धरती पर बढ़ रहा प्रदूषण, पर्यावरण हुई गयो नशाय। काटि रहे सब पेड़ बाग-बऩ, त्राहि-त्राहि मचि गई है भाय।। ़ तड़प रहे सब जीव-जन्तु हैं, रास्ता कबनो नाहिं सुझाय। एक दूसरे पर दोष लगावें, अपनो-अपनो रहे बनाय।। रोई-रोई पेड़़ करैं चिरौरी, मत काटो अब मेरी ड़ाल। काटि के मुझको पछिताओगे, बुला रहे हो अपनो काल।। बादल रोता हाथ जोड़ता, पेड़ ही सबको बनै सहाय। वाहन धुआँ उगलते चलते, शुद्ध हवा नाहिं मिल पाय।। नदियन को जल दूषित हुइगा, सबको मन रोवत है भाय। साफ-सफाई सब अपनाओ। पर्यावरण स्वच्छ हुई जाय।। गाय, भैंस सब पालैं हरदम, गोबर खाद से काम चलाय। ओजोन परत में छेद न होवे, पर्यावरण धरम बन जाय।। भू-जल भागि रहा हे नीचे, रोई-रोई का रहे पछिताय। सब मिल कर अब पानी बचाओ, अगली पीढ़ी तब बच पाय।। ऐसी जुगत करौ अब भैया, कृष्णानन्द रहे समझाय। सब मिल कर अब पेड़ लगाओ, धरती हरी-भरी होई जाय।। ु - बी 41, शिवपुरी, कल्याणपुर, लखनऊ।





