Tuesday, March 25, 2014

ये प्रलयंकारी दृश्य हमें चेतावनी दे रहे हैं - अवधेश कुमार

सबका एक ही स्वर। उत्तराखंड में जल प्रलय की ऐसी विनाशलीला कभी नहीं देखी गई। निस्संदेह, उत्तराखंड का दृश्य भयावह है, उसका बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है। न जाने कितने हजार लोग जलप्लावन में बह गए, कितने मकानों, दुकानों, वाहनों, जानवरों को जल की प्रलयंकारी धारा ने अपने में समाहित कर लिया इसकी पूरी गणना कभी संभव नहीं हो सकती। चारों ओर केवल बरबादी का आलम। एक दो नहीं हिमालय से निकलती लगभग सारी नदियांें मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी, गौरी, काली, कोशी, गंगा, यमुना की धाराएं इतनी विकराल हो गईं कि मनुष्य के नाते लोगांें के पास अपना सब कुछ स्वाहा होते और अपनोें को खोते देखने के अलावा कोई चारा ही नहीं रहा। जब समाचार चैनलों के माध्यम से आतीं तस्वीरें इतनी डरावनीं हंैं तो जिनके सामने वे घटित हुई होंगी उनकी दशा कैसी हुई होगी इसकी कल्पना करिए। पहाड़ काटकर बनाईं गईं सड़कें ऐसी तबाह हुई हैं कि बारिश थमने के बावजूद लोगों तक पहुंचना और उन्हें सड़क मार्ग से निकालना असंभव बना रहा। न जाने कितने स्थानों पर सड़के भयानक खाइयों में बदल चुकीं हैं। राज्य प्रशासन इसे यदि उत्तराखंड सुनामी का नाम दे रहा है तो इसे अतिशयोक्ति नहीं कहा जा सकता है।
हालांकि भारत में बाढ़ का प्रकोप कोई नई बात नहीं है। स्वयं उत्तराखंड को इसकी भयावहता का अनुभव है। 2010 में ही उत्तरकाशी के बाढ़ ने भयानक विनाशलीला मचाई थी। पर इतने व्यापक पैमाने पर, एक साथ इतनी नदियों द्वारा विनाश के ऐसे दिल दहलाने वाले दृश्य कभी न देखे गए। जो लोग 16 जून के पूर्व केदारनाथ धाम से लौट आए होंगे वे यदि कुछ दिनों बाद वहांँ जाएं तो उनके लिए यह विश्वास करना मुश्किल होगा कि यह उनकी श्रद्धा का वही केन्द्र है जहां वे पहले आ चुके हैं। मुख्य मंदिर को छोड़कर शेष हिस्से लगभग ध्वस्त हो चुके हैं। मंदिर भी क्षतिग्रस्त हुआ है। यहाँं दो तिहाई भवन ढहने के साथ ही गौरीकुंड व केदारनाथ के बीच यात्रा के प्रमुख पड़ाव रामबाड़ा का नामोनिशान मिट चुका है। ऐतिहासिक शंकराचार्य समाधि स्थल मलबे में दब चुका है। कहा जाता है कि इसको ठीक करने में कई साल लग सकते हैं।
उत्तराखंड भारत के पारिस्थितिकी, पर्यावरण संतुलन और संरक्षण का सर्वप्रमुख आधार तो है ही आध्यात्मिक परंपरा, सभ्यता-संस्कृति का मुख्य स्रोत और इसकी पहचान का प्रमुख क्षेत्र रहा है। हिमालय की गोद, उससे निकलती नदियांँ, पहाड़, वनस्पतियांँ, सदियों से साधकों, रचनाकारों का वास, चिंतन-मनन और लेखन का स्थल रहा है। हरिद्वार को तो केवल प्रवेश द्वार माना जाता है जहाँं से चार धाम की यात्रा आरम्भ होती है। इस तरह उत्तराखंड की तबाही का आयाम आम वहां के आम जन-जीवन और हजारों पर्यटकों व तीर्थयात्रियों के लिए अनर्थकारी साबित होने के साथ हमारी अध्यात्म परम्पराओं, सभ्यता-संस्कृति के विनाश तक विस्तारित होता है। कहा जा सकता है कि प्रकृति के प्रकोप के सामने हमारे कोई बस नहीं, वहीं पर मनुष्य की शक्ति की दयनीय सीमाएंँ साबित होतीं हैं। अगर एकाएक जल सैलाब उमड़ जाए तो कोई क्या कर सकता है? हमारे हाथ में केवल स्वयं को बचाने, राहत, बचाव और फिर पुनर्वास का ही विकल्प बचता है। निस्संदेह, बड़े जलाप्लावन, बारिश और तूफान से निपटना सम्भव नहीं। कुछ विनाश इसी श्रेणी के हैं। समय पूर्व और औसत से ज्यादा बारिश को विनाशलीला का कारण बताया जा रहा है। उत्तराखंड में 16 जून को ही 24 घंटे के भीतर 220 मिलीलीटर से ज्यादा बारिश हुई, जो सामान्य से 300 प्रतिशत ज्यादा है।
किन्तु यह एकपक्षीय सच है। उत्तराखंड को विकास के नाम पर जिस तरह तबाह-बरबाद किया गया है उसमें विनाश की सम्भावनाएं कई गुणा बढ़ गईं हैं। पूरे उत्तराखंड में पहाड़ों पर, नदियों के किनारे और पेटी के अंदर बनाए गए रिसोर्ट, होटलों, अपार्टमेंटों, आम मकानों को देखने से ही भय पैदा होता है। आखिर हिमालय जैसा कच्चा पहाड़ अपने ऊपर कितना वजन बरदाश्त कर सकता है? सीमेंट और कंक्रीट के कंकाल को सहने और झेलने की क्षमता पहाड़ों में नहीं होतीं। इसीलिए वहां घर प्रायः लकडि़यों के बनाए जाते थे। जिनके वजन कम होते थे, इसलिए बाढ़ और तूफान आया भी तो तबाही का आयाम अत्यन्त सीमित। उनका पुनर्निर्माण भी आसान। धीरे-धीरे निर्माण कंपनियों ने प्रकृति द्वारा प्रदत्त स्वर्ग को कमाई का ऐसा जरिया बनाया, सरकारें और सरकारी महकमों ने विकास के नाम और लालच में उनको छूट दी, स्थानीय लोगों में कुछ विवश होकर सब कुछ बदलते देखते रहे या कुछ लालच में फंसकर स्वयं इसके अंग बन गए। जाहिर है, जब अट्टालिकाएंँ बनेंगी तो फिर विनाश का परिमाण भी बढ़ेगा। यही हाल सड़कों और बांधों का है। सड़कों ने हमारे लिए उन इलाकों में जाना सुगम बना दिया जहाँं पहुंचने की कथाएं इतिहास की साहसी गाथाओं मे गिनी जाती थीं। सड़कों के लिए पहाड़ों की कटाई ने उनको स्थायी रुप से घायल किया। समय-समय पर वहांँ से दरकते पत्थर और मिट्टियाँं इसका प्रमाण देतीं रहतीं हैं कि आने वाले समय में ये विनाश का कारण बनते हैं।
वर्ष 2005-06 में राज्य में पंजीकृत वाहनों की संख्या 83,000 थी, जो 2012-13 में बढ़कर 1 लाख 80 हजार हो गई हैं। इसमें तीर्थयात्रियों, पर्यटकों के आवागमन का मुख्य जरिय बने कार, जीप एवं टैक्सी जैसे वाहनों की संख्या वर्ष 2005-06 में करीब 4000 थी जो 2012-13 में 40 हजार हो गई। यह दस गुना बढ़ोŸारी है। जितनी संख्या में वाहन और लोग पहाड़ों को रौदंेगे भू-स्खलन उतना ही ज्यादा होगा। जब उतनी ज्यादा संख्या में लोग वहां पहुंचने लगे तो उनके वास और सुख सुविधाओं की संरचनाएंँ फिर विकसित करनी पड़ीं और इन सबने संतुलन को नष्ट किया है। विनाश का परिमाण बढ़ा और उसे झेलने और रोकने की शक्ति क्षीण हो गई। पेड़ों की कटाई और खनन माफिया द्वारा पहाड़ों के लिए दीवालों का काम करने वाले पत्थरों की कटाई ने मिट्टी, पानी रुकने और सोखने का आधार काफी हद तक नष्ट किया है। कृत्रिम बांधों ने भी नदियों और पहाड़ों के सन्तुलन को चरमरा दिया है।
हम आपदा प्रबन्धन, सरकार की अक्षमता और आपराधिक लापरवाही को निशाना बना सकते हैं। बनाना भी चाहिए। आखिर जब भारत में अब हर वर्ष कई क्षेत्रांें में जल प्लावन, तूफान जैसी आपदाएं आ रहीं हैं हमारा आपदा प्रबन्धन तंत्र उसके अनुरुप विकसित न होना चिंताजनक है। वैसे आपदा प्रबधन सरकारी तंत्र के साथ धीरे-धीरे हमारी संस्कृति का अंग बनना चाहिए। हमारे यहां परम्परागत आपदा प्रबन्ध के स्थानीय तंत्र विकसित थे, किन्तु इन महाकाय निर्माणों ने अपने सामने समुदाय की क्षमता को बिल्कुल खत्म जैसा कर दिया है। खैर, राष्ट्रीय आपदा राहत बल या एनडीआरएफ (नेशनल डिजास्टर रिस्पान्स फोर्स) की भूमिका विनाश से निपटने की है। सेना के जवान भी राहत बचाव करते हैं। कुल मिलाकर 22 से 25 हेलीकॉप्टर राहत कार्य में जुटे जो बचे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और मृतकों के शव निकालने में सफल रहे हैं। किन्तु इन सबकी भूमिका राहत और बचाव की है।
विकास के नाम पर भारत के मस्तक उत्तराखण्ड को जिस तरह कुचल दिया गया है उसे दुरुस्त कौन करेगा? उत्तराखण्ड अगर भारत का मस्तक है तो वहांँ  महाकाय निर्माण वैसे ही हैं जैसे मस्तक को मार-मार कर लहूलुहान कर दिया जाए और वे घाव जगह-जगह सूजकर अलग-अलग आकार में दिखने लगें।
अलकनन्दा, मन्दाकिनी, भागीरथी फिर आगे गंगा ने अपना रौद्र रुप पहले भी दिखाया है। लेकिन उस समय न इतने निर्माण थे, और न इतनी संख्या में यात्री। इसलिए विनाश काफी कम होते थे। पहले इनके बीच 20 से 40 वर्ष का अन्तर होता था। वर्ष 2008 के बाद हर वर्ष यानी 2009, 2010, 2011, 2012 और अब 2013 में भी छोटी-बड़ी बाढ़ आ रही हैं। क्या ये विनाश की चेतावनी नहीं दे रहे हैं? आप देख लीजिए अति संवेदनशील वासों की संख्या बढ़ती जा रही है। 2010 में ऐसे वासों की संख्या 233 थी, जो लगभग 450 हो गई और सम्भव है इस प्रकोप के बाद इनकी संख्या और बढ़े। कितने लोगों को विस्थापित कर कहाँ और कैसे बसाया जाएगा? विकास के नाम पर हुए विनाश की बलि आखिर कितने गांव, शहर, लोग, पशु-पक्षी, वनस्पतियाँं चढ़ेंगी? खुद हमें ही ठहरकर सोचना होगा कि आखिर हम विकास क्यों चाहते हैं और कैसा विकास चाहिए? अगर यातायात से लेकर संचार, ऊर्जा, सारी सुख सुविधाओं से लैश चमचमाते भवन, भोग विलास की सारी सामग्रियाँ चाहिए तो फिर ऐसे ही विनाशलीला के सतत् दुष्चक्र में फंसने के लिए हमंे तैयार रहना चाहिए। अगर नहंीं तो फिर थोड़ा पीछे लौटकर प्रकृति के अनुसार जीने और रहने का अभ्यास डालना होगा। यही दो विकल्प हमारे पास हैं। इसके बीच का कोई रास्ता हो ही नहीं सकता। 
- अवधेश कुमार, ई. 30, गणेश नगर, पांडव नगर काम्प्लेक्स,दिल्ली-110092,
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