Tuesday, March 4, 2014

सम्पादक की कलम से - रामसरन


लोकतन्त्र का आशय जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन से है। भारत जनसंख्या की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है तथा उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका मानव संसाधन है। 1947 में स्वतंत्रा प्राप्ति के बाद 1950 में अपने संविधान को स्वीकार किया तथा पिछले दिनों हमने 65 वां गणतंत्र दिवस मनाया है। किसी भी देश के लिए अपना संविधान, और लोकतान्त्रिक देश होना गौरव की बात होती है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कितनी खामियाँ क्यों न हों, परन्तु फिर भी यह शासन की सर्वश्रेष्ठ प्रणाली है।  ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा देने वाले देश के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री एक साधारण किसान परिवार से आए थे, रामेश्वरम के एक छोटे से गाँव में पैदा हुए मिसाईल मैन कहे जाने वाले डा॰ ए॰पी॰जे॰ अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति बने। अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग, सूचना आयोग तथा कैग ने लोकतन्त्र की गरिमा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। तथापि एक जनमत के अनुसार 86 प्रतिशत लोगों का मानना है कि विगत छह दशकों के अनवरत प्रयासों के बाद भी हम एक पूर्ण गणतंत्र नहीं बन सके हैं। गणतंत्र में गण सर्वोच्च और तन्त्र का स्थान बाद में आना चाहिए लेकिन वर्तमान स्थिति इसके विपरीत है। आज जहाँ नेताओं के पास अधिकार और सुविधाएं तो असीमित हैं परन्तु जवाबदेही शून्य है।
आज देश में क्षेत्रीय असामानता, निर्धनता, अशिक्षा, आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक वैमनस्य, अपरिपक्व लोकतान्त्रिक संस्थाएं, भाषागत, जात-पाँत, भ्रष्टाचार आदि समस्याओं का बोल बाला है। इसी अवधि में गरीबी और अमीरी दोनो बढ़ी हंै तथा इन दोनों के बीच का अन्तर भी बढ़ा है। जिस साम्प्रदायिकता को कम होना था वह भी बढ़ी है। देश की सीमाएं असुरक्षित हैं, पड़ोसी देश शत्रुता पर उतारू हैं। यह देश का दुर्भाग्य है कि जिन्हें जनता को सुविधाएं देने के लिए चुना जाता है उन्हें अपनी सुविधाओं की चिन्ता ज्यादा रहती है। लाल बत्ती आज ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है। प्रश्न यह है कि क्या वी॰आई॰पी॰ सुविधाओं के बगैर जनप्रतिनिधि अपना कार्य बेहतर ढ़ग से नहीं कर सकते हैं? क्या इन सुविधाओं के साथ वे अपना काम सही ढ़ंग से कर रहे हैं?
देश की आजादी के आंदोलन के समय सादगी और कर्तव्य निष्ठा का महत्व था। जन प्रतिनिधि एवं महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग सादगी की प्रतिमूर्ति एवं अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक थे। समय के साथ इन सद्गुणों का पराभव हुआ। संसद व विधान सभाओं में जन प्रतिनिधियों का अमर्यादित आचरण आज आम बात हो गई है।
आम चुनाव से पहले लोक सभा के आखिरी सत्र में तेलंगाना को देश का उन्नीसवा राज्य बनाने का बिल पारित हो गया। इस विधेयक के पेश करने के समय गृहमंत्री से विधेयक की प्रति छीनने की कोशिश के साथ ही सांसदों ने अपने अमार्यादित व्यवहार से शर्मसार कर दिया। मीरा कुमार ने इसे लोकतन्त्र के माथे पर कलंक बताया है, शरद पवार के अनुसार यह राष्ट्र द्रोह है, किसी ने राष्ट्रीय शर्म तो किसी ने निन्दनीय और लज्जाजनक बताया। जिस दिन विधेयक पारित हुआ उस दिन लोकसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण रोक दिया गया, सदन के दरवाजे बन्द कर दिए गए, विधेयक पर कोई चर्चा नही हुई, ध्वनि मत से विधेयक पारित करा दिया गया। इसने प्रजातन्त्र को कलंकित किया है।
देश के वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने गणतंत्र की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में कहा कि, ‘लोकतन्त्र में खुद में सुधार करने की विलक्षण योग्यता है जो खुद के घावों को भर सकता है। विगत कुछ वर्षों में खण्डित व विवादास्पद राजनीति के बाद वर्ष 2014 घावों को भरने का वर्ष होना चाहिए। हमें राष्ट्रीय उद्देश्य और देश भक्ति के उस जोश को फिर जगाने की आवश्यकता है जो देश को अवनति से उठाकर वापस समृद्धि के मार्ग पर ले जाय।’ उन्होंने राजनैतिक दलों को भी नसीहत दी कि ‘वे वही वादा करें जिन्हें पूरा करना सम्भव हो’।
आज राष्ट्र के समक्ष लोकतन्त्र का सबसे महत्वपूर्ण पर्व ‘लोकसभा 2014 का चुनाव’ और भारत के भाग्य विधाता मतदाता के पास एक सुअवसर है, कि- वह अपने मतदान द्वारा एक ऐसी सरकार को चुनें जिससे राष्ट्रीय एकात्मता एवं अखण्डता, सामाजिक सदभावना एवं समरसता, स्वाभिमान व स्वदेशी दिशा-दृष्टि के साथ राष्ट्र का समग्र विकास तथा प्रजातान्त्रिक मूल्यों सहित नईपीढ़ी के स्वर्णिम भविष्य का सरक्षण, संवर्धन सुनिश्चित हो और भ्रष्टाचार मुक्त, स्वालम्बी, सशक्त एवं समृद्ध भारत का उदय हो।                                           - रामशरण