Wednesday, March 26, 2014

उत्तराखण्ड के आपदा प्रबन्धन पर फिर सवालिया निशान - डा॰ विशेष गुप्ता

उत्तराखण्ड के भूगोल का इतिहास बताता है कि वहाँ प्रकृति की इस विनाशलीला का यह महामंजर पहली बार देखने को मिला है। हालीय स्थितियाँ बतातीं है कि वहाँ अब तक हजारों लोग इस जल प्रलय के चलते मारे जा चुके हैं तथा हजारों अभी भी लापता हैं। हो सकता है वहाँ का प्रशासन अब सभी लापता लोगों को मृत घोषित कर दे। परन्तु अभी भी हजारों दुखित परिजन अपनों की खोज में इधर-उधर भटक रहें हैं। उत्तराखण्ड में दोबारा बारिश के शुरु हो जाने से राहत कार्य कमजोर हो रहा है। मलबे में शवों के दबे होने से महामारी फैलने का अंदेशा हो रहा है। ऐसा अनुमान है कि 15-17 जून के वक्त पूरे उत्तराखण्ड के चारों धाम में लगभग दो लाख से भी ज्यादा तीर्थ यात्री वहाँ मौजूद थे। हालात बता रहें हैं कि जिस समय पत्थर और कीचड़ के साथ यह सैलाब आया उस समय पूरे उत्तराखण्ड में लाखों लोग जहाँ-तहाँ फंस चुके थे। स्थितियाँ यह भी गवाही दे रही हैं कि उत्तराखण्ड में हालात यह जल सैलाब आते ही बेकाबू हो गये थे। अनेक जगहों से संपर्क पूरी तरह से टूट चुका था। बचाव और राहत कार्यों के लिए सेना को बुलाना सरकार की मजबूरी बन गयी थी। इसलिए आपदा की इस घड़ी में आई॰टी॰बी॰पी॰ फोर्स तथा सेना के बहादुर जवानों को इस राहत कार्य में दिये गये सक्रिय सहयोग की भूरि-भूरि प्रशंसा होनी चाहिए। हजारों सरकारी व गैर सरकारी हाथ उत्तराखण्ड में राहत के लिए उठे तो हैं परन्तु अभी भी वहाँ के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। सही बात यह है कि उत्तराखण्ड की बारिश और इस भूस्खलन ने देश में तेजी से बढ़ रहे उपभोक्तावाद और आपदा प्रबंधन की तैयारियों की पोल खोल कर रख दी है। ऐसा नहीं है कि उत्तराखण्ड में पिछले सालों में बारिश नहीं हुयी। हाँ, इतना जरुर है कि इस बार समय से पूर्व आये मानसून ने कुछ ज्यादा ही तबाही मचायी है। परन्तु लगता ऐसा है कि हमने प्रकृति की पुरानी विनाशलीलाओं से कोई भी सबक नहीं सीखा है। आँकड़े बताते हैं कि देश को प्रति वर्ष जीडीपी का दो फीसदी तथा राजस्व का 12 फीसदी नुकसान इन प्राकृतिक आपदाओं की वजह से उठाना पड़ता है। पिछले दो दशकों के आँकड़े यह भी बताते हैं कि बाढ़ अनेक प्राकृतिक आपदाओं में सबसे बड़ी आपदा बनकर सामने आती है। दरअसल हिमालय क्षेत्र भी इन प्राकृतिक आपदाओं से अछूता नहीं रह गया है। लगता है कि अब वहाँ भी इनकी मारक क्षमता दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे मानव के बढ़ते हस्तक्षेप एवं वनो की अंधाधुंध कटाई, विद्युत परियोजनाओं, होटल व धर्मशालाओं के मनमाने तरीकें से निर्माण इत्यादि को इस आपदा की मुख्य वजह मान रहे हैं। इस प्रकार की आपदा अब साफ संकेत दे रही है कि कहीं न कहीं मानव और प्रकृति के बीच का संतुलन लगातार गड़बड़ा रहा है।
यह सच्चाई है कि तमाम आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। परन्तु इतना अवश्य है कि इस प्रकार की आपदाओं के घटित होने के बाद देश के श्रेष्ठ आपदा प्रबंधन के द्वारा इनके नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सकता है। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट भी हमें ध्यान देने की महती आवश्यकता है जिसमें कहा गया है कि अगर समय रहते हम नहीं चेते तो धरती के बढ़ते तापमान और उसकी वजह से तेजी से होते जलवायु परिवर्तन की घातक मार से हम बच नहीं सकते। हमारे देश में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन का भारी भरकम तंत्र मौजूद है। सन् 2005 में आपदा प्रबंधन पर राष्ट्रीय नीति का निर्माण भी किया गया। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन का यह संस्थात्मक रचना तंत्र तथा आपदा प्रबंधन के अधिनियम के साथ में इसका प्रबंधकीय ढांचा केन्द्रीय सरकार के साथ-साथ राज्य सरकार से लेकर जनपद स्तर तक विस्तारित है जिसमें आपदा के बाद बचाव, इसके नुकसान की भरपाई तथा इसके पश्चात फिर से आपदा पूर्व की तैयारी शुरु कर दी जाती है। इस आपदा प्रबंधन तंत्र पर वर्ष में करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं। परन्तु फिर भी केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के इतने बड़े आपदा प्रबंधन के सामने उत्तराखण्ड जैसी आपदायें राष्ट्रीय लाचारी का आइना दिखाती साफ नजर आती हैं। वह केवल इसलिए कि हम परमाणु शक्ति सम्पन्न देश होने का दम तो भरते हैं, परन्तु राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन की कुशल रणनीति निर्माण एवं उसके कार्यान्वयन में हम कछुआ चाल से चल रहे हैं। आपदाओं पर बड़ी-बड़ी बहस एवं उनसे जुड़ी सैद्धान्तिक रणनीति बनाने में तो हम माहिर हैं। परन्तु व्यावहारिक स्तर हादसों से प्रभावी रूप से निपटने में हम अभी सफल नहीं हो पा रहे हैं। वह इसलिए कि राष्ट्र के आपदा प्रबंधन तंत्र पर भी राजनीतिक जंग लगनी शुरू हो गयी है। आपदा से जुड़े विशेषज्ञों की भी हमारे पास कमी है। हम कोई ऐसी टीम भी गठित नहीं कर पा रहे हैं जो समय-समय पर आने वाली आपदाओं का जायजा लेकर उनसे जुड़ी रणनीति भी तैयार करके उसे आपदाओं के समय कार्यान्वित कर सकें।
गहराई से विचार करें तो यह बात स्पष्ट होती है कि आपदाओं से जुड़े खतरे हमेशा आस-पास की परिस्थिति से जोखिम को ओर बढ़ाते हैं। कहना न होगा कि आपदाओं के लिए उसके चारों ओर की परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं। इन परिस्थितियों की हम हमेशा अनदेखी करते रहते हैं। उत्तराखण्ड की जल प्रलय से जुड़ी आपदा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हम अपनी बढ़ती हुयी आबादी के प्रभाव तथा अपने भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े खतरों को लगातार नजर अन्दाज करते रहे हैं। इस सच को कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि यदि हम अपने भूगोल के प्रति वफादार होते तथा समय रहते इस प्राकृतिक आपदा से निबटने के पुख्ता इंतजाम होते तो निश्चित ही इतने बड़े हादसे को टाला जा सकता था।
कहा जा रहा है कि उत्तराखण्ड के प्रभावित ढ़ाँचे को खड़ा करने में अभी सालों का समय लगेगा। हो सकता है कि प्रदेश को संसाधनों की कमी से जूझना पड़े। इलाके में हुए बड़े नुकसान का प्रभाव एन॰सी॰आर॰ तथा दिल्ली तक की अर्थव्यवस्था पर भी दिखायी दे। हो सकता है कि इसके साथ-साथ उससे जुड़े पर्यावरणीय दुष्परिणामों का सामना भी वहाँ के लोगों को करना पड़े। परन्तु इतना अवश्य है कि भविष्य में इस प्रकार के हादसों में वृद्धि होने से इन्कार नहीं किया जा सकता। कड़वी सच्चाई यह है कि देश में तकनीकी विशेषज्ञों की भीड़ जितनी तेजी से बढ़ रही है, उसी अनुपात में कार्य संस्कृति में गिरावट भी लगातार बढ़ रही है। हमारी लाभोन्मुख प्रवृति हमारी प्रतिबद्धता को कमजोर कर रही है। तात्कालिक लाभ मिलने का दृष्टिकोण हमारी दूरदर्शिता को कमजोर बना रहा है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि भौतिक प्रगति के इस कालखण्ड में विकास के साथ-साथ  हादसों की भी संभावनाऐं बढ़ीं हैं। परन्तु इन हादसों से निपटने की पूर्व तैयारी तथा आपदाओं के पश्चात का समयबद्ध आपदा प्रबंधन तंत्र इस प्रकार की आपदाओं के प्रभाव को कम करने में कारगर सिद्ध तो हो ही सकता है।
ऐसी आपदा के समय में हमें गाँधी जी के शब्दों का स्मरण करना चाहिए जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा था कि ‘‘इस पृथ्वी के पास प्रत्येक व्यक्ति की मानवीय जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी कुछ मौजूद है, मगर यह किसी के लालच पूरा नहीं कर सकती‘‘। ध्यान रहे विलासितापूर्ण जीवन से बचाव के साथ-साथ हमें प्रकृति का संरक्षण करते हुए उससे अपना दोस्ताना रिश्ता भी कायम करना होगा। तभी हम प्रकृति के ऐसे असामयिक और तीव्र प्रकोप से बच सकते हैं। - एसोसियेट प्रोफेसर, समाजशास्त्र, महाराजा हरीशचन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुरादाबाद।