने उसमें से कुछ और भुट्टे निकाले तथा हर ढेरी में एक भुट्टा बढ़ा दिया। इस पर मैं नाराज हुआ और मैने उनसे कहा-‘मुझे गिनना आता है। एक दर्जन का मतलब बारह होता है। अब हर ढ़ेरी में तेरह भुट्टे हो गये हैं।’
मैं पिता जी के इस काम से चिढ़ गया था। पिता जी ने मुस्कराते हुए मुझे प्यार से समझाया- ‘जब हम भुट्टे बेचते हैं, तब एक दर्जन में तेरह भुट्टे ही होते हैं। हम हमेशा अच्छे मक्के बेचते हैं, मगर जब भुट्टे पर छिलका लिपटा हो तो हमारा कोई भुट्टा खराब भी निकल सकता है। इसलिए हम अपने ग्राहकों को एक अतिरिक्त भुट्टा देते हैं। इसके अलावा हम चाहते हैं कि जो भी हमारे भुट्टे खरीदे, वह अपने पड़ोसियों को बताये कि हमारे भुट्टे कितने अच्छे हैं। इस प्रकार हमारा मक्का अधिक बिकेगा और हम अधिक धन कमा पायेंगे।’
वस्तुतः सफलता, दौलत और सुख मिलते हैं उदारता से। आप जितना ज्यादा देते हैं आपको उतना ही अधिक मिलता है। सफल लोग उदार होते हैं। लोग उनसे जितनी उम्मीद करते हैं, वे उससे अधिक देते हैं। देने पर ध्यान केन्द्रित करें, जल्दी ही आपको अपने आप मिलने लगेगा।