Monday, March 3, 2014

पर्यावरण संकट और ग्लोबल वार्मिंग -

सभी को लगा कि गरमी इस बार थोड़ा पहले आ गई है और कुछ ज्यादा ही तेजी से आई है। अखबार वाले बता रहे हैं कि कम से कम तापमान में पिछले बीस साल का रिकार्ड टूटा है तो चालीस साल का रिकार्ड ज्यादा से ज्यादा तापमान में टूटा है। इसके प्रभाव से सारी दुनियां परेशान है और आज उसके कारण दुनियां भर में ग्लोबलवार्मिंग की चर्चा सुनाई देती है; जिसका सीधा-साधा सा अर्थ है, धरती का गर्म होना या धरती का बुखार, जो पर्यावरण प्रदूषण का परिणाम है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण बदलते मौसम की, गरम होती धरती की चिन्ता सबको है और यह स्वाभाविक है। अगर धरती के गर्म होने के असर को समझना हो; तो हमें अपने शरीर को उदाहरण मान कर समझना चाहिए। जब हम निश्चित तापमान पर रहते हैंतो स्वस्थ कहलाते हैं; शरीर का तापमान एक डिग्री भी ज्यादा हो जाये तो कहते हैं कि बुखार हो गया है। फिर हम उसे उतारने की कोशिश करते हैं; क्योंकि ज्यादा तापमान सह भी नहीं सकते। उसी प्रकार धरती का गरम होना धरती का बुखार है। वह बार-बार कह रही है कि उसका तापमान बढ़ रहा है, उसका तापमान बढ़ रहा है, उसका बुखार उतारने का उपाय किया जाये। हमारे पढ़े लिखे समाज ने ठंढ़ और गर्मी के मौसम के आंकड़ों को अभी हाल में इकट्ठा करना सीखा है और पिछले दिनों उपग्रह प्रणाली बगैरह से इसमें बहुत तरक्की हुई है। परन्तु क्या यह आधुनिक यन्त्र और विज्ञान हमें समय पर मौसम की सही जानकारी देने में सक्षम हे। पिछले दिनो सुनामी आई, तबाही मचाकर चली गई और हम मौसम विभाग की ओर देखते रहे। हिन्दुस्तान ही नहीं, दुनियां भर के इतने उपग्रह तैनात होने के बाबजूद किसी को उसकी सूचना नहीं थी। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, जब कुछ ही घंटों की बारिश में पूरी की पूरी मुंबई बह गई थी। वह जंगल में बसा कोई गुमनाम शहर नहीं है। देश की आर्थिक राजधानी और आधुनिकतम शहर है तो वहां मौसम विभाग तो होगा ही। फिर वहाँ हवाई अड्डा भी है। उसकी एक मौसम प्रणाली होती है, जो यह बताती है कि कब तेज वारिश होगी, कब ओले पड़ेंगे और तेज हवायें चलेंगी। इन्हीं आधुनिकतम यन्त्रों की मदद से प्राप्त मौसम की सूचनाओं के आधार पर हवाई जहाजों का उड़ना, उतरना होता है। पर, तमाम यन्त्रों के रहते हुए भी मुबई में वह भी मौसम का मिजाज नहीं बता पाये। इसी तरह, अभी कुछ ही दिनों पहले योरप में इंग्लैंड के पास बेहद कठिन नाम ‘ऐयाफ्याटलायोकुल’ वाला जो ज्वालामुखी फटा है, उसकी कोई सरल जानकारी भी किसी के पास नहीं थी। तो मौसम को देखने का वर्तमान तरीका बहुत पुराना नहीं है। पश्चिम जिसकी ओर हम भौचक्की निगाहों से देखते रहने के आदी हो गये हैं, उसका कैलेण्डर मात्र 209 साल पुराना है और उसमें मौसम विज्ञान का इतिहास महज सौ साल का है। उससे पहले करीब 1900 साल मौसम विज्ञान के बिना भी जीना जानते थे। इसलिए ब्रह्माण्ड और सौर मण्ड़ल तो छोडि़ये, यह पृथ्वी, उसका वायुमण्डल और उससे बनने वाला मौसम एक ऐसी पहेली है, जिसका बहुत थोड़ा सा हिस्सा हम जानते हैं। पश्चिम के देश जब पृथ्वी पर गर्मी, ठंढ़, मानसून , पानी या वर्षा की भविष्यवाणी करते हैं और वह खरी नहीं उतरती, तो उससे बचने के लिए एक शब्द ‘एल निन्यो’ का इस्तेमाल करते हैं। कहेंगे यह एल निन्यो का असर है। यह एल निन्यो क्या है? यह वास्तव में उनके धर्मग्रन्थ से लिया गया एक शब्द है, जिसका अर्थ है- भगवान का बच्चा। यह बालक उदण्ड़ है, नटखट है, उसको पकड़ नहीं पाते, भगवान का उधमी बच्चा। आधुनिक विज्ञान के जनक माने जाने वाले लोगों ने अपने वचाव के लिए एल निन्यो जैसा शब्द बचाकर रखा। उसको उन्होंने जोड़ा है प्रशान्त महासागर से। इसलिए कि धरती जरा सी गरम या ठंण्ढ़ी होती है तो प्रशान्त महासागर इतना बड़ा है कि इस गर्मी का असर उसके पानी पर इतना पड़ता है कि एक अंगुल सतह अगर दशमलव एक अंश ज्यादा गर्म हो गई तो उससे निकली जो भाप है; उससे जो बादल बनेंगे, वे हमारे अनुमान को विगाड़ देंगे। इस लिए हम यह मानकर चलें कि हमारा विज्ञान एल निन्यो ही है। मतलब भगवान का छोटा बालक ही है जो अभी किशोर या वयस्क नहीं हो पाया है। वह अभी घुटने चल रहा है। इसका मतलब यह नहीं कि हम इस विज्ञान को समझने की कोशिश न करें। वह तो हमें लगातार करते जाना है। लेकिन यह जानें कि हमारी हैसियत इसको पूरी तरह समझकर बर्ताव करने की नहीं है। कमसे कम भविष्यवाणी करके अपने स्वार्थ के लिए चलने की गुंजाइश भगवान और प्रकृति बिल्कुल ही नहीं छोड़ते। गर्मी, ठण्ढ़ या वारिश ज्यादा पड़ती है, तो उसे जानने की हमारी समुद्र में एक बूंद के बराबर हैसियत है। मौसम के बारे में हमारा ज्ञान सचमुच में अज्ञान ही है। इस ज्ञान को रोज चमकाएं, लेकिन प्रकृति के सामने जब खड़े हों इसका घमण्ड न करें। धरती का जो तापमान बढ़ रहा है, उसका बुखार उतारने का उपाय किया जाये। पर ऐसा नहीं हो पा रहा। यदि धरती को बुखार आयेगा तो उस पर रहने वालों पर गंभीर संकट आयेगा। इसलिए उसका उपाय समय रहते करना जरूरी है। इसके प्रतीक रूप में ‘अर्थआवर मनाना’ स्वागत योग्य है, लेकिन यह प्रतीक ही बनकर न रह जाये। कुछ दिनों से इसी तरह 22 अप्रैल को धरती दिवस मनाया गया, जिसके विषय में कुछ पता नहीं कि यह कब और कैसे प्रारम्भ हुआ। हम पश्चिम की ओर देखने के इतने आदी हो गये हैं कि इन्होनें जो कहा हम आंख बन्द करके उनके पीछे दौड़ने लगते हैं। यह भी नहीं विचार करते कि इसका औचित्य क्या है। 5 जून को विश्वपर्यावरण दिवस मनाने को ही ले लीजिये। भारत में 5 जून को ज्येष्ठ मास की इतनी तपती धूप होती है, कि पहले से लगे पेड़-पौधें और जीव-जन्तुओं को अपना जीवन बचाना कठिन हो रहा होता है। ऐसे समय में विश्वपर्यावरण दिवस के नाम पर लगाया गया क्या कोई पौधा जीवित बच पायेगा। यह नई प्लास्टिक संस्कृति आई है, उसने हमारे ऊपर अनेक प्लास्टिक त्योहार भी लाद दिये। इसके कारण हम अपने परम्परागत त्योहारों को भूलकर, इन बनावटी त्योहारों का ढ़ोल पीटते हैं और उसको मना कर खुश होते रहते हैं। इस तरह जो काम हमें करना चाहिए वह हम नहीं कर पाते। हमें समझना चाहिए ’पर्यावरण संकट वास्तविक है और इसे नकली औजारों से, नकली त्योहारों से लड़ा नहीं जा सकेगा। इसके लिए वास्तविक तैयारी करनी पड़ेगी। ु