वर्तमान चुनाव में मतदाताओं द्वारा ली गई हिस्सेदारी पूर्व में हुए अन्य चुनावों की अपेक्षा बहुत ज्यादा रही है, जिससे आये चुनाव परिणामों ने आम नागरिकों में व्यवस्था परिवर्तन की भूख को बनाए रखने का संकेत सा दिया है।
वैसे सत्ता परिवर्तन की भूख भारतीय जनमानस में आजादी के बीस वर्ष बाद 1967 से ही प्रारम्भ हो चुकी थी, जब गैर कांग्रसी सरकारों का गठन हुआ। परन्तु राजनीतिक दिशाविहीनता से परिवर्तन को सार्थकता एवं गुणात्मकता में तब्दील नहीं किया जा सका। उसका कारण गैर कांग्रेसी सरकारों का नेतृत्व अपनी निजी महात्वाकांक्षाओं के कारण कांग्रेस छोड़ कर आए हुए लोगों के हाथों में ही होना था।
इस प्रवृत्ति को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सामाजिक न्याय का नारा देकर जाने-अनजाने पिछड़ों, हरिजनों व मुसलमानों को न्याय दिलाने के नाम पर समाज को छोटे-छोटे दायरों में बांटने और ऊँची जातियों की प्रतिस्पर्धा में उनके चुनावी समीकरण बनाने का जो कार्य किया, उसने भारतीय संस्कृति की मूलभूत एकता पर ही प्रहार किया? इन्हीं चुनावी समीकरणों को राजनीतिक दल विचारधारा के रूप में जनता के सामने पेश करते चले आ रहे हैं, जो भारतीय समाज को अस्थिर और हिंसक बनाए हुए है।
केन्द्रीय सत्ता का लगातार उपभोग करने वाले राजनैतिक दल के पास एक ही नारा है कि स्थिर सरकार मात्र वह ही दे सकता है। जिसके प्रतिउत्तर में 1977 में जयप्रकाश बाबू के ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ के आह्वान पर दिल्ली समेत समस्त उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया। परन्तु 1980 में फिर उसी कांग्रेस संस्कृति के प्रभाव से जनता पार्टी का टूटना और तत्कालीन सरकार का पतन हुआ। 1985 में चुनाव के तत्काल पूर्व ही श्रीमती इन्दिरा गाँधी की नृशंस हत्या पर उपजी सहानुभूति लहर पर पुनः कांग्रेस बहुमत प्राप्त करने के बाद सत्ता में आ गई। जनता ने अब तक सत्ता में आये विकल्पों पर विश्वास न करते हुए 1991 के चुनाव में किसी को सरकार बनाने योग्य बहुमत नही दिया। इससे स्पष्ट होता है कि जनता का राजनीतिक दलों पर से विश्वास उठ गया है और उनके हर चुनावी नारों के विपरीत मतदान करते हुए भी अपनी परिर्वतन की भूख को बनाए हुए है।
डा॰ लोहिया का गैर कांग्रेसवाद का जो नारा था, उसके पीछे मूल्यांकन यह था कि आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी के हाथ में जो सत्ता थी वह वैचारिक रूप से उपभोक्ता संस्कृति यानी पाश्चात्य संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है और भारतीय समाज को विदेशी संस्कारों एवं विचारों में ढ़ालना चाहती है। जिसके लिए इन लोगों ने समाज में भौतिकता की भूख जगाई है और व्यक्ति को उस चैराहे पर लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ हर चीज खरीदी जा सकती है। लेकिन हमारे समाज की विशेषता है कि वह नारों पर बिखरता नहीं और अपने मूल स्वभाव और तेवर को बनाए रखता है।
गैर कांग्रेसवाद उसी पाश्चात्यता को समाप्त कर भारतीय संस्कृति को प्रतिष्ठित करने का विचार है, जिसके आधार पर हमें अपने को सनातन कहने पर गर्व होता है। जिसका जीवन दर्शन सौहार्द, भाईचारा एवं एक-दूसरे के प्रति त्याग की भावना से परिपूर्ण हमारे समाज की आर्थिक और सामाजिक संरचना है, जिसे गांधी जी ने ‘ग्राम स्वराज’ कहा था।
आजादी की लड़ाई के दौरान गाँधी जी ने कहा था कि,‘जिस दिन इस देश के लोगों का स्वाभिमान जागेगा, अंग्रेज तो उसके ते़ज की भाप में ही उड़ जाएंगे।’ परन्तु हमारी लड़ाई उतने तक ही सीमित नहीं है। हमारी लड़ाई तो ग्राम स्वराज की है। इसके लिए हमको प्रत्येक गाँव में कम से कम एक स्वाभिमानी और निष्ठावान कार्यकर्ता चाहिए। गाँधी जी का मानना था कि समाज को आगे ले जाने के लिए भारतीय परम्परा को अपनाना पड़ेगा, और इसी के आधार पर ग्राम-स्वराज की स्थापना करनी होगी। राम उनके आदर्श थे।
परन्तु गाँधी जी के नाम पर सत्ता में बैठे लोगों की कथनी और करनी में कितना अन्तर है? इसे समझना होगा। सच तो यह है कि गांधी जी की विकेन्द्रित संरचना, ‘ग्राम स्वराज’ की भावना के विपरीत पार्टी के संगठन को भी निजी महात्वाकांक्षाओं वाले लोगों ने अपने स्वयं में केन्द्रित कर लिया है।
असल में आजादी के 67 साल बाद (जो आदमी का वृद्धावस्था में प्रवेश का समय है) भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का पूर्ण विकास नहीं हो पाया। सही मायने में राजनैतिक दल नेताओं के गिरोह बन गए हैं, जिसके कारण वैचारिक और सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता समाप्त हो गई है और उसका स्थान निजी महात्वाकांक्षाओं ने ले लिया है। परिणामतः अभी तक हमारी कोई शिक्षा नीति तक नहीं बन पाई, जो व्यक्ति के विकास का प्रथम चरण होता है।
वस्तुतः राजनीतिक दल किसी निश्चित विचारधारा के अभाव में अपने-अपने दल का अस्तित्व बनाए रखने हेतु सामाजिक समीकरणों को अपना-अपना आधार बनाए हुए हैं, जिसके परिणाम स्वरूप आज सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त है।
जनप्रतिनिधियों का नैतिक स्तर इतना गिर चुका है कि उन पर रोक लगाने के लिए दल-बदल विधेयक लाना पड़ा था। इसके बावजूद अब भी चुनाव में किसी न किसी रूप में दल-बदल देखा जाता है, जो लोकतन्त्र पर कलंक है। नैतिक परम्पराएं लोकतंत्र की रीढ़ होती हैं, जो अलिखित होती हैं। उन नैतिक मूल्यों की अवमानना के परिणाम स्वरूप आज आजादी के 67 साल बाद भी भारतीय राजनीति अनिश्चय, असुरक्षा, वैचारिक खोखलेपन एवं सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार से ग्रसित है। राष्ट्रीय मुद्दों पर अनैतिक सौदेबाजी का दौर है। राष्ट्रवाद के अभाव में नए-नए वाद पैदा हो रहे हैं। सबसे भयानक आतंकवाद और हिंसावाद पैदा हो गया है।
दलीय प्रणाली में जनशक्ति के मत पर ही सरकारें बनती हैं। इसलिए लोकशक्ति को जागृत कर ही ऐसी राजनैतिक सत्ता का अभ्युदय संभव है, जो भारत के आन्तरिक व वैश्विक परिपे्रक्ष्य में सार्थक एवं कारगर भूमिका अदा करने में समर्थ हो। इसी व्यापक उद्देश्य की पूर्ति हेतु आगामी 2014 के लोकतन्त्र-महोत्सव का उपयोग किया जाय।
वैसे सत्ता परिवर्तन की भूख भारतीय जनमानस में आजादी के बीस वर्ष बाद 1967 से ही प्रारम्भ हो चुकी थी, जब गैर कांग्रसी सरकारों का गठन हुआ। परन्तु राजनीतिक दिशाविहीनता से परिवर्तन को सार्थकता एवं गुणात्मकता में तब्दील नहीं किया जा सका। उसका कारण गैर कांग्रेसी सरकारों का नेतृत्व अपनी निजी महात्वाकांक्षाओं के कारण कांग्रेस छोड़ कर आए हुए लोगों के हाथों में ही होना था।
इस प्रवृत्ति को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सामाजिक न्याय का नारा देकर जाने-अनजाने पिछड़ों, हरिजनों व मुसलमानों को न्याय दिलाने के नाम पर समाज को छोटे-छोटे दायरों में बांटने और ऊँची जातियों की प्रतिस्पर्धा में उनके चुनावी समीकरण बनाने का जो कार्य किया, उसने भारतीय संस्कृति की मूलभूत एकता पर ही प्रहार किया? इन्हीं चुनावी समीकरणों को राजनीतिक दल विचारधारा के रूप में जनता के सामने पेश करते चले आ रहे हैं, जो भारतीय समाज को अस्थिर और हिंसक बनाए हुए है।
केन्द्रीय सत्ता का लगातार उपभोग करने वाले राजनैतिक दल के पास एक ही नारा है कि स्थिर सरकार मात्र वह ही दे सकता है। जिसके प्रतिउत्तर में 1977 में जयप्रकाश बाबू के ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ के आह्वान पर दिल्ली समेत समस्त उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया। परन्तु 1980 में फिर उसी कांग्रेस संस्कृति के प्रभाव से जनता पार्टी का टूटना और तत्कालीन सरकार का पतन हुआ। 1985 में चुनाव के तत्काल पूर्व ही श्रीमती इन्दिरा गाँधी की नृशंस हत्या पर उपजी सहानुभूति लहर पर पुनः कांग्रेस बहुमत प्राप्त करने के बाद सत्ता में आ गई। जनता ने अब तक सत्ता में आये विकल्पों पर विश्वास न करते हुए 1991 के चुनाव में किसी को सरकार बनाने योग्य बहुमत नही दिया। इससे स्पष्ट होता है कि जनता का राजनीतिक दलों पर से विश्वास उठ गया है और उनके हर चुनावी नारों के विपरीत मतदान करते हुए भी अपनी परिर्वतन की भूख को बनाए हुए है।
डा॰ लोहिया का गैर कांग्रेसवाद का जो नारा था, उसके पीछे मूल्यांकन यह था कि आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी के हाथ में जो सत्ता थी वह वैचारिक रूप से उपभोक्ता संस्कृति यानी पाश्चात्य संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है और भारतीय समाज को विदेशी संस्कारों एवं विचारों में ढ़ालना चाहती है। जिसके लिए इन लोगों ने समाज में भौतिकता की भूख जगाई है और व्यक्ति को उस चैराहे पर लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ हर चीज खरीदी जा सकती है। लेकिन हमारे समाज की विशेषता है कि वह नारों पर बिखरता नहीं और अपने मूल स्वभाव और तेवर को बनाए रखता है।
गैर कांग्रेसवाद उसी पाश्चात्यता को समाप्त कर भारतीय संस्कृति को प्रतिष्ठित करने का विचार है, जिसके आधार पर हमें अपने को सनातन कहने पर गर्व होता है। जिसका जीवन दर्शन सौहार्द, भाईचारा एवं एक-दूसरे के प्रति त्याग की भावना से परिपूर्ण हमारे समाज की आर्थिक और सामाजिक संरचना है, जिसे गांधी जी ने ‘ग्राम स्वराज’ कहा था।
आजादी की लड़ाई के दौरान गाँधी जी ने कहा था कि,‘जिस दिन इस देश के लोगों का स्वाभिमान जागेगा, अंग्रेज तो उसके ते़ज की भाप में ही उड़ जाएंगे।’ परन्तु हमारी लड़ाई उतने तक ही सीमित नहीं है। हमारी लड़ाई तो ग्राम स्वराज की है। इसके लिए हमको प्रत्येक गाँव में कम से कम एक स्वाभिमानी और निष्ठावान कार्यकर्ता चाहिए। गाँधी जी का मानना था कि समाज को आगे ले जाने के लिए भारतीय परम्परा को अपनाना पड़ेगा, और इसी के आधार पर ग्राम-स्वराज की स्थापना करनी होगी। राम उनके आदर्श थे।
परन्तु गाँधी जी के नाम पर सत्ता में बैठे लोगों की कथनी और करनी में कितना अन्तर है? इसे समझना होगा। सच तो यह है कि गांधी जी की विकेन्द्रित संरचना, ‘ग्राम स्वराज’ की भावना के विपरीत पार्टी के संगठन को भी निजी महात्वाकांक्षाओं वाले लोगों ने अपने स्वयं में केन्द्रित कर लिया है।
असल में आजादी के 67 साल बाद (जो आदमी का वृद्धावस्था में प्रवेश का समय है) भी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का पूर्ण विकास नहीं हो पाया। सही मायने में राजनैतिक दल नेताओं के गिरोह बन गए हैं, जिसके कारण वैचारिक और सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता समाप्त हो गई है और उसका स्थान निजी महात्वाकांक्षाओं ने ले लिया है। परिणामतः अभी तक हमारी कोई शिक्षा नीति तक नहीं बन पाई, जो व्यक्ति के विकास का प्रथम चरण होता है।
वस्तुतः राजनीतिक दल किसी निश्चित विचारधारा के अभाव में अपने-अपने दल का अस्तित्व बनाए रखने हेतु सामाजिक समीकरणों को अपना-अपना आधार बनाए हुए हैं, जिसके परिणाम स्वरूप आज सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त है।
जनप्रतिनिधियों का नैतिक स्तर इतना गिर चुका है कि उन पर रोक लगाने के लिए दल-बदल विधेयक लाना पड़ा था। इसके बावजूद अब भी चुनाव में किसी न किसी रूप में दल-बदल देखा जाता है, जो लोकतन्त्र पर कलंक है। नैतिक परम्पराएं लोकतंत्र की रीढ़ होती हैं, जो अलिखित होती हैं। उन नैतिक मूल्यों की अवमानना के परिणाम स्वरूप आज आजादी के 67 साल बाद भी भारतीय राजनीति अनिश्चय, असुरक्षा, वैचारिक खोखलेपन एवं सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार से ग्रसित है। राष्ट्रीय मुद्दों पर अनैतिक सौदेबाजी का दौर है। राष्ट्रवाद के अभाव में नए-नए वाद पैदा हो रहे हैं। सबसे भयानक आतंकवाद और हिंसावाद पैदा हो गया है।
दलीय प्रणाली में जनशक्ति के मत पर ही सरकारें बनती हैं। इसलिए लोकशक्ति को जागृत कर ही ऐसी राजनैतिक सत्ता का अभ्युदय संभव है, जो भारत के आन्तरिक व वैश्विक परिपे्रक्ष्य में सार्थक एवं कारगर भूमिका अदा करने में समर्थ हो। इसी व्यापक उद्देश्य की पूर्ति हेतु आगामी 2014 के लोकतन्त्र-महोत्सव का उपयोग किया जाय।
- वरिष्ठ सलाहकार (प्रबन्धन एवं निगरानी),
तकनीकि अनुसमर्थन समूह, एडसिल (आर॰एम॰एस॰ए॰),
मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार,
नई दिल्ली - 110001
तकनीकि अनुसमर्थन समूह, एडसिल (आर॰एम॰एस॰ए॰),
मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार,
नई दिल्ली - 110001





