संसदीय चुनाव मई में होने हैं। उससे पहले पाँच राज्य विधानसभाओं के चुनाव का सेमीफाइनल हो चुका है। आगामी चुनावों में सोशल मीडिया का प्रयोग कैसे और किस रुप में किया जाय, इसको लेकर राजनीतिज्ञों के बीच एक बड़ी बहस छिड़ गयी है। सोेशल मीडिया व इंटरनेट से जुड़ी दो रिपोर्टस ने इस बहस को और तेज कर दिया है। पहली आइरिश नाॅलेज फाउन्डेशन और इंटरनेट मोबाइल एसोसियेशन आफ इंडिया की रिपोर्ट है जिसमंे कहा गया है कि सोेशल मीडिया अगले लोकसभा चुनाव में 543 सीटों में से 160 सीटों पर अपना प्रभावी असर डालेगा। इस रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया कि पिछले चुनाव में 160 सीटों पर जो अंतर था आज वहाँ उससे अधिक फेसबुक यूजर्स हैं। खास बात यह भी है कि फेसबुक इस्तेमाल करने वालों की यह संख्या इन सीटों के कुल मतदाताओं के 10 फीसदी से अधिक है। इसलिए इन सीटों को फेसबुक से अधिक प्रभावित होने वाली सीटें कहा जा रहा है। अपनी स्टडी में इन संस्थाओं ने 67 सीटों को मध्यम श्रेणी में, 60 सीटों को न्यूनतम प्रभाव वाली श्रेणी में तथा बाकी बची 256 सीटों को सोेशल मीडिया के प्रभाव से मुक्त बताया गया है। स्टडी बताती है कि सोेशल मीडिया से प्रभावित होने वाली सबसे अधिक सीटें 21 महाराष्ट्र में, 17 सीटें गुजरात में, 14 सीटें उत्तर प्रदेश में, कर्नाटक व तमिलनाडु में 12-12 सीटें हैं। साथ में आन्ध्र प्रदेश में 11, केरल में 10, मध्य प्रदेश में 9, तथा दिल्ली की 7 सीटो के सोशल मीडिया से प्रभावित होने की पूरी सम्भावनायें हैं। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान में पाँच-पाँच सीटें तथा बिहार, छत्तीसगढ़, जम्मू कश्मीर, झारखण्ड व पश्चिम बंगाल की चार-चार सीटें सोशल मीडिया से प्रभावित होने की सम्भावनायें जताई गयी हैं। इससे जुड़ी दूसरी रिपोर्ट अमेरिका आधारित नान पार्टिजन फैक्ट टैंक और प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा ‘ग्लोबल एटिट्यूड’ नाम से है जिसमें दुनियाँ के 21 देशों का सर्वे शामिल है। इसमें साफ कहा गया है कि भारत में मात्र छह फीसदी लोग ही सोेशल मीडिया का प्रयोग करते हैं। सोेशल नेटवर्किंग के मामले में भारत काफी नीचे यानि पाकिस्तान के आस-पास है। लिहाजा भारत में इसका प्रभाव चुनाव पर उतना नहीं पड़ेगा जितना विकसित देशों में पड़ता है। यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत में अमेरिका के 92 फीसदी के मुकाबले मात्र 10-12 फीसदी लोग ही इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। सोशल मीडिया आगामी चुनाव में कितना प्रभाव डालेगा, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। परन्तु इतना जरुर है कि इन दोनो ही रिपोर्टस में राजनीति में सोेशल मीडिया के प्रयोग के सच को गहराई से स्वीकार किया गया है। यही वजह है कि आज कई राजनीतिक दलों ने फेसबुक और ट्विटर पर अपने अकाउट्ंस खोल दिये हैं।
दरअसल सोशल ब्लाग्स, सोशल नेटवर्कस, इंटरनेट फोरम, माइक्रोब्लागिंग, विकीस, फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, पिक्चर्स व वीडियो के रूप में यू-ट्यूब्स, सोशल बुकमार्किंग तथा गूगल इत्यादि से जुड़ा सोशल मीडिया सूचना क्रान्ति के नये युग का नया अवतार है जिसने पिछले दिनों मुम्बई से लेकर हैदराबाद, पुणे तथा बंगलूरू तक पूर्वोत्तर के लोगों के पलायन कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। यहाँ तक कि विगत कर्नाटक के चुनावों में भी अच्छी-खासी भूमिका निभायी थी। आज सोशल मीडिया सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक व राजनीतिक जगत का एक बहुत बड़ा शक्ति केन्द्र बनता जा रहा है। यही वजह है कि बच्चे, किशोर, महिलाएं, पेशेवर युवा, चिंतक, विचारक व राजनेता इस सोशल मीडिया से जुड़ने को उतावले हैं। यहाँ गौरतलब है कि सबसे लोकप्रिय सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक पर नरेन्द्र मोदी, ममता बनर्जी व एम॰ करुणानिधि जैसे बहुचर्चित नामों को पछाड़ते हुए पहले स्थान पर पहुँच गये। आज सम्पूर्ण विश्व में एक अरब से भी अधिक लोग सोशल मीडिया से जुड़े हैं। कहना न होगा कि दुनियाँ का हर छठा व्यक्ति इस सोशल मीडिया का उपयोग कर रहा है। जहाँ तक भारत का सवाल है तो यहाँ 2010 में इन्टरनेट यूजर्स की जो संख्या सात-आठ करोड़ के करीब थी, वह 2013 में 10-12 करोड़ के करीब पहुँच गयी है। यहाँ सोशल मीडिया से जुड़े यूजर्स की संख्या भी आठ करोड़ को पार कर गयी है। भारत में नेल्सन कम्पनी के द्वारा किए गए अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि यहाँ सात-आठ करोड़ से अधिक उपभोक्ता सोशल नेटवर्किंग साइट्स से जुड़े हैं। इनमें पाँच करोड़ से अधिक प्रतिदिन सोशल नेटवर्किंग का प्रयोग करते हैं। देश में फेसबुक का प्रयोग करने वाले 14 से 45 वर्ष तक के युवाओं की संख्या भी छह करोड़ से अधिक है। इनमें एक तिहाई यूजर्स मध्यम शहरों तथा 11 फीसदी यूजर्स छोटे शहरों से आते हैं। सोशल मीडिया से जुड़े इन यूजर्स का मकसद उस पर केवल निजी बातचीत या मनोरंजन करना ही नहीं है, बल्कि 45 फीसदी से भी अधिक यूजर्स का इस पर सघन राजनीतिक विमर्श भी खुलकर होता है। इसी तरह तथ्य यह भी बताते हैं कि सोशल मीडिया में फेसबुक, आर्कुट तथा लिंक्डइन जैसी सोशल साइट्स का प्रयोग विश्व के अन्य देशों के मुकाबले भारत में सर्वाधिक किया जाता है। वर्तमान में यह सोशल मीडिया लोगों की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का बहुत बड़ा प्लेटफार्म बन गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह संवाद और विचार-विमर्श का एक ऐसा सशक्त माध्यम बनकर उभर रहा है जो लोगों की सामाजिक सोच को सीधे रूप में प्रभावित करने की ताकत रखता है। इन्हीं बजूहात के कारण पिछले साल जुलाई में ब्रिटेन की आक्सफोर्ड स्ट्रीट पर एक अनियन्त्रित बंदूकधारी के घुसने की ट्विटर पर प्रसारित खबर से आक्सफोर्ड स्ट्रीट पर अफरातफरी मच गयी थी। इसके अलावा पिछले दिनों मिस्र, लीबिया, सीरिया तथा बहरीन जैसे देशों में सोशल मीडिया के माध्यम से ही वहाँ की जनता आन्दोलन के लिए उठ खड़ी हुई। पिछले दिनों अमेरिका जैसे ताकतवार देश में होने वाले आक्यूपाई वाल स्ट्रीट जैसे बड़े आन्दोलन को भी सोशल मीडिया ने ही मुकाम तक पहुँचाया। अन्ना टीम आन्दोलन के पश्चात् रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन तथा दिल्ली के 16 दिसम्बर की रात की घटना के बाद के युवा आन्दोलन को आक्रामक आवाज देने में सोशल मीडिया ने ही अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज स्थिति यह है कि राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खुद लोकतान्त्रिक सरकारें तक अवाम में जनमत विकसित करने के लिए सोशल मीडिया का जमकर प्रयोग कर रही है। मसला चांहे समुदायों पर आॅन लाइन दबाव का हो अथवा किसी विचार को आवाज देने का अथवा किसी उत्पाद की गुणवत्ता को जाँचने व परखने का अथवा चाहे वह मुद्दा विभिन्न पेशेवर कम्पनियों के द्वारा अपने कर्मचारियों के सामाजिक चरित्र को जानने से जुड़ा ही क्यों न हो, इन सभी मुद्दों पर सोशल मीडिया की भारी ताकत उभरकर सामने आ रही है।
यहाँ असल बात यह है कि अब हमें सोशल मीडिया की वास्तविक शक्ति को पहचानना चाहिए। हमें स्मरण रहना चाहिए कि विगत वर्षों में विश्व के देशों में तानाशाही को समाप्त करने में इसकी बहुत भूमिका रही थी? अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव का ग्राफ बढ़ाने में सोशल मीडिया ने ही क्रान्तिकारी भूमिका अदा की है। पिछले ही दिनों में गुवाहाटी में अकेली लड़की के साथ उसके उत्पीड़न का जो खुला खेल हुआ, उससे जुड़े आपराधिक तत्वों को जेल के सींखचों तक पहुँचाने का काम भी सोशल मीडिया ने भी बखूवी निभाया था।
आज पूरे देश की निगाह युवाओं पर है। वर्तमान में सोशल मीडिया इन नौजवानों की रुचियों और उनकी चेतनाओं से सीधा जुड़ रहा है। हाल ही में सोशल मीडि़या से जुड़े ये जो अध्ययन आये हैं उनका ध्येय भले ही सोशल साइट्स पर विज्ञापनों के स्पेस से मुनाफा कमाना भी हो। परन्तु आज यह भी कडु़वी सचाई है कि जनमत का निर्माण करने में सोशल मीडिया की अह्म भूमिका है। इसलिए आज के संदर्भ में कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जो खुद को आनलाइन पालिटिक्स से अलग रखना चाहता हो। यही कारण है कि आज कई राजनीतिक दलों के दिग्गज नेता सोशल मीडिया की राजनीति में काफी सक्रिय हैं। मीडिया रिपोर्ट चाहे जो कहें, परन्तु इतना जरुर है कि सूचना क्रान्ति से जुड़े ज्ञानाश्रित समाज में हमें सोशल मीडिया के सीमांतों को समझना पड़ेगा। केवल इतना ही नहीं, उसकी सम्भावनाओं को भी पूरी तरह उपयोग में लाना जरुरी है। सोशल मीडिया से जुड़ी ये रिपोर्टस इस बात की संकेत है कि आज के सूचना तकनीक के इस दौर में सोशल मीडिया की अपनी एक हैसियत है जिससे राजनीति भी अब अछूती नहीं है। इसलिए सोशल मीडिया के अस्तित्व को नकारना आज किसी भी राजनेता के वश की बात नहीं रह गयी है।
- एसोसिएट प्रोफेसर, समाजशास्त्र महाराजा हरिश्चन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुरादाबाद।
मो॰ - 9412245301





