ऽ उत्तराखण्ड़ बनने के बाद अब तक यहां पर्यटन में 141 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
ऽ सेंन्टर फार साइन्स एन्ड़ एनवायरमेन्ट की निदेशक सुनीता नारायण के अनुसार ‘उत्तराखण्ड में करीब 558 हाइड्रोइलेक्ट्रिकल पावर परियोजनायें पाइपलाइन में हैं, जो भगीरथी को करीब 80 प्रतिशत और अलकनन्दा को 65 प्रतिशत तक प्रभावित करेंगी।
ऽ इन्टरनेशनल संन्टर फार इन्ट्रीग्रेटेड माउन्टेन डेवलपमेन्ट की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 100 सालों में जहां एक ओर वैश्विक तापमान में 0.74 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है, वही तिब्बती पठार का तापमान करीब 5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की उम्मीद है।
ऽ 2001 से 2012 के बीच यहां कारों के रजिस्ट्रेशन में 700 प्रतिशत की बढ़ोŸारी दर्ज की गई है।
ऽ उत्तराखण्ड में 1951-2004 के मध्य हर दशक में वर्षा में 14.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।
ऽ रूद्रप्रयाग जिले में पिछले 34 सालों में 8 बार मानसूनी आपदाये आ चुकी हैं।
ऽ 1953 से 1980 के मध्य आयी बाढ़ से 764.48 मिलियन लोग प्रभावित हुए हैं।
ऽ दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रमुख महाराज पंडित के अनुसार, ‘लकड़ी और पŸाथरों के घरों को तोड़ कर यहां कंकरीट व सीमेन्ट के बना दिये गये हैं, जिससे रात के समय अधिक गर्मी होने लगी और धीरे-धीरे यह इलाका गर्म होने लगा।’
ऽ चिपको आन्दोलन से जुड़े चण्डी प्रसाद भट्ट ने आज से लगभग 15 साल पहले लिखा था, ‘हिमालय में नदियांे के तटों के साथ छेड़छाड़ करने से पहले यह आवश्यक है कि पहले नदियों का इतिहास जान लिया जाये, जिससे बनने बाले रिजार्टस पर्यटकों के लिए मौत की सौगात न ले आयें।’
ऽ प्रसिद्ध पर्यावरणविद वन्दनाशिवा का कहना है, ’पहाड़ों के बीच में सड़क और बांध बनाने के कारण यहाँं काफी भू-स्खलन होने लगे हें।’
ऽ गढ़वाल की प्रसिद्ध पर्यावरणविद मीर बहन ने 5 जून 1950 को एक लेख में लिखा था, ‘‘साल-दरसाल उŸार भारत में आने वाली बाढ़ का रूप विकराल व विध्वन्सक होता जा रहा है। इसका मतलब यह कि उŸाराखण्ड़ में हालात कुछ गड़बड़ हैं और यह ‘कुछ’ यहां के जंगलों से जुड़े है। हिमालय की दक्षिणी ढ़लान के क्षेत्र में बढ़ते वृक्षांें की नस्ल में आई तब्दीली का मुझे ज्ञान है। यह घातक परिवर्तन स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल वृक्ष ‘बांँज’ के स्थान पर ‘चीड़’ के पेड़ों के रूप में सामने आया है।
बांँज के पेड़ों के कारण नीचे झाडि़यां, लताओं और घास का एक प्रचुर सांचा अस्तित्व में आता है, जिसके कारण ऐसा वन तैयार होता है, जिसमें करीब सारा वर्षा जल समा जाता है, शेष बचा पानी वाष्पित होकर उड़ जाता है, कुछ पहाड की ढ़लान पर लुढ़क जाता है। जिससे पहाड़ का कटान रूकता है और जल संचयन होता है, जिससे पूरे वर्ष झरने व नाले बहते रहते हैं। बांज की पत्तियां मैदान से आने बाली गर्म हवाओं व कार्बनडायआक्सायड का अवशोषण करती हैं, जिससे पहाड़ के ऊपरी हिस्से में स्थित ग्लेशियर सुरक्षित बने रहते हैं, जो पूरे वर्ष नदियों का अक्षय जल स्रोत हैं।
इसके विपरीत, ‘चीड़’ के पेड़ बिलकुल विपरीत प्रभाव ड़ालते हैं। इसके पेड़ के नीचे कोई वनस्पति नहीं उगती जिसके कारण जमीन नंगी होकर पानी शोखने व रोकने की शक्ति खो देती है जिससे वर्षात का पानी वहकर नदियों में चला जाता है और पहाड़़ मरूभूमि का रूप लेने लगता है। इसकी पत्तियों में गर्म हवाओं को सोखने की क्षमता भी कम है, जिसके कारण मैदानी गर्म हवायें ग्लैशियर को प्रभावित करती हैं, जिससे हिमालय का पूरा पारिस्थितिकी तन्त्र प्रभावित होता है, जिससे सम्पूर्ण उत्तर भारत प्रभावित होगा।’’
ऽ हिन्दुस्तान टाइम्स में 1977 में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया था, ‘समय तेजी से भाग रहा है। हिमालय के पास ही नहीं, बल्कि देश के पास भी जागने का वक्त कम बचा है।’
ऽ सेंन्टर फार साइन्स एन्ड़ एनवायरमेन्ट की निदेशक सुनीता नारायण के अनुसार ‘उत्तराखण्ड में करीब 558 हाइड्रोइलेक्ट्रिकल पावर परियोजनायें पाइपलाइन में हैं, जो भगीरथी को करीब 80 प्रतिशत और अलकनन्दा को 65 प्रतिशत तक प्रभावित करेंगी।
ऽ इन्टरनेशनल संन्टर फार इन्ट्रीग्रेटेड माउन्टेन डेवलपमेन्ट की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 100 सालों में जहां एक ओर वैश्विक तापमान में 0.74 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है, वही तिब्बती पठार का तापमान करीब 5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की उम्मीद है।
ऽ 2001 से 2012 के बीच यहां कारों के रजिस्ट्रेशन में 700 प्रतिशत की बढ़ोŸारी दर्ज की गई है।
ऽ उत्तराखण्ड में 1951-2004 के मध्य हर दशक में वर्षा में 14.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।
ऽ रूद्रप्रयाग जिले में पिछले 34 सालों में 8 बार मानसूनी आपदाये आ चुकी हैं।
ऽ 1953 से 1980 के मध्य आयी बाढ़ से 764.48 मिलियन लोग प्रभावित हुए हैं।
ऽ दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रमुख महाराज पंडित के अनुसार, ‘लकड़ी और पŸाथरों के घरों को तोड़ कर यहां कंकरीट व सीमेन्ट के बना दिये गये हैं, जिससे रात के समय अधिक गर्मी होने लगी और धीरे-धीरे यह इलाका गर्म होने लगा।’
ऽ चिपको आन्दोलन से जुड़े चण्डी प्रसाद भट्ट ने आज से लगभग 15 साल पहले लिखा था, ‘हिमालय में नदियांे के तटों के साथ छेड़छाड़ करने से पहले यह आवश्यक है कि पहले नदियों का इतिहास जान लिया जाये, जिससे बनने बाले रिजार्टस पर्यटकों के लिए मौत की सौगात न ले आयें।’
ऽ प्रसिद्ध पर्यावरणविद वन्दनाशिवा का कहना है, ’पहाड़ों के बीच में सड़क और बांध बनाने के कारण यहाँं काफी भू-स्खलन होने लगे हें।’
ऽ गढ़वाल की प्रसिद्ध पर्यावरणविद मीर बहन ने 5 जून 1950 को एक लेख में लिखा था, ‘‘साल-दरसाल उŸार भारत में आने वाली बाढ़ का रूप विकराल व विध्वन्सक होता जा रहा है। इसका मतलब यह कि उŸाराखण्ड़ में हालात कुछ गड़बड़ हैं और यह ‘कुछ’ यहां के जंगलों से जुड़े है। हिमालय की दक्षिणी ढ़लान के क्षेत्र में बढ़ते वृक्षांें की नस्ल में आई तब्दीली का मुझे ज्ञान है। यह घातक परिवर्तन स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल वृक्ष ‘बांँज’ के स्थान पर ‘चीड़’ के पेड़ों के रूप में सामने आया है।
बांँज के पेड़ों के कारण नीचे झाडि़यां, लताओं और घास का एक प्रचुर सांचा अस्तित्व में आता है, जिसके कारण ऐसा वन तैयार होता है, जिसमें करीब सारा वर्षा जल समा जाता है, शेष बचा पानी वाष्पित होकर उड़ जाता है, कुछ पहाड की ढ़लान पर लुढ़क जाता है। जिससे पहाड़ का कटान रूकता है और जल संचयन होता है, जिससे पूरे वर्ष झरने व नाले बहते रहते हैं। बांज की पत्तियां मैदान से आने बाली गर्म हवाओं व कार्बनडायआक्सायड का अवशोषण करती हैं, जिससे पहाड़ के ऊपरी हिस्से में स्थित ग्लेशियर सुरक्षित बने रहते हैं, जो पूरे वर्ष नदियों का अक्षय जल स्रोत हैं।
इसके विपरीत, ‘चीड़’ के पेड़ बिलकुल विपरीत प्रभाव ड़ालते हैं। इसके पेड़ के नीचे कोई वनस्पति नहीं उगती जिसके कारण जमीन नंगी होकर पानी शोखने व रोकने की शक्ति खो देती है जिससे वर्षात का पानी वहकर नदियों में चला जाता है और पहाड़़ मरूभूमि का रूप लेने लगता है। इसकी पत्तियों में गर्म हवाओं को सोखने की क्षमता भी कम है, जिसके कारण मैदानी गर्म हवायें ग्लैशियर को प्रभावित करती हैं, जिससे हिमालय का पूरा पारिस्थितिकी तन्त्र प्रभावित होता है, जिससे सम्पूर्ण उत्तर भारत प्रभावित होगा।’’
ऽ हिन्दुस्तान टाइम्स में 1977 में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया था, ‘समय तेजी से भाग रहा है। हिमालय के पास ही नहीं, बल्कि देश के पास भी जागने का वक्त कम बचा है।’





