Tuesday, March 25, 2014

कुदरत को छेड़े बिना आगे की राह तलाशनी होगी। - शेखर प्रियदर्शी

कुदरत से छेड़छाड़ का नतीजा क्या होता है, यह हमने देवभूमि में हुई विनाश लीला में देख लिया। देव भूमि की त्रासदी सिर्फ और सिर्फ मानव निर्मित है।
इस त्रासदी के कुछ दिन पूर्व ही मुझे सपरिवार केदारनाथ और बद्र्रीविशाल के दर्शन का सौभाग्य मिला और उस यात्रा के दौरान मैने जो कुछ भी देखा-समझा वह आशंका इतनी जल्दी प्रलयंकारी रूप में सामने आयेगी इसका हमें कतई आभास नहीं था।
नदियों के किनारे बेरोकटोक अवैद्य निर्माण, खनन, खनन के लिए हरे-भरे जंगलों की कटाई, सड़कों और टैनल बनाने के लिए विस्फोटों का अन्धाधुन्ध उपयोग और पनविजली लगाने की बेतहाशा होड़ की परिणति ही यह तबाही है। इसे हम अपने तरीके से प्रकृति का प्रतिशोध भी कह सकते हैं। अब हमारे लिए यह निहायत जरूरी हो जाता है कि आगे के लिए हम सचेत होकर प्रकृति के साथ पूरी तरह सामंजस्य बिठाते हुए कदम दर कदम बढ़ायें।
हमें हर हाल में अपने तीर्थ स्थनों के व्यावसायी करण को रोकना और वहां जाने बाली संख्या को  नियन्त्रित करना होगा। विकास की वर्तमान अवधारणा का पुनर्विचार करते हुए बेतहासा बन रही विद्युत परियोजनाओं का भी वैज्ञानिक अध्यन करते हुए  उन पर रोक लगानी होगी। नदियों के किनारे बन रहे होटलों, गेस्टहाउसों आदि को रोकना जरूरी हो जाता है, क्योंकि इनके द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण, कचड़ा, पालीथीन आदि पहाड़ों के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं।
पेड़ों की कटान एवं विस्फोटों को रोकना,उत्तराखण्ड की परिस्थितिकी के अनुकूल बनों को बढ़ाना, भवन निर्माण की स्थानीय शैली, गैर पारम्परिक ऊर्जा जैसे सौर, पवन आदि स्रोतों को प्रोत्साहित करना तथा जलवायु के अनुरूप कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन, जिससे स्थानीय नगरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इसके साथ ही शिक्षा के पाठ्यक्रम में प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने और आपदा प्रबन्धन को जोड़ना भविष्य के लिए हितकर होगा।
- लेखक लोक भारती के कार्यकर्ता हैं।