Saturday, March 8, 2014

कामधेनु गाय! अभी भी है - गोपाल मोहन उपाध्याय


कहते हैं, वशिष्ठ ऋषि के पास एक कामधेनु गाय थी। 
उनको जब भी दूध की आवश्यकता होती, तुरन्त कामधेनु गाय से मिल जाता था। एक बार विश्वामित्र जी वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में अपने अनेक शिष्यों के साथ पहुँचे, वशिष्ठ जी ने तत्काल कामधेनु से दूध प्राप्त कर, अनेक पकवान बनाये और भरपूर सभी अतिथियों का स्वागत किया। कामधेनु का यह चमत्कार देख कर   विश्वामित्र को कामधेनु गाय पर लालच आ गया और वशिष्ठ जी से उसकी माँग भी कर दी।
यह कहानी हम सब वर्षों से पढ़ते आये हैं और सोचते रहे हैं कि उस समय ऐसे चमत्कार करने वाली गायें होती होंगी। परन्तु, यदि आज आप से कोई किसी कामधेनु होने का दावा करे तो निश्चित ही विष्मयकारी होगा। पर! यह विष्मयपूर्ण कथन, सच है।
इसी माह 27 अक्टूबर को जब हम और लोक भारती के संगठन सचिव बजेन्द्र जी जीरो बजट प्राकृतिक कृषि पद्धति द्वारा की जा रही खेती देखने बलिया जिले के रसड़ा विकास खण्ड के विधूड़ी गाँव में बृजनाथ वर्मा के घर पहुँचे, उनका खेत देखा और वह शाहीवाल नस्ल की गायें देखीं, जिनके गोबर-गो मूत्र के बल पर वह जीरो बजट प्राकृतिक खेती सफलतापूर्वक कर पा रहे हैं। उसके बाद क्षेत्र के कुछ जागरूक किसानों की गोष्ठी थी, जो इस कृषि पद्धति के विषय में जानना चाहते थे। यह गोष्ठी लगभग पाँच बजे तक चली, उसके बाद कुछ प्रमुख लोगों व प्रयोगधर्मी कृषकों से अगले वर्ष मई महीने में बस्ती जिलें में होने वाले जीरो बजट प्रशिक्षण वर्ग के सम्बन्ध में चर्चा हुई, तब तक सायंकालीन चाय का समय हो गया।
लगभग 10-15 लोगों की चाय के लिए दूध की आवश्यकता थी। उसी समय बृजनाथ वर्मा ने अपने कर्मचारी को कहा, गंगा से दूध दुह लो। हम सब यह देख आश्चर्य चकित रह गये, क्योंकि जो गाय 2008 में आखिरी बार व्यायी थी, तब से न गाभिन हुई और न पुनः व्यायी, पर! आज वह अतिथियों के लिए दूध दे रही थी। उस समय उस गाय ‘गंगा’ से जो दूध दुहा गया, उसकी मात्रा लगभग 2 ली॰ रही होगी।
गंगा गाय के इस रहस्य को जानने के लिए सभी उत्सुक थे, अतः ब्रजनाथ वर्मा ने उस गंगा गाय के सम्बन्ध में बताया, ‘‘सन् 2002 में रसायन मुक्त खेती के लिए प्रयत्नशील था, तब किसी ने कहा, उसके लिए एक देशी गाय पालनी होगी। अतः मैं गाय की खोज में निकला और इस गाय को दस हजार रूपये में ले आया। उस समय जिसके पास से इस गाय को खरीदा था, मात्र आधा ली॰ दूध सुबह और शाम को दिया था और बहुत कमजोर थी, पर नस्ल अच्छी जान कर खरीद लिया। परन्तु हमारे घर पर एक सप्ताह में