Sunday, March 2, 2014

बर्तन धोने की इकोफ्रैन्डली तकनीक

जल प्रदूषण आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है। विकास के दौर में हम सब सुविधाओं के पीछे इस कदर दौड़ पड़े हैं कि अपना ही नफा-नुकसान नहीं सोच पा रहे हैं। हमारी ही गैर जिम्मेदाराना आदतों के कारण आज जल प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है। कपड़े ही नहीं तो  आज हम सब वर्तन धोने मे भी डिटर्जेन्ट का प्रयोग करते हैं, जिससे पानी का भी अधिक व्यय होता है और प्रयोग किया गया पानी भी प्रदूषित हो जाता है। इस बाजारवाद में हम पुरानी परंपरायंे भी भूलते जा रहे हैं, जैसे- बाल या ऊनी कपड़े धोने के लिए रीठे का प्रयोग। संभव है कि भविष्य में यह पुरानी परंपरायें ही फिर से बाजार के द्वारा हमें नये रूप में परोसी जायें, जैसा कि आज सभी उपभोक्ता वस्तुओं के साथ हर्बलवाद का प्रचलन हो रहा है। 
इस संकट के चिन्तन में से कुछ पुरानी परंपरायें सामने आयीं, जो इस प्रकार हैं-
ऽ केले के पत्तों, मक्का के डण्ठलों और गाय गोबर की कण्डी की राख का उपयोग- पहले देश के लगभग सभी क्षेत्रों में वर्तन धोने के लिए राख का प्रयोग सर्व सामान्य था। उसी प्रकार केले के पत्तों, मक्का के डण्ठलों या गाय गोवर की कण्डी कीे राख का उपयोग वर्तन धोने के लिए किया जा सकता है, उससे वर्तनों पर जो खरोंच लगने का खतरा रहता है वह भी नहीं होगा और वर्तन साफ होने के साथ ही  उपयोग किया गया जल भी प्रदूषित नहीं होगा। सर्फ की भांति यदि केले की राख के साथ गुनगुने पानी में कपड़े भिगाकर कुछ देर रख दिये जायें और फिर मलकर साफ पानी से धोये जायंे तो जल को प्रदूषित कियें बिना ही  कपड़े स्वच्छ व चमकदार हो जायेंगे। मक्का की राख से कपड़े धोने के लिए, एक बाल्टी के ऊपर टोकरी में घास के ऊपर राख विछाकर ऊपर से पानी छिड़कने से जो पानी नीचे बाल्टी में जमा हो जाता है, उसे सर्फ के पानी की भाति कपड़े धोने में प्रयोग किया जा सकता है।