Tuesday, March 25, 2014

सेना को प्रणाम! - प्रेम बड़ाकोटी

सेना जहाँ एक ओर सीमाओं की सुरक्षा के लिये सन्नद्ध है, वहीं आन्तरिक सुरक्षा तथा प्राकृतिक आपदाओं में भी उसकी अहम भूमिका है। जहाँ कहीं भी कठिन परिस्थिति निर्माण होती है, तथा हालात नियन्त्रण से बाहर होते हैं, उस समय यह कहा जाता है कि इसे अब सेना के हवाले कर दिया गया है। उत्तराखण्ड में आई इस प्राकृतिक आपदा में स्थानीय प्रशासन से भी कहीं अधिक सब प्रकार के जोखिम भरे कार्यों में सेना की अतुलनीय भूमिका रही है। यह सीमान्त का क्षेत्र है, सेना के पास अपना सुगठित तन्त्र है, तथा समय-समय पर सेना में विशेष प्रशिक्षणों की व्यवस्था है, इसी कारण किसी भी आपात स्थिति में सेना के द्वारा कार्य को योग्य परिणाम प्राप्त होता है।
हम वर्तमान परिस्थिति में जब सेना की चर्चा कर रहे हैं तो उसके अन्तर्गत प्रत्यक्षतः जल-थल-नभ, एन॰डी॰आर॰एफ॰, आई॰टी॰बी॰पी॰, बी॰एस॰एफ॰, सीमा सड़क संगठन आदि सभी की प्रमुख भूमिका है। यदि यह कहा जाए कि राहत तथा बचाव कार्य में सेना ने विशेष भूमिका निभाई है तो यह इन कर्मवीरों के प्रति योग्यतम टिप्पणी होगी। बीहड़ क्षेत्रों में यत्र-तत्र फंसे हुए लोगों को निकालना, छोटी बड़ी नदियों पर पुल बनाकर सम्पर्क मार्ग को जोड़ना, त्रासदी में फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाना, सुदूरवर्ती क्षेत्र में रसद लेकर जाना, यह एक बड़ा अभियान सेना सम्पन्न किया है। वायुसेना ने इस सब कार्य में कारगो विमान का भी प्रयोग किया। रसद सामग्री के लिये आई॰एल॰ 76 और 3 एन॰एन॰के॰ बत्तीस विमानों का सहयोग लिया। इन्हीं के माध्यम से यात्रियों को भी पहुँचाया गया। सीमा सड़क संगठन (बी॰आर॰ओ॰) ऋषिकेश से बदरीनाथ तथा गंगोत्री तक की सड़क के लिये सदैव सजग है। कई स्थानों पर निरन्तर हो रहे भूस्खलन में भी उसके जवान सड़क खोलने का कार्य कर रहे हैं। वर्षाकाल में यह टास्क एक बड़ी चुनौती है।
इन सब अभियान के रूप में सेना के 8000 जवान, 10 मैरामिलिट्री दस्ते व एन॰डी॰आर॰एफ॰ की 2 बटालियनें लगी रहीं। वायुसेना ने कुल मिलाकर 2500 तक उड़ानें भरीं।
अलकनन्दा, मन्दाकिनी तथा भागीरथी घाटी के यात्रा मार्गों के ध्वस्त हो जाने के बाद सैनानियों ने पहाड़ की दुर्गम ऊँचाईयों पर चलने योग्य जो वैकल्पिक मार्ग बनाए, यह एक अत्यधिक साहसिक कार्य था। अनेक स्थानों पर पानी, बिजली तथा प्रशासन से सम्बन्धित अनिवार्य व्यवस्थाओं में भी सेना का महत्वपूर्ण योगदान है।
यह विशेष उल्लेखनीय है कि आपदा कार्यों के लिये गठित एन॰डी॰आर॰एफ॰ के सैनानी सबसे पहले राहत के लिये पहँुचे। केदारनाथ में 14 जून से हवाई सेवा बन्द थी। 16, 17 जून को जो तबाही हुई इसकी सर्वप्रथम सूचना कैप्टन भूपेन्द्र सिंह, योगेन्द्र राणा तथा बृजमोहन बिष्ट ने प्रशासन को दी। 17 जून की सायंकाल उन्होंने केदारनाथ के लिये उड़ान भरी थी। मौसम खराब होने के कारण वे केदारनाथ तो नहीं पहुँच पाये किन्तु रामबाड़ा में तबाही देखकर उन्हें आपदा का अनुमान लग गया। इतना ही नहीं तो सीमा सुरक्षा बल ने 10 करोड़ रूपये की धनराशि राहत हेतु तथा 6 करोड़ की राशि केदारघाटी के पाँच ग्रामों के पुनर्वास हेतु उत्तराखण्ड सरकार को सौंपी है।
इस रेस्क्यू आपरेशन के मध्य सेना को एक बड़ा आघात भी सहना पडा। वायुसेना, आई॰टी॰बी॰पी॰ तथा एन॰डी॰आर॰एफ॰ के 20 जवान तथा अधिकारी गौरीकुण्ड के निकट वायुसेना के हैलीकाप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण शहीद हो गये। कठिनाई से उनके शवों को निकाला गया तथा राष्ट्र ने उनको श्रद्धांजलि अर्पित की।
उल्लेखनीय है कि सेना का सहयोगी भाव और सौहार्दपूर्ण व्यवहार इस सब कार्य में प्रदर्शित हुआ। कमान सम्भल रहे ले॰ जनरल व कमाण्ड कर रहे अधिकारियों के वक्तव्य विश्वास से भरे थे। सदैव उन्होंने जो बात व्यक्त की उसमें उनका संकल्प झलकता था। तीर्थयात्री, स्थानीय समाज तथा राज्य का शासन/प्रशासन सभी के मन पर उनकी कर्मशीलता की अमिट छाप अंकित रहेगी।
गंगोत्री मार्ग पर सेना का हर्शिल केन्द्र राहत का एक बड़ा कार्य कर रहा था। यहाँ आर्मी मेडिकल कोर के कर्नल डा0॰ अरूण सिंह ने यात्रियों को सब प्रकार की चिकित्सा सुविधा प्रदान की व अपने मुख्यालय को लौटते समय उत्तरांचल दैवी आपदा पीडि़त सहायता समिति के केन्द्र मनेरी सेवा आश्रम में भी पधारे। उन्होंने कहा कि आप लोग एक स्वयंसेवी संगठन के नाते इस त्रासदी में यात्रियों की जो सेवा कर रहे हैं, यह एक बड़ा पुण्य का काम है। - लेखक लोक भारती के उपाध्यक्ष तथा उत्तरांचल दैवी आपदा पीडि़त सहायता समिति के प्रमुख कार्यकता हैं और इस आपदा के समय आपदा प्रबन्धन में संलग्न रहे।