कृषि रसायनों, नगरीय सीवर एवं प्रदूषित औद्योगिक उत्प्रवाह का नदियों में विसर्जन तथा नदी जल का कृषि एवं अकृषि कार्यों में उपयोग हेतु अन्तरण के फलस्वरूप गैर बरसाती दिनों में न्यून बहाव का सकल प्रभाव यह है कि नदी जल ‘आचमन’ तो दूर नहाने योग्य भी नही रह गया है। स्वयं हिमपुत्री मोक्षदायिनी गंगा जिसके जल मंे अन्य नदियों के शीर्ष जल से 25 गुना स्वच्छ रखने की क्षमता थी, उसमें अनेक शहरों के गन्दे नाले बहने के कारण, बोतल में रखे गंगाजल में अब कीटाणु पैदा होते हैं। यमुना और अन्य नदियांॅं भी गन्दे नाले की श्रेणी में आ चुकी हैं। आक्सीजन की कमी के कारण जलीय जीवों का नैसर्गिक आवास भी विकास की बलि चढ़ गया है। मानव के आध्यात्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक विकास में सहभागी नदियों का अस्तित्व खतरे में हैं, जिसका पर्यावरणीय दुष्प्रभाव जलीय जन्तुओं की विलुप्ति एवं गरीबों के जीवीकोपार्जन पर पड़ रहा है। गंगोत्री से कानपुर तक के समस्त भाग में फीकल कन्टामिनेशन उपस्थित हैं जो नरौरा से लेकर जाजमऊ (कानपुर) तक में सर्वाधिक है। जल गुणवत्ता के विभिन्न मानक पैरामीटर्स की मात्रा नदी बहाव से आत्मनिर्भर प्रतीत होती है और मुख्य रूप से प्रदूषण भार पर निर्भर करता है जिससे स्पष्ट है कि नदी जल गुणवत्ता का अनुरक्षण और नदी में पर्यावरणीय बहाव दोनों अलग-अलग मुद्दे हैं। नदी जल गुणवत्ता नदी में बहाव का बिना विचार करते हुए अनुरक्षित किया जा सकता है बशर्ते कि बिन्दु स्रोत एवं अन्य प्रदूषण स्रोतों के मानव जनित प्रभाव को दूर कर लिया जाय। उक्त से स्पष्ट है कि नदी जल गुणवत्ता की पर्यावरणीय समस्या का निराकरण प्रदूषित पर्यावरणीय माध्यम या कारक में सुधार का प्रयास प्रदूषण नियंत्रण की आज की तकनीकों का प्रयोग करते हुए दूर किया जा सकता है। प्रदूषित नदी का उपचार करने के बजाय प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों का स्रोत पर ही नियंत्रण करना बेहतर रणनीति होगी। वैश्विक तकनीकों एवं स्थानीय परम्परागत समुदायों के ज्ञान का उपयोग प्राकृतिक संसाधनों अर्थात् भूमि, जल एवं वनस्पति का प्रबन्धन, गंगा नदी बेसिन प्रबन्धन योजना तैयार कर गंगा तन्त्र की गुणवत्ता को पुनस्र्थापित किया जा सकता है। इसके लिए हमें निम्न दो बातों पर ध्यान देना होगा - 1. नदी जल परियोजनाओं का नियोजन, नदी जल गुणवत्ता को ध्यान में रख कर तैयार किया जाय, अर्थात् नदी के किस क्षेत्र में नदी जल का अन्तरण सामाजिक सरोकारों, आर्थिक विकास व खाद्यान्न सुरक्षा में किया जा रहा है या संभावित है। 2. प्रदेश के अधिकांश मैदानी नदियों का जल स्तर व भूगर्भ जल स्तर एक दूसरे के साथ घनिष्ट संबंध रखते हुए एक दूसरे की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं। अतः नदी बेसिन के समग्र जल स्रोतों (सतही एवं भूमि जल) के सहयुक्त व एकीकृत उपयोग को ध्यान में रखकर ही नदी बेसिन प्रबन्धन योजना तैयार की जाय। ऽ गलती कहांॅ हुई? सीवेज और व्यवसायिक उत्प्रवाह को नदी या धारा में प्रवाहित करने की छूट देने के फलस्वरूप तथा मानकों के कड़ाई से पालन न होने के कारण आज नदियांॅ प्रदूषित हैं। पौराणिक ग्रन्थों में नदी मंे मलमूत्र विसर्जन धार्मिक अपराध माना जाता रहा है। गंगांपुण्यजलां प्राप्य त्रयोदश विवर्जयेत्। शौचमाचमनं सेकं निर्माल्यं मलघर्षणम्। गात्रसंवाहनं क्रीडां प्रतिग्रहणथोरतिम्। अन्यतीर्थरतिमचैवः अन्यतीर्थ प्रशंसनम्। वस्त्रत्यागमथाधातं सन्तारंच विशेषतः।। -ब्रम्हानन्दपुराण उत्तरी भारत नहर एवं जल निकास अधिनियम, 1873 में नदी या किसी धारा के जल प्रवाह मंे हस्तक्षेप या परिवर्तन (70.3) तथा, नहरी जल को अपमिश्रित या विकृत करने को अपराध माना गया है (70.4)। भारतीय दण्ड संहिता धारा 43 में भी प्राकृतिक या कृत्रिम नदी या जल सरणी की मात्रा या सम्पत्ति परिवर्तन पर क्षति पहुॅचाने को दण्डनीय अपराध माना गया है। सीवेज एवं व्यवसायिक उत्प्रवाह को भूमि पर ही निस्तारण करने का प्रावधान जल संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम, 1974 के प्रस्तर 17.1 (जे) इस आधार पर है कि नदी (धारा) वर्ष के अधिकांश समय में न्यूनतम बिरलीकरण करने में अक्षम होने पर तथा धारा में प्रभावी रूप से कम बहाव हो। परन्तु इस अधिनियम के प्रस्तर 17-1 (के) में सीवेज और व्यवसायिक उत्प्रवाह को उपचारोपरान्त निर्धारित मानक के अनुरूप प्र्रदूषण होने पर नदी या धारा में प्रवाहित करने की छूट हैं। अक्सर सीवेज जल का प्रयोग कृषि में करने के सुझाव दिये जाते हैं (17.1आई), जबकि पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 के शिड्यूल-6 में अशोधित सीवेज जल का सिंचाई कार्यों में रोकने का आदेश पर्यावरण एवं वन मन्त्रालय द्वारा राज्य सरकारों को वर्ष 2006 में निर्गत किया गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पहली गलती उद्योगों को नदियों में अपने उत्प्रवाहों को विसर्जित करने की मानक शर्तों के अधीन अधिनियम 1974 में प्रदत्त छूट का दुरूपयोग करते हुए अशोधित उत्प्रवाह सीधे नदी-नाले में हो रहा है। दूसरी गलती सीवेज ट्रीटमेेंट प्लान्ट का नदियों के किनारे लगाया जाना तथा क्षमता से अधिक सीवेज वाटर उठाने पर अथवा ट्रीटमेंट प्लान्ट विद्युत के अभाव में अक्रियाशील होने पर अशोधित जल नदी में डालने की परम्परा अक्सर देखने-सुनने को मिलती है। तीसरी गलती प्रदूषण का समाधान उसके बिरलीकरण में देखा जाना है। आप अवगत हैं कि शहरी सीवर, परम्परागत शोधन संयंत्रों की शोधन क्षमता बी0ओ0डी0 स्तर 20-25 मिग्रा/लीटर तक सामान्यतः सीमित है जबकि नदियों में नहाने योग्य पानी की गुणवत्ता का मानक अधिकतम 3 मिग्रा/लीटर है। अतः नदी में कम से कम 8 गुनी मात्रा में शुद्ध, स्वच्छ, निर्मल जल ;बी॰ओ॰डी॰ शुद्ध गुणवत्ता का हो तब कहीं शोधित सीवर नदी मंे डाला जा सकता है। इसे एक दूसरे उदाहरण के रूप में भी समझा जा सकता है। जल संस्थान द्वारा नदी से 10 लीटर उठाया जल 8 लीटर सीवर में बदल जाता है। इस 8 लीटर सीवर को नदी में विसर्जित करने के पूर्व उक्त स्थान पर नदी में 8 गुना शुद्ध जल (अर्थात् 8ग8त्र64 लीटर) बी॰ओ॰डी॰ लेविल 3 तक निर्धारित सीमा तक अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक होगा। अतः स्पष्ट है कि मात्र पेयजल में प्रयुक्त और नदी में प्रदूषकों का घनत्व कम करने के लिए स्वच्छ जल की आवश्यकता 64 गुना ;640ःद्ध पहुॅंच जायेगा जिसे पूरा करना एक दुःस्वप्न होगा अन्यथा नदियांॅ प्रदूषित ही रहेंगी। उपरोक्त से स्पष्ट है कि प्रदूषण निवारण का बेहतर तरीका शोधित या अशोधित सीवर का भूमि पर ही उपयोग है, नदी में विसर्जन नहीं। प्रदूषण कारक तत्वों का स्त्रोत पर ही नियंत्रण या निवारण उचित है, नदी में डालने के बाद पूरे नदी जल का शोधन या प्रदूषण का विरलीकरण हेतु प्रदूषित मात्रा का 8 गुना जल नदी में उपलब्ध कराना हमेशा सम्भव नहीं होने के कारण अव्यवहारिक है। मलमूत्र युक्त गन्दे नाले के एक लीटर काले पानी में 10 लीटर साफ पानी मिलाने से वह आचमन योग्य या नहाने योग्य नहीं कहलायेगा, केवल पानी का रंग बदल जाने से उसकी गन्दगी समाप्त नहीं हो जायेगी, कार्बनिक तत्व एवं कीटाणु उसमे मौजूद ही रहेंगे। प्रदूषणयुक्त पानी में मानव शरीर को नुकसानदेह रासायनिक, भारी धातु, वानस्पतिक एवं जीव-जन्तु परजीवी कृमियों के अण्डे, टायफाइड व डायरिया के बैक्टीरिया, पीलिया तथा अन्य प्रकार के विषाणु, पेचिस व लीवर में फोडे़ जैसे रोगों के जनक अमीवा, प्रोटोजोवा तथा फफूंद आदि विभिन्न स्वरूपों मंे विद्यमान एलर्जी संबंधी अनेक विषैले तत्वों के साथ बने रहते हैं जो नदी में नहाने, नदी जल पीने/आचमन करने या सम्पर्क में आने वाले मनुष्यों व पशुओं या अन्य जीवों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। नदी जल में प्रदूषण की मात्रा मानसून में- जब नदी में अधिकतम प्रवाह होता है तथा ग्रीष्म मंे जब न्यूनतम प्रवाह हो, दोनों ही स्थितियों में अधिक होता है। ऽ हम क्या करें? ऽ सभी ऋतुओं में नदी में पानी का पर्याप्त बहाव तथा जल गुणवत्ता मानकों के अनुरूप बनाये रखने हेतु गंगा एवं उसकी सहायक नदियों के जल ग्रहण क्षेत्रों में पर्यावरणीय प्रबन्धन के लिए एकीकृत ढंग से उपाय करना। ऽ नदियों के किनारे स्थित शहरों एवं कस्बों तथा उद्योगों से अनुपचारित उत्प्रवाह के नदी में डाले जाने पर पूर्ण रोक लगाना। ऽ तापीय ऊर्जा संयंत्रों तथा उद्योगों से कूलिंग वाटर जो गरम होकर नदियों के वनस्पतिजात तथा प्राणीजात एवं आजीविका के स्त्रोतों पर पड़ने वाले प्रभावों को नियंत्रित करने हेतु उपाय करना। ऽ भूमि के कटाव की रोकथाम और हरित क्षेत्रों में वृद्धि के लिए नदियों और जलाशयों के किनारे और जल ग्रहण क्षेत्रों के स्थानीय समुदायों के सहयोग से वृक्षारोपण हेतु विशिष्ट अभियान चलाना। इससे नदियों में कम गाद जायेगी (जिससे नदियां उथली नही होंगी तथा बाढ का पानी तटबंधों से नहीं फैलेगा) तथा भूजल रीचार्ज में वृद्धि होगी। नदियों मंें पर्यावरणीय बहाव नदियों मंे इतना जल होना चाहिए कि नदी लगातार रूप से बहे। नदी का स्वरूप विच्छेदित झील के रूप में न हो। रीवर बेड जलीय प्राणिजात को आवास प्रदान कर सके। नदी में क्षैतिज, लम्बवत तथा उध्र्वाधर जल सम्पर्क रहे। अतः नदी को वेस्ट लोड प्रवाहित करने का साधन नहीं समझा जाये। नदियों की स्वच्छता व पवित्रता की पुनःस्थापना हेतु अक्सर जनहित याचिकाओं से धार्मिक सरोकारों हेतु टेहरी बांध, भीमगौड़ा बैराज (हरिद्वार) तथा नरौरा बैराज से क्रमशः 12000, 2000 एवं 2500 क्यूसेक जल संगम (इलाहाबाद) पर स्नान करने हेतु उपलब्ध कराने के निर्देश न्यायालय द्वारा विगत वर्षाें में दिया जाता रहा है। अक्सर यह देखा गया है कि टेहरी से इलाहाबाद तक के लगभग 1000 किमी की दूरी में इतनी जलहानि हो जाती है कि संगम (इलाहाबाद) पर जाड़ों में प्रवाह के जल स्तर से बमुश्किल 10 सेमी की वृद्धि प्राप्त होती है। विगत वर्षों में दिसम्बर से फरवरी माह के बीच संगम के अपस्ट्रीम में स्थापित लिफ्ट पम्प नहरों, जिनका कुल निकास लगभग 1200 क्यूसेक है, उक्त अवधि में बन्द करने के फलस्वरूप तथा शारदा सहायक नहर प्रणाली की भद्री इस्केप से 400 क्यूसेक जल स्नान तिथियों के एक-दो दिन पूर्व छोड़ने मात्र से लगभग 10-15 सेमी गंगा नदी के जल स्तर में वृद्धि संगम स्थल पर सिंचाई विभाग द्वारा मापित की गई है। इस प्रकार उक्त अवधि मेें गंगा नदी संगम पर मात्र 20-25 सेमी जल स्तर में वृद्धि के कारण नदी जल के गुणवत्ता में उपर्युक्त वर्णित कारणों के अनुसार कोई परिवर्तन नहीं होता, अपिुत कुछ रंग साफ हो जाता है तथा प्रदूषण की मात्रा विरल हो जाती है। प्रदूषक तत्वों का मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुप्रभाव समाप्त नहीं होते और बदले में संचित जल, जिसका विद्युत उत्पादन, कृषि सुरक्षा एवं नदी जल आधारित जीविकोपार्जन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। हमें यह विचार करना चाहिए कि आखिर स्नान के लिए नदी जल की कितनी गहराई, पाट की चैड़ाई तथा जल का वेग वांछित है। हम जानते हैं कि नौ परिवहन हेतु नदी जल की चैड़ाई 30 मीटर तथा गहराई 03 मीटर वांछित होती है। इसी प्रकार हरिद्वार के ब्रह्माकुण्ड घाट पर स्नान हेतु मात्र 1-2 मीटर गहराई जल की आवश्यकता होती है। नौकायन एवं अन्य नदी जलक्रीड़ा के लिए नदी में गहराई एवं वेग का बहुत अत्यधिक होना खतरनाक होता है। हांॅ, डालफिन जैसे जलीय जन्तुओं के लिए डीप रिवर पूल की आवश्यकता पड़ती है। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (कानपुर, मुम्बई, दिल्ली, चेन्नई, जोरहट, इन्दौर, भोपाल) को मा0 प्रधान मंत्री जी ने गंगा नदी प्रबन्धन योजना तैयार करने के निर्देश दिये हैं जो दो वर्षों के भीतर निम्नवत् विवरण उपलब्ध करायेगा- 1- नदी विकास कार्य का नियोजन जिससे नदी तट की पारिस्थिकी खूबसूरत हो सके। 2-कम बहाव की अवधि में नदी के बहाव में वृद्धि करने के उपाय। 3-जल गुणवत्ता सुधार का विशिष्ट कार्य किये जाने की आवश्यकता। 4-जल-दोहन एवं जलाशयों मंे जल के भण्डारण कम करने के उपाय सुझाना। 5-बिन्दु स्त्रोतों से प्रदूषण तत्वों के विसर्जन पर प्रभावी नियंत्रण के उपाय। 6-ऐसे जल स्त्रोतो, जो अच्छी जल गुणवत्ता प्राप्त करने में अक्षम हैं, के उपयोग के सुझाव देना। 7-जल संरचनाओं को सुधारने के उपाय सुझायें, सिंचाई जल के दक्ष प्रयोग एवं कृषि कीटनाशकों के न्यूनतम उपयोग से अधिकतम कृषि उत्पादन प्राप्त करने के तरीकों का सुझाव, वहनीय सिंचाई एवं कृषि के तौर-तरीकों को विकसित करने के उपाय सुझाना। संगम इलाहाबाद में गंगा नदी जल बहाव बढाने के विकल्प एक अध्ययन के अनुसार गंगा और यमुना के संगम स्थल इलाहाबाद में लगभग 36.6 घन मीटर प्रति सेकेण्ड का बहाव 90 प्रतिशत निर्भरता पर उपलब्ध है। यदि गंगा का जल स्तर लगभग एक मीटर बढाना चाहेें तो इसके लिए निम्न विकल्पों पर विचार किया जा सकता हैः 1. संगम से 500 मी0 नीचे छतनाग के पास वीयर बनाकर अथवा 2. संगम से 90 कि0मी0 ऊपर कालाकांकर ;जनपद प्रतापगढ़ अैार संगम से 130 कि0मी0 ऊपर भिटौरा, जनपद फतेहपुर में बैराज बनाकर लगभग 200 मिलियन घन मीटर जल एकत्रित किया जा सकता है। इस प्रकार संगम के ऊपर दोनों जलाशयों से लगभग 51.4 घन मीटर प्रति सेकेण्ड अतिरिक्त बहाव मिलने के फलस्वरूप संगम पर गंगा नदी में न्यूनतम बहाव 88 घन मीटर प्रति सेकेण्ड गैर मानसून दिनों में उपलब्ध हो सकेगा जिससे संगम पर लगभग एक मीटर गहरा स्वच्छ जल स्नान हेतु उपलब्ध हो सकेगा परन्तु इसके लिए लगभग धन राशि रू0. 2596 करोड़ आंकलित व्यय खर्च करना होगा। निष्कर्ष नदी जल गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नदी में प्रदूषण लोड कम किया जाना ही प्रभावी तरीका हो सकता है। इसके लिए नदी प्रबन्धन योजना की आवश्यकता होती है। नदी को प्रदूषण मुक्त रखना है तो प्रदूषण कारक तत्वों को उन्हें पैदा होने के स्थान पर ही निराकरण कर दिया जाये। जल को पुनः उपयोग में लाकर तथा भूमि पर निस्तारण कर प्राकृतिक या सीवेज ट्रीटमेंट प्लान्ट के माध्यम से उपचारित कर जल मांग को कम करके ही नदी जल दोहन कम किया जा सकता है। नदियां सदा नीरा, अविरल एवं निर्मल धारा के रूप में स्वच्छन्द बहती रह कर जल सुरक्षा के साथ स्वास्थ्य सुरक्षा कर सकेगी। अक्सर यह कहा जाता है कि टिहरी बांध बन जाने से गंगा की अविरल धारा में कमी आ गई है। अतः टिहरी जलाशय से धार्मिक स्नानों के लिए पानी छोडा़ जाये। मैं जोर देकर यह कहना चाहूंगा कि देवप्रयाग पर जहां भागीरथी एवं अलखनन्दा नदी मिलकर गंगा नदी नाम धारण करती हैं वहां उनके जल का योगदान क्रमशः एक तिहाई और दो तिहाई मात्रा में है। अतः भागीरथी पर बने टिहरी जलाशय के अलावा अलखनन्दा पर वैसा ही जलाशय बनाकर अलखनन्दा नदी का व्यर्थ बहने वाले जल का सदुपयोग जल विद्युत, कृषि व अकृषि कार्यों तथा सूखा एवं अन्य धार्मिक स्नान कुम्भ के अवसरों पर गंगा नदी में जल खारिज कर प्राप्त किया जा सकता है। ु - पेयजल विशेषज्ञ, स्वारा





