Monday, March 3, 2014

भारतीय लोकतन्त्र और युवा आकांक्षाएं = संकलित

बीते वर्षों में भारतीय लोकतंत्र ने अपनी सशक्त भूमिका दर्ज की है। इसका पूरा श्रेय भारत केे उन युवाओं को जाता है जिनकी सोच में देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर क्रान्तिकारी बदलाव आया है। इन साठ वर्षों में भारतीय युवाओं के खास अंदाज ने विश्व के दिग्गजों का ध्यान आकर्षित किया है। पिछले 10-15 सालों में भारत के युवाओं में सकारात्मक परिवर्तन की सुखद बयार आई है। उनमें निर्णय लेने की क्षमता का विकास हुआ है। कैरियर हो या जीवनसाथी का चुनाव, पहनावा हो या भाषा, जीवन-शैली हो या अपनी बात को रखने का अंदाज। एक बेहद आकर्षक आत्मविश्वास के साथ भारतीय युवा चमका है। आश्चर्यजनक रूप से उसके व्यक्तित्व का निखार आया है। उसे जिद्दी कहना जल्दबाजी होगी। यह जुनून और जोश की दमदार अभिव्यक्ति है। उसे अगर सही दिशा में सही अवसर मिले, या इसे यूँ कहें कि उसे स्वयं को अभिव्यक्त करने का स्पेस दिया जाए, उस पर विश्वास करने का जोखिम उठाया जाए तो कोई वजह नहीं बनती कि उसमें शिथिलता के लक्षण भी आ जाएँ। यह भारतीय युवा के कुशल मस्तिष्क की ही तारीफ है कि वैश्विक स्तर पर उस पर विश्वास किया जा रहा है। बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियाँ उसे सौपी जा रही हैं।
भारतीय युवा और राजनीति
यह इस देश की राजनीति के लिए निसंदेह शुभ और सुखद लक्षण है कि बुजुर्गों की भीड़ में अब युवा चेहरे चमक रहे हैं। चाहे राहुल गाँधी हों या सचिन पायलट, मिस संगमा हों या प्रियंका गाँधी अथवा ज्योतिर्दित्य सिंधिया हो संसद में बैठे ये सिर्फ मोम के पुतले नहीं हैं बल्कि समय-समय पर जनता की आवाज बनने में भी ये गुरेज नहीं करते। इनकी उम्र कम लेकिन हौसले बुलंद हैं। देश की जनता बुजुर्ग नेताओं के कोरे भाषण सुन-सुन कर थक चुकी थी और कहना होगा कि यह बदलाव उन्हें सुहाना लग रहा है।
भारतीय युवा: आक्रोश  और इच्छाएँ
यहाँ भारत के युवाओं को संयम की डोर थामने की आवश्यकता है। लेकिन पूर्णतः युवाओं पर दोष मढ़ना भी ठीक नहीं है। पल-पल की अव्यवस्था और भ्रष्टाचार को देखते हुए उसका खून खौल उठता है। सही जगह पर आक्रोश व्यक्त नहीं हो पाता है, फलस्वरूप यह कहीं और किसी और रूप में निकलता है। जिसका शिकार कोई निर्दोष होता है। वर्तमान फिल्मों और टीवी के बेतुके कार्यक्रमों ने उसे दिग्भ्रमित किया है।
इनके सारे मीडिया का लक्ष्य युवा है। चाहे कास्मेटिक्स हो या बाइक्स, मोबाईल के नित नए माडल हो या महँगी जीन्स ये सब फैशन कम और जरूरत अधिक बन गए हैं। यहाँ तक कि विज्ञापनों में पुरानी जरूरत को भी नए रंग-रूप में ढाल कर इस तरह पेश किया जा रहा है मानों इसे बताए गए रूप में पूरा नहीं किया गया तो उसका जीवन बेकार है। अफसोस कि युवा इस षडयंत्र में उलझते दिखाई दे रहे हैं।
भारतीय युवा: आजादी के मायनों में उलझा
आज का भारतीय युवा दो वर्गों में बँटा दिखाई देता है। एक तरफ कुछ कर गुजरने का असीम जोश उसमें निहित है दूसरी तरफ वह स्वतंत्रता के नए और कुत्सित अर्थ को ही असली आजादी मान बैठा है। स्वछन्दता और उच्छंखलता किसी भी रूप में आजादी की शुभ परिभाषा नहीं है। असली आजादी गरिमा, और मर्यादा की परिधि में रह कर वैचारिक परिर्वतन में लाने की कोशिश को कहा जाना चाहिए। न कि सिर्फ डिस्को  में अपना समय गुजारने और सेक्स तथा हिंसा को अपनी जिन्दगी का लक्ष्य बना कर चलने को। यह किसी भी काज में आजादी के मायने नहीं हो सकते।
ग्रामीण युवा ने बनाई अपनी पहचान
यह भी एक ठंडक देने वाला तथ्य सामने आया है कि गाँव का भोला-भाला गबरू जवान सूचना और संचार प्रौ़द्योगिकी पर सहज पकड़ हासिल कर रहा है। अब अपनी विलक्षण प्रतिभा के दम पर उसनें बरसों की हीन भावना और संकोच पर विजय हासिल कर ली है। प्रतियोगी परीक्षा से लेकर चिकित्सक, इंजीनियर और टेक्नोलाजी हर विधा में अपनी क्षमता का परचम लहराया है। आज शहर के युवा जहाँ उच्च उपभोक्तावादी ताकतों के शिकार हो रहे हैं वहीं अधिकांश ग्रामीण युवाओं ने अपने लक्ष्य पर निगाह हटाने की गलती नहीं की है।
साहित्य और युवा
पिछले दस सालों में भारतीय लेखनी ने उपलब्धियों के खासे परचम लहराएँ हैं। पत्रकार नलिन मेहता की किताब ‘इण्डिया आन टेलीविजन’ को एशियन मीडिया पर सर्वश्रेष्ठ किताब और सर्वश्रेष्ठ लेखक का पुरस्कार मिला है। यूनेस्को के सांस्कृतिक संकाय एवं रूसी इंटरनेशनल एसोसिएशन आफ नेचर क्रिएटीविटी ने विश्व धरोहरों एवं रचनात्मक कला पर आधारित चित्रों का एलबम जारी किया जिसमें दिल्ली की चार छात्राओं के बनाए चित्रों को शामिल किया गया। मराठी के मशहूर कवि मंगेश पडगाँवकर ने अपनी तीन किताबें ब्रिटेन के स्ट्रैटफोर्ड शहर में स्थित शेक्सपीयर मेमोरियल को दी हैं जिन्हें मेमोरियल के जनसंग्रह वाले हिस्से में रखा गया है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद पडगाँवकर दूसरे भारतीय कवि हैं जिनकी किताबें इस मेमोरियल में रखी गई हैं। वहीं पिछले साल के बुकर पुरस्कार विजेता अरविन्द अडिगा के विजेता उपन्यास ‘इ व्हाइट टाइगर’ के प्रचार अभियान को 2009 का एशियन मल्टीमीडिया पब्लिशिंग पुरस्कार मिला।
खेल और भारतीय युवा
खेल जगत में भारतीय युवाओं की प्रतिभा को विश्व स्तर पर सराहा गया है। जहाँ सानिया मिर्जा और साइना नेहवाल युवतियों के लिए आदर्श बनीं बहीं राज्यवर्धन राठौर, अभिनव बिन्द्रा, विजेन्द्र सिंह, सुशील कुमार ने ओलम्पिक में वह कमाल कर दिखाया जिसकी भारतीय जनता को लम्बे समय से तमन्ना थी। विश्वनाथन आनन्द और पंकज आडवाणी ने शतरंज के सिद्धहस्त खिलाडि़यों के रूप में पहचान बनाई। कुश्ती में मल्लेश्वरी का नाम चमका तो पर्वतारोहण में आरती का कहना होगा कि भारती युवा प्रतिभा ने जिस तेजी से अपनी दक्षता सिद्ध की उसका सही मूल्यांकन किए जाने की आवश्यकता है। भारतीय गणतंत्र 64वें साल में प्रवेश कर चुका है। इस मुकाम पर हम उम्मीद करें कि भारतीय युवाओं की रचनात्मक शक्ति को सही परिपेक्ष्य में पहचाना जाएगा उसकी सोच के समंदर अधिक सकारात्मक आलोडित होंगे। तब ही युवा भारत के युवा सपनों की चमकीली पतंग को नई उड़ान मिल सकेगी।