अविवेक, असंयम, अस्थिरता,
अधमाधम हैं ये अघ सारे।
आचारण शुद्ध दे आत्मज्ञान,
आनन्द स्वजीवन को वारे।।
इन्द्रिय निग्रह से इष्टदेव,
हर इच्छित लक्ष्य पूर्ण करते।
ईमानदार प्रिय ईश्वर का,
ईर्षालु दुःख सहकर मरते।।
उर में उŸाम उद्यान खिले,
उपदेश उच्च ऋषि हैं करते।
ऊषा-रवि सी ऊष्मा भर मन,
नित प्रति ऊँचा ऊध्र्वांग करे।।
एकता एक धन जीवन का हो
एक निष्ठ निज कर्म करो।
ऐश्वर्य ऐंठ तज द्वैष आदि
ले ऐक्य भाव दुख देश हरो।।
ऋण तीन पिता गुरू माता के,
मानव जीवन पर हैं रहते।
ओंकार ओम जप ओम हरी,
अघ पुंज न क्यों मन के दहते।।
औरों का व्यर्थ न मुख ताको,
औचित्यपूर्ण ही भाव भरो।
अन्तर के सकल विकार मिटें
अन्तर्यामी से विनय करो।।
कर्तव्य करो कल्याणक बन,
तो कृपा कृपानिधि हैं करते।
खल भी सुधरें खग मृग जीवें
हो ख्याति न क्यों ऐसा करते।।
गुणगान गजानन के गाओ,
गौरव गरिमा गृह हैं मिलते।
हो घृणा घमंड घिनौने से,
यश-रवि लख मन सरसिज खिलते।।
चन्द्रमा चारू सा कर चरित्र,
कर चिन्तन चरण मुरारी का।
छल छद्म नहीं हो छुआछूत,
तो छाये सुख निधि क्यारी का।।
जपिये जगदीश ज्योतिकर को,
जगमग-जगमग जीवन चमके।
झगड़े झाँसे झंझट त्यागो,
जीवन झिलमिल झिलमिल दमके।।
टकराव अनीति कुरीति से हो,
टन-टन मन मन्दिर घंट करें।
ठहरे सदवृत्ति ठिठोली कर,
ठानो उर में सद्भाव भरे।।
डरिये न डाकिनी के डर से,
‘डमरूधर’ का नित ध्यान करो।
ढ़प ढ़ोल गर्व की मत पीटो,
अघहित निज मन को ढ़ाल करो।।
तप त्याग करे तम तोम नष्ट,
अब नहीं क्रोध में ही तनिये।
थल पूजन थाल आरती सज,
प्रभु चरणों के हित अनि बनिये।।
दुख दीन दुखी के दूर करो,
फिर दीनबन्धु हरि को भजिये।
धर धर्म-कर्म का ध्यान नित्य,
मन धैर्य धीरता से सजिये।।
नर निर्बल तथा निहत्थे पर,
प्रिय! मत नृशंसता भाव भरो।
पावन स्वदेश से प्रीति पाल,
शुचि प्रगति पताका हाथ धरो।।
फर-फर-फर-फर फहरे केतन,
निज कर से ऊँचा उसे करोे।
बच बन्धु! रहें बठमारों से,
बाधाओं को नित दूर करो।।
भारत की रक्षा हित भाई!
भारी भय संकट भी सहिये।
मन मंगल मंत्रोच्चार करे,
मृदुता से मानव-दुख दहिये।।
यश हो यथार्थ अर्जित हर पल,
सद्-यत्न निरन्तर यही रहे।
रक्षार्थ राष्ट्र हो जीवन यह,
बस राष्ट्र हेतु ही रक्त बहे।।
लक्षण दश धर्म ललाम गहें,
लत लालच का परित्याग करें।
लड़ना भिड़ना तज आपस में,
ललकार शत्रु के प्राण हरें।।
वैभव विभूति पा विजयी हों,
यह विस्तृत विश्व विहस निरखें।
शुचि शोध करे विज्ञान ज्ञान,
गुणवत्ता को भी तो परखें।।
षट शास्त्रों का सब पाठ करें,
षडयंत्र विरोधी ध्यान रहे।
संस्कृति अक्षुण हो भारत की,
यह सस्य श्यामला भूमि रहे।।
हमला न देश पर होवे हरि!
सब आतंकी भी दूर भगें।
क्षमणीय रहें, गह क्षात्र-धर्म,
उर राष्ट्र भक्ति के भाव जगें।।
त्रासित हों खग मृग जन्तु नहीं,
मन में ‘त्रिनेत्र’ का ध्यान रहे।
ज्ञानोदय से मन-कुंज सजे,
सुन्दर सुज्ञान की गंग बहे।।
यह वर्ण मालिका जीवन की,
संकट बाधायें दूर करें।
ला हर्षोल्लास स्वजीवन में,
सब कष्ट कलुषता क्लेश हरे।।
अपनायीं अगर पंक्तियां ये,
तो मोद वाटिका महकेगी।
यश वैभव गौरव की ज्योत्सना,
मन में ‘अबोध’ के चमकेगी।।
- ‘चन्द्रा-मण्डप’ 370/27 हाता नूरबेग, संगमलाल बीथिका सआदतगंज, लखनऊ-226003
अधमाधम हैं ये अघ सारे।
आचारण शुद्ध दे आत्मज्ञान,
आनन्द स्वजीवन को वारे।।
इन्द्रिय निग्रह से इष्टदेव,
हर इच्छित लक्ष्य पूर्ण करते।
ईमानदार प्रिय ईश्वर का,
ईर्षालु दुःख सहकर मरते।।
उर में उŸाम उद्यान खिले,
उपदेश उच्च ऋषि हैं करते।
ऊषा-रवि सी ऊष्मा भर मन,
नित प्रति ऊँचा ऊध्र्वांग करे।।
एकता एक धन जीवन का हो
एक निष्ठ निज कर्म करो।
ऐश्वर्य ऐंठ तज द्वैष आदि
ले ऐक्य भाव दुख देश हरो।।
ऋण तीन पिता गुरू माता के,
मानव जीवन पर हैं रहते।
ओंकार ओम जप ओम हरी,
अघ पुंज न क्यों मन के दहते।।
औरों का व्यर्थ न मुख ताको,
औचित्यपूर्ण ही भाव भरो।
अन्तर के सकल विकार मिटें
अन्तर्यामी से विनय करो।।
कर्तव्य करो कल्याणक बन,
तो कृपा कृपानिधि हैं करते।
खल भी सुधरें खग मृग जीवें
हो ख्याति न क्यों ऐसा करते।।
गुणगान गजानन के गाओ,
गौरव गरिमा गृह हैं मिलते।
हो घृणा घमंड घिनौने से,
यश-रवि लख मन सरसिज खिलते।।
चन्द्रमा चारू सा कर चरित्र,
कर चिन्तन चरण मुरारी का।
छल छद्म नहीं हो छुआछूत,
तो छाये सुख निधि क्यारी का।।
जपिये जगदीश ज्योतिकर को,
जगमग-जगमग जीवन चमके।
झगड़े झाँसे झंझट त्यागो,
जीवन झिलमिल झिलमिल दमके।।
टकराव अनीति कुरीति से हो,
टन-टन मन मन्दिर घंट करें।
ठहरे सदवृत्ति ठिठोली कर,
ठानो उर में सद्भाव भरे।।
डरिये न डाकिनी के डर से,
‘डमरूधर’ का नित ध्यान करो।
ढ़प ढ़ोल गर्व की मत पीटो,
अघहित निज मन को ढ़ाल करो।।
तप त्याग करे तम तोम नष्ट,
अब नहीं क्रोध में ही तनिये।
थल पूजन थाल आरती सज,
प्रभु चरणों के हित अनि बनिये।।
दुख दीन दुखी के दूर करो,
फिर दीनबन्धु हरि को भजिये।
धर धर्म-कर्म का ध्यान नित्य,
मन धैर्य धीरता से सजिये।।
नर निर्बल तथा निहत्थे पर,
प्रिय! मत नृशंसता भाव भरो।
पावन स्वदेश से प्रीति पाल,
शुचि प्रगति पताका हाथ धरो।।
फर-फर-फर-फर फहरे केतन,
निज कर से ऊँचा उसे करोे।
बच बन्धु! रहें बठमारों से,
बाधाओं को नित दूर करो।।
भारत की रक्षा हित भाई!
भारी भय संकट भी सहिये।
मन मंगल मंत्रोच्चार करे,
मृदुता से मानव-दुख दहिये।।
यश हो यथार्थ अर्जित हर पल,
सद्-यत्न निरन्तर यही रहे।
रक्षार्थ राष्ट्र हो जीवन यह,
बस राष्ट्र हेतु ही रक्त बहे।।
लक्षण दश धर्म ललाम गहें,
लत लालच का परित्याग करें।
लड़ना भिड़ना तज आपस में,
ललकार शत्रु के प्राण हरें।।
वैभव विभूति पा विजयी हों,
यह विस्तृत विश्व विहस निरखें।
शुचि शोध करे विज्ञान ज्ञान,
गुणवत्ता को भी तो परखें।।
षट शास्त्रों का सब पाठ करें,
षडयंत्र विरोधी ध्यान रहे।
संस्कृति अक्षुण हो भारत की,
यह सस्य श्यामला भूमि रहे।।
हमला न देश पर होवे हरि!
सब आतंकी भी दूर भगें।
क्षमणीय रहें, गह क्षात्र-धर्म,
उर राष्ट्र भक्ति के भाव जगें।।
त्रासित हों खग मृग जन्तु नहीं,
मन में ‘त्रिनेत्र’ का ध्यान रहे।
ज्ञानोदय से मन-कुंज सजे,
सुन्दर सुज्ञान की गंग बहे।।
यह वर्ण मालिका जीवन की,
संकट बाधायें दूर करें।
ला हर्षोल्लास स्वजीवन में,
सब कष्ट कलुषता क्लेश हरे।।
अपनायीं अगर पंक्तियां ये,
तो मोद वाटिका महकेगी।
यश वैभव गौरव की ज्योत्सना,
मन में ‘अबोध’ के चमकेगी।।
- ‘चन्द्रा-मण्डप’ 370/27 हाता नूरबेग, संगमलाल बीथिका सआदतगंज, लखनऊ-226003





