Sunday, March 2, 2014

उ॰प्र॰ पर्यावरण नीति - 2010-

प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित पंच पदार्थ - क्षिति, जल, पावक, गगन ओर समीर ही पर्यावरण का मुख्य ढ़ांचा बनाते हैं। मिट्टी, जल, वायु और जीव-जन्तु इत्यादि सभी पर्यावरण के अंग हैं। जब किन्हीं कारणों से इनका तालमेल बिगड़ जाता है, तो पर्यावरण का संतुलन भी बिगड़ जाता हैं। मानव अस्तित्व के लिए पर्यावरण को सुरक्षित रखने हेतु विश्वव्यापी समस्याओं से चिन्तित होकर ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1972 में 5 से 15 जून तक स्टाकहोम में मानव पर्यावरण सम्मेलन का आयोजन किया गया था और उसमें घोषणा की गई थी कि ‘‘मानव को स्वतन्त्रता, समानता और जीवन की उपयुक्त दशाओं के साथ गुणवŸाा युक्त पर्यावरण में सम्मानजनक और खुशहाल जीवन जीने का मौलिक अधिकार है तथा वर्तमान और भावी पीढि़यों के लिए पर्यावरण की सुरक्षा और संबर्धन करना मानव का परम कर्तव्य है।’’ स्टाकहोम सम्मेलन के बाद हमारे देश में पर्यावरण सुरक्षा हेतु अनेक कदम उठाये गये। पर्यावरण की रक्षा के लिए आवश्यक प्राविधान किये जाने हेतु वर्ष 1976 में संविधान में 42वें संशोधन के माध्यम से राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 48-क और नागरिकों के मूल कर्तव्यों में अनुच्छेद 51-क (छ) का समावेश किया गया। अनुच्छेद 48-क द्वारा राज्य का यह कर्तव्य निर्धारित किया गया कि ‘‘राज्य देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संबर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।’’ इसके साथ ही 51-क (छ) में प्रत्येक नागरिक को यह दायित्व सौंपा गया कि ‘‘वह प्राकृतिक पर्यावरण, जिसके अन्र्तगत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, की रक्षा करे और उसका संबर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे।’’ अतः राज्य सरकार तथा नागरिकों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझते हुए पर्यावरणीय गुणवŸाा को बनाये रखने तथा उसमें बढ़ोŸारी के प्रति निरन्तर प्रयास करना होगा। प्रदेश में पर्यावरणीय अपघटन की रोकथाम एवं सतत् विकास सुनिश्चित् करने हेतु राज्य के वर्तमान एवं भावी विकास कार्यक्रमों में अवरोध उत्पन्न किये बिना मार्ग प्रशस्त करने हेतु उŸार प्रदेश राज्य पर्यावरण नीति 2010 प्रदेश में स्वच्छ एवं संतुलित पर्यावरण बनाये रखने में सार्थक सिद्ध होगी। 2.0 - प्रदेश में पर्यावरणीय समस्याऐं- पर्यावरण को अपघटित करने में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधनों के अनियन्त्रित दोहन, अनियोजित औद्योगीकरण व नगरीकरण, बाहनों की निरन्तर बढ़ती संख्या, नदियों, झीलों व तालावों इत्यादि में गिरते औद्योगिक व नगरीय उत्प्रवाह व कूड़ा-कचरा, रसायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के खेती में असंतुलित उपयोग व बढ़ते उपभोक्तावाद की प्रमुख भूमिका है। वायु, जल, मृदा व ध्वनि प्रदूषण, भूक्षरण, भूस्खलन, चारे और ईंधन की कमी जैसी विविध व बहुआयामी एवं दूरगामी प्रभाव वाली समस्यायें उत्पन्न हो रही हैं। अपने प्रदेश में पर्यावरणीय समस्यायें मूलतः दो कारणों से पैदा होती हो रही हैं। पहला कारण अनियोजित विकास गतिविधियां और दूसरा कारण अनियन्त्रित जनसंख्या वृद्धि। यह सिद्ध हो चुका है कि गरीबी, जनसंख्या वृद्धि तथा पर्यावरणीय अपघटन परस्पर सहयोग करते हैं। यह बात निरन्तर स्पष्ट होती जा रही है कि पर्यावरण की निम्न गुणवŸाा से मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। विश्व बैंक द्वारा किये गये अध्ययन के अन्र्तगत वायु एवं जल प्रदूषण के कारण प्रदेश में प्रत्येक वर्ष लगभग 94 लाख मानव वर्षों की क्षति का अनुमान है, जिसकी आर्थिक लागत लगभग रू0 6170 करोड़ आकलित की गई जो विŸाीय वर्ष 2000-01 के प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद रू0 1091.56 अरब का 5.6 प्रतिशत है। इससे यह स्पष्ट है कि घरेलू वायु प्रदूषण को कम करने, सुरक्षित पेयजल स्रोतों की सुरक्षा, स्वच्छता उपाय, संशोधित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन प्रणाली, जैव विविधता संरक्षण संबन्धी विभिन्न चिन्ताजनक समस्याओं की घटनाओं को कम करने हेतु प्रभावी अवसर प्रदान करने के लिए एक सुव्यवस्थित पर्यावरणीय प्रबन्धन की महती आवश्यकता है। 3.0 - पर्यावरणीय नीतियां, अधिनियम और संस्थागत ढ़ंाचा- जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत का क्षरण और वनों का कटान तथा जैव विविधता का क्षय जैसे पर्यावरणीय मुद्दे विश्वव्यापी पर्यावरणीय चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं। इनके निराकरण हेतु हमारे देश में केन्द्र एवं राज्य स्तर पर विभिन्न नीतिगत, विधिक एवं संस्थागत उपाय किये गये हैं। केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गयें अधिकतर अधिनियमों एवं नीतियों के क्रियान्वयन का दायित्व राज्य सरकार के विभिन्न विभागों व उपक्रमों को सौंपा गया है। 3.1- संस्थागत ढ़ांचा - उ॰प्र॰ सरकार द्वारा वर्ष 1976 में पर्यावरण निदेशालय का गठन किया गया तथा जल एवं वायु प्रदूषण नियन्त्रण हेतु पूर्व में गठित ‘‘जल प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण वोर्ड’’ का नाम बदलकर ‘‘उ॰प्र॰ प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड’’ कर दिया गया। पर्यावरण निदेशालय एवं उ॰प्र॰ प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के अलावा प्रदेश के अन्य विभागों एवं सार्वजनिक उपक्रमों की भी पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका हेै। इनके अन्र्तगत उद्योग, नगर विकास, पंचायतीराज, गृह, वन, कृषि, शिक्षा, ऊर्जा, उद्यान, गन्ना, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, नगर एवं ग्राम नियोजन, परिवहन, पर्यटन, पशुपालन, मत्स्य, भूतत्व एवं खनिकर्म, महिला कल्याण, लोक निर्माण, भूगर्भजल, श्रम और सिंचाई विभागों तथा वैकल्पिक ऊर्जा विकास संस्थान, उ॰प्र॰राज्य औद्योगिक विकास निगम, उ॰प्र॰ खनिज विकास निगम, उ॰प्र॰भूमि सुधार निगम, उ॰प्र॰मत्स्य विकास निगम, विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी परिषद तथा सिंगरौली विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण इत्यादि का नाम उल्लेखनीय है। 4.0- उŸार प्रदेश राज्य पर्यावरण नीति के उद्देश्य- मुख्य उद्देश निम्न प्रकार है। प्रदेश वासियों को गुणवŸाायुक्त और स्वस्थ पर्यावरण में सम्मानजनक एवं खुशहाल जीवन प्रदान करना। पर्यावरण को क्षति पहुँचाये बिना वर्तमान एवं भावी पीढि़यों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्राकृतिक संसाधनों का सतत् एवं न्यायोचित उपयोग सुनिश्चित करना। राज्य के वर्तमान एवं भावी विकास कार्यक्रमों में अवरोध उत्पन्न किये बिना पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन के लिए उपाय करना। आजीविका, आर्थिक प्रगति और मानव के व्यापक कल्याण हेतु पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों तथा प्राकृतिक व मानव निर्मित बहुमूल्य धरोहरों की सुरक्षा एवं संरक्षण के उपाय करना। प्रदेश के प्रत्येक वर्ग विशेषकर निर्धन वर्ग के लिए पर्यावरण संसाधनों को सुलभ बनाना और उनकी गुणवŸाा सुनिश्चित करना। प्रदेश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास हेतु नीतियांें, योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं में पर्यावरणीय पहलुओं का समावेश करना। पर्यावरणीय अपघटन के प्रभाव को कम करने हेतु पर्यावरणीय संसाधनों के प्रयोग में कमी लाना। जन सामान्य को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने और पर्यावरण सुधार व संरक्षण में विभिन्न स्तरों पर जनसहभागिता सुनिश्चित करने हेतु उपाय करना। प्रदेश में पर्यावरणीय अपघटन और प्रदूषण नियन्त्रण हेतु पर्यावरणीय शोध एवं विकास को प्रोत्साहन देना। पर्यावरण की सुरक्षा हेतु केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा बनाये गये अधिनियमों तथा दिशा निर्देशों को सख्ती से एवं प्रभावी ढ़ंग से पालन कराया जाना सुनिश्चित कराना। रणनीति- पर्यावरण नीति के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु राज्य सरकार के सभी स्तरों यथा राज्य, मण्डल, जिला, विकासखण्ड और ग्राम पंचायत स्तर पर कार्य योजना तैयार कर अपनाई जाने वाली रणनीति का विवरण निम्नवत हैः- अ. विनियामक, प्रक्रिया सम्बन्धी तथा स्थाई सुधार- भारत सरकार द्वारा समय-समय पर सुझायी जाने वाली कार्यवाही का वर्तमान परिप्रेक्ष्य, स्थानीय परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए सुधार की प्रकिृया को आगे बढ़ाना। राज्य पर्यावरण नीति के उद्देश्यों की एक निश्चित सीमा में पूर्ति हेतु कार्य योजनाओं का विरचन और क्रियान्वयन। (राज्य, जिला, वि॰ख॰ व ग्राम स्तर तक) जन सामान्य तक पर्यावरण संबन्धी जानकारी के प्रसार हेतु सूचना प्रोद्योगिकी आधारित संसाधनों का प्रयोग। प्रदेश में औद्योगिक एवं विकास परियोजनाओं की स्थापना एवं विस्तार आदि हेतु पूर्व-पर्यावरणीय सहमति जारी कराने हेतु पर्यावरण एवं वन मन्त्रालय भारत सरकार द्वारा गठित राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति तथा राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव निर्धारण प्राधिकरण को सचिवालय के रूप में आवश्यक सहयोग व संसाधन उपलब्ध कराना। वृहद स्तर पर प्रमुख कृषि भूमि के भूप्रयोग परिवर्तन वाली परियोजनाओं का पर्यावरणीय प्रभाव विश्लेषण करना। पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों हेतु तैयार की जाने वाली क्षेत्रीय विकास की योजनाओं में स्थानीय समुदायों को सहभागी बनाना। पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों को पर्यावरण प्रबन्ध योजनाओं के अनुपालन के अनुश्रवण हेतु सक्षम बनाना। परियोजनाओं को बन्द करने के पश्चात् पर्यावरण बहाली करना और अनुवर्ती अनुश्रवण हेतु संस्थागत प्रणाली का विकास करना। जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी राष्ट्रीय कार्ययोजना के अन्र्तगत जलवायु परिवर्तन पर गुणवŸाापरक अनुसंधान का विŸा पोषण, स्वास्थ्य एवं लोगों की जीविका पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन, शैक्षिक एवं वैज्ञानिक संस्थाओं में जलवायु परिवर्तन को समर्पित प्रणाली की स्थापना, जलवायु परिवर्तन शोधकोष की स्थापना, चिन्हित केन्द्रों के माध्यम से नीति एवं क्रियान्वयन को सहयोग देने हेतु शोध तथा इस क्षेत्र में व्यक्तिगत क्षेत्र की सहभागिता सुनिश्चित करना। 5.2 -पर्यावरणीय संसाधनों का संरक्षण संबर्धन- पर्यावरणीय संसाधनों के अपघटन पर नियन्त्रण हेतु अपनाई जाने वाली रणनीति निम्नवत हैः- 5. 2.1-भूमिः व्यापक जनसहभागिता के माध्यम से परती तथा अपघटित भूमि के सुधार को प्रोत्साहित करने हेतु विविध उपाय करना। पर्यावरण संगत और परंपरागत भू उपयोग पद्धतियों को अपनाने के लिए कृषकों को प्रोत्साहित करने हेतु विविध उपाय करना। वानस्पतिक एवं अन्य विधियों द्वारा मरूस्थलीकरण की रोकथाम हेतु विशिष्ट उपाय करना। स्थानीय प्रजातियों पर आधरित वृक्षारोपड़ करना। कृषि भूमि का उपयोग सामान्यतः (सिंचाई छोड़कर) गैरकृषि परियोजनाओं में न किया जाये। विकास योजनाओं एवं उद्योग स्थापना हेतु यथा संभव ऊसर, बंजर भूमि का ही प्रयोग किया जाये। (विशेष परिस्थति में विशेष प्राविधान)ं भूमि के प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक अपघटन को रोकने हेतु उपाय करना। कृषि भूमि की उर्वराशक्ति को बनाये रखने हेतु वायो-कम्पोस्टिंग तथा वर्मीकल्चर को बढ़ावा देना। भूमि की उर्वरता एवं उत्पादकता को बढ़ाने हेतु जैविक खाद के उपयोग को बढ़ावा देना। जैविक कीटनाशक, कृषि रसायनों के संतुलित उपयोग एवं उचित जल तथा भूमि प्रबन्धन द्वारा पर्यावरण संगत कृषि को बढ़ावा देना। कृषि वानिकी को प्रोत्साहित करना। भूमि की उत्पादकता में हो रही गिरावट में रोकथाम के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं, कृषक समूहों और अन्य संस्थाओं के माध्यम से कृषकों के मध्य जागरूकता का प्रसार। 5. 2.2-वन तथा वन्य जीव: (1) वन- राष्ट्रीय वन नीति 1988 तथा भारतीय वन अधिनियम एवं इसके तहद नियमो आदि में वन संरक्षण हेतु एक व्यापक आधार तैयार किया गया है, फिर भी वन क्षति के कुछ कारणों पर ध्यान देते हुए निम्न उपाय किये जाने की आवश्यकता है। राज्य के वर्तमान 6.98 प्रतिशत वन क्षेत्र को वर्ष 2022 तक 20 प्रतिशत बढ़ाने के लिए अपघटित वन भूमि, परती भूमि, निजी और राजस्व भूमि पर वनीकरण, बागवानी एवं कृषि वानिकी हेतु रणनीति तैयार कर व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण किया जाये। वनों में रहने वाले आदिवासियों के पारम्परिक अधिकारों को कानूनी मान्यता दी जाये और वनों के प्रबन्धन में उन्हें भागीदार बनाया जाये। अपरिहार्य कारणों वश वन भूमि को अन्य उपयोग में लिए जाने पर वन संरक्षण अधिनियम 1980 के प्राविधानों के अन्र्तगत वनों की पर्यावरणीय पुनस्र्थापना के आगणन हेतु उपयुक्त कार्यविधि विकसित की जाये। प्राकृतिक वनों का घनत्व बढ़ाने तथा सभी जगह संयुक्त वानिकी प्रबन्धन हेतु जन निवेश पर बल देना। जिन क्षेत्रों में संयुक्त वन प्रबन्धन एवं इको डेवलपमेन्ट योजनायें कार्यान्वित की जा रही हैं, उन क्षेत्रों में अन्य विकास विभागों जैसें- सिंचाई, ग्राम्य विकास, पशुपालन एवं ग्रामीण अभियन्त्रण इत्यादि के द्वारा संचालित योजनाओं को क्रियान्वित किया जाये तो ग्राम का सर्वांगीण विकास संम्भव होगा और उससे वनों पर निर्भरता भी कम होगी। अतः उपयुक्त समन्वय के लिए प्रशानिक व्यवस्था की जाये। सघन वनों के लिए ‘‘उŸाम प्रबन्धन प्रणाली संहिता’’ का गठन एवं कार्यान्वन करना। वनों की सुरक्षा हेतु जनसहभागिता को बढ़ावा देना। (2) वन्यजीव - वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षा में स्थानीय समुदायों को सहभागी बनाने हेतु उनकी आजीविका के लिए आर्थिक विकल्पों जैसे - पर्यटन विकास और वन उत्पाद (शाक, औषधीय पौधे एवं अन्य लघु उत्पाद) में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विशिष्ट परिविकास कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना। प्रदेश के प्रत्येक जैव-भौगोलिक क्षेत्र में व्यापक जन सहभागिता से संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क का विस्तार करना। लुप्तप्राय एवं दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु बंधक प्रजनन के लिए क्षमताओं को सुदृढ़ करना। पर्यावरणीय तथा परि-पर्यटन लाभों को प्राप्त करने हेतु बहु स्टेक होल्डर सहभागिता के समानान्तर, संरक्षित रिजर्व तथा सामुदायिक रिजर्वों में वन्य जीवों के वास-स्थलों में बढ़ोŸारी करना। 5. 2.3-जैव विविधता, पारम्परिक ज्ञान तथा प्राकृतिक धरोहर:- विकास एवं औद्योगिक परियोजनाओं से जैव विविधता तथा प्राकृतिक धरोहर पर पड़ने वाले स्पष्ट एवं गंभीर प्रभावों का पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन। बौद्धिक संपदा अधिकार के आलोक में प्रदेश के वानिकी, कृषि औद्यानिकी, और पशुपालन आदि क्षेत्रों में विद्यमान जैव विविधता का एक आन लाइन डाटा बेस तैयार करना। दुर्लभ एवं लुप्तप्राय जीव प्रजातियों के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ उनके जेनेटिक पदार्थों के संरक्षण के उपाय करना। आरक्षित वन क्षेत्रों की सुरक्षा एवं संवर्धन हेतु उपाय करना। परंपरागत पद्धति के माध्यम से उपलब्ध जेेनेटिक संसाधनों का अभिलेखीकरण किया जाये। जैव विविधता की दृष्टि से संकटग्रस्त/संवेदनशील स्थलों के सुरक्षा के उपाय करना तथा साथ ही जो स्थानीय समुदाय इससे प्रभावित हो सकते हैं उन्हें आजीविका के वैकल्पिक संसाधन उपलब्ध कराना। परंपरागत पद्धतियों के माध्यम से जैव विविधता के संरक्षण को बढ़ावा देना। जैव विविधता के संरक्षण से संबन्धित नियमों और कानूनों का प्रभावी ढ़ंग से अनुपालन सुनिश्चित करना। प्रदेश में स्थानिक वनस्पिति एवं जन्तु प्रजातियों के संरक्षण एवं उत्पादकता को बढ़ावा देना। जैव विविधता के प्रति जनसंवेदना विकसित करने की दृष्टि से परि-पर्यटन को बढ़ावा देना। 5. 2.4- जल संसाधनः (1) नदी तन्त्र- सभी ऋतृओं में पानी का पर्याप्त बहाव तथा जल गुणवŸाा मानकों के अनुरूप बनाये रखने हेतु गंगा एवं सहायक नदियों के जल ग्रहण क्षेत्रों में पर्यावरणीय प्रबन्धन के लिए एकीकृत ढ़ंग से उपाय करना। गंगा, यमुना और गोमती तथा अन्य नदियों में उनके किनारे स्थित शहरो एवं कस्बों तथा उद्योगों से अनुपचारित उत्प्रवाह के ड़ाले जाने पर प्रभावी ढ़ंग से रोक लगाना। तापीय ऊर्जा संयन्त्रों तथा अन्य उद्योगों से नदी के वनस्पतिजात तथा प्राणिजात एवं आजीविका के स्रोतों पर पड़ने वाले प्रभावों को नियन्त्रित करने हेतु उपाय करना। भूमि के कटाव की रोकथाम और हरित क्षेत्र में वृद्धि के लिए नदियो और जलाशयों के किनारों और जल ग्रहण क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों के सहयोग से वृक्षारोपण हेतु विश्ष्टि अभियान चलाना। नदी तटों के प्रबन्धन हेतु प्रदेश के समस्त संबन्धित विभागों द्वारा एकीकृत दृष्टिकोण को अपनाना। (2) भूजलः बेसिन कान्सेप्ट के आधार पर भूजल और सतही जल का संयोजित उपयोग किया जाये। भूजल स्तर संबर्धन हेतु तालाबों, जलाशयों और झीलों को गहरा कर उनकी जल भण्डारण क्षमता बढ़ाना तथा उन्हें अतिक्रमण से मुक्त करना। भूमिगत रिचार्ज को बढ़ाने हेतु कन्टूर बंडिंग तथा पारम्परिक तरीकों को प्रोत्साहित करना। नगरीय क्षेत्रों में 300 वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल वाले भूखण्डों पर निर्मित होने वाले भवनों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग व्यवस्था को अनिवार्य बनाया जाना। वर्षा जल संचयन के मानक निर्धारित किये जायें तथा जल रिचार्ज की गुणवŸाा बनाए रखी जाये और उनका प्रभावी ढ़ंग से अनुश्रवण किया जाये। जल के उपयोग में किफायत हेतु स्प्रिंकलर तथा ड्रिप सिंचाई जैसी निपुण एवं प्रभावशाली तकनीकों को अपनाने हेतु किसानों को प्रोत्साहित करना। आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइटेªट, लोहा तथा अन्य हानिकारक तत्वों को ग्रामीण पेयजल से अलग करने के लिए लागत, प्रभावी तकनीकों को विकास हेतु अनुसंधान, और विकास को समर्थन देना। औद्योगिक एवं अन्य गतिविधियों के फलस्वरूप भूजल प्रदूषण की गम्भीर समस्या से प्रभावित क्षेत्रों को चिन्हित कर निदानात्मक उपाय किए जायें। रेन वाटर हार्वेस्टिंग तकनीक के बारे में वेब आधारित सूचना प्रणाली का विकास करना। प्रदेश के भूजल स्तर में निरन्तर गिरावट वाले विकास खण्डों के दोहन को नियन्त्रित करने हेतु विधिक उपाय करना। गण्डक और शरदा सहायक नहर समावेश क्षेत्र में जल प्लाबन की समस्या के निदान हेतु सतही और भूगर्भ जल के समन्वित उपयोग हेतु उपाय करना। (3) नम भूमिः प्रदेश में विद्यमान नम भूमियों की पहचान करना तथा एक स्टेट इन्वेन्ट्री बनाना। राजस्व परिषद द्वारा चिन्हित की गई नम भूमियों के अपघटन को रोकने, उनका संरक्षण करने तथा अतिक्रमण से मुक्त करने के लिए एक विधिक विनियामक तन्त्र स्थापित करना। ग्राम पंचायतों और नगर निकायों आदि को उनकी सीमान्तर्गत स्थित नम भूमियों के संरक्षण और प्रबन्धन हेतु उत्तरदायी बनाना। विशेष अनूठी नम भूमियों की सुरक्षा हेतु रणनीति का विकास करने में ‘‘अतुलनीय मूल्य’’ के रूप में उन पर विचार करना। प्रत्येक महत्वपूर्ण पहचान की गई नम भूमि के संरक्षण हेतु स्थानीय समुदायों तथा अन्य सुसंगत स्टैक होल्डर्स के सहयोग से संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोगी रणनीतियांँ प्रतिपादित करना। पहचान की गई नम भूमियों के लिए मल्टी स्टैक होल्डर सहभागिता के माध्यम से जनता, एजेन्सियों, स्थानीय समुदायों तथा निवेशकों को साथ लेकर ‘परि-पर्यटन’ रणनीति बनाना तथा लागू करना। महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय आंकलन के दौरान परियोजनाओं के कारण नम भूमियों पर पड़ने वाले प्रभावों का स्पष्ट उल्लेख करना। राष्ट्रीय नम भूमि संरक्षण कार्यक्रम के तहत प्रदेश में चिन्हित 9 नम भूमियों के संरक्षण एवं सवर्धन हेतु विशिष्ट उपाय करना। 5. 2.5-प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रणः (1) वायु प्रदूषणः प्रदूषणकारी पुराने वाहनो के संचालन पर रोक लगाना। नगरीय क्षेत्र में भारी वाहनों के प्रवेश को नियमित/नियन्त्रित किया जाना। यातायात प्रवाह में सुधार हेतु फ्लाई ओवर और अन्डर पास की व्यवस्था किया जाना। अवैध पार्किंंग की रोकथाम हेतु प्रभावी उपाय करना। मार्गों को अक्रिमण से मुक्त करना। नगरों का एकीकृत प्लान तैयार किया जाये। समस्त वाहनों के लिए नियन्त्रित प्रदूषण प्रमाण पत्र प्राप्त करने की व्यवस्था सुनिश्चित करना। वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में कमी लाने हेतु भारत सरकार के मानकों के अनुरूप वाहन के निर्माण हेतु उद्योगों को निर्देशित करना। प्रदूषण नियन्त्रण हेतु सी.एन.जी. की आवश्यकता वाले जनपदों की प्राथमिकता का निर्धारण किया जाये तथा ईंधन की गुणवŸाा के संबन्ध में समय-समय पर भारत सरकार द्वारा निर्गत मानकों के अनुरूप कार्यवाही करने हेतु उचित निर्देश निर्गत किए जायें एवं अति संवेदनशील प्रदूषणकारी क्षेत्रों में उद्योगों में गैस को प्रोत्साहित किया जाये। नगरीय, औद्योगिक क्षेत्रों एवं पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के नियमित अनुश्रवण के उपाय करना तथा उनमें स्थानीय लोगों को सहभागी बनाना। प्रमुख नगरों में इस कार्य हेतु स्थानीय नगर निकायों को सक्षम बनाना। प्रदूषणकारी उद्योगों से जनित प्रदूषण के प्रभावी अनुश्रवण एवं नियन्त्रण हेतु उपाय किए जाना। समस्त प्रकार के अपशिष्टों जैसे , नगरीय घरेलू, औद्योगिक और जैव चिकित्सीय इत्यादि के संग्रह, परिवहन और वैज्ञानिक ढ़ंग से निस्तारण हेतु उपाय किये जाना। नगरीय क्षेत्रों में कोयला, केरोसिन, लकड़ी और वायो मास के प्रयोग को प्रतिबंधित करते हुए एल.पी.जी. की शतप्रतिशत आपूर्ति की व्यवस्था किया जाना। ग्रामीण क्षेत्रों में वायोगैस, सोलर कुकर तथा उन्नत किस्म के चूल्हे के प्रयोग को प्रोत्साहन देना तथा एल.पी.जी.की सुविधा का विस्तार किया जाना। वायु प्रदूषण के नियन्त्रण हेतु पर्यावरण मित्र एवं लागत प्रभावी संयन्त्रों/प्रणालियों के विकास हेतु शोध को प्रोत्साहित करना। प्रदेश के प्रमुख नगरों एवं पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में वायु प्रदूषण के नियन्त्रण हेतु कार्ययोजना तैयार करना व लागू करना। नगरों की महायोजना बनाते समय जोनिंग एटलस के पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाय तथा 33 प्रतिशत भाग में हरित क्षेत्र का प्राविधान किया जाये। महायोजना का पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन कराया जाय। नगरीय क्षेत्रों में प्रदूषण की रोकथाम हेतु पर्याप्त सार्वजनिक और निजी निवेश सुनिश्चित करने हेतु प्रदेश कार्यनीति तैयार करना। स्थानीय लोगों को सहभागी बनाते हुए ऊर्जा प्रजाति पौधों के रोपण द्वारा परती भूमि के सुधार को बढ़ावा देना। (2) जल प्रदूषणः जल प्रदूषण के निवारण एवं नियन्त्रण हेतु नियमित अनुश्रवण की व्यवस्था करना एवं स्थानीय लोगों को सहभागी बनाने हेतु कार्यनीति विकसित करना। प्रदेश की प्रमुख नदियों जैसे गंगा, यमुना, गोमती, राप्ती, रामगंगा, काली, हिन्डन और बेतवा इत्यादि में जल प्रदूषण के उत्तरदायी स्रोतों की पहचान करना एवं प्रदूषण निवारण तथा नियन्त्रण हेतु कार्य योजना (सीवेज उपचार संयन्त्र, संयुक्त उत्प्रवाह उपचार संयन्त्र, विद्युत शवदाह गृह, सामुदायिक शौचालय, व स्नान घरों का विकास/सुधार आदि) विकसित कर क्रियान्वयन करना। गंगा, यमुना एवं गोमती कार्य योजना के अन्र्तगत अवशेष कार्यों केा पूरा कराया जाना। प्रदूषणकारी उद्योगों को चिन्हित कर उनसे होने वाले जल प्रदूषण ( सतहीएवं भूजल) के प्रभावी अनुश्रण एवं नियन्त्रण हेतु उपाय सुनिश्चित किया जाना। भूजल एवं ंसतही जल की गुणवत्ता का एक डाटावेस तैयार किया जाये तथा इस कार्य हेतु एक नोड़ल एजेन्सी को निर्धारित किया जाये। जल प्रदूषण के नियन्त्रण हेतु पर्यावरण मित्र एवं लागत-प्रभावी उत्प्रवाह, सीवेज उपचार संयन्त्रों एवं प्रणालियों के विकास हेतु शोध को प्रोत्साहित करना। नगरीय क्षेत्रों में सीवेज उपचार संयन्त्रों की स्थापना व संचालन में सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की सहभागिता को बढ़ावा देना। सीवेज उपचार उपभोग प्रभारों की वसूली हेतु नगर निकायों की क्षमता को बढ़ाना। उपचारित मल, जल और औद्योगिक उत्प्रवाह को जल निकायों में प्रवाहित करने से पूर्व पुनः प्रयोग को बढ़ावा देना। प्रदूषणकारी लघु उद्योगों में लागत-वसूली आधार पर संयुक्त उत्प्रवाह उपचार संयन्त्रों की स्थापना को बढ़ावा देने हेतु उपाय करना। कृषि निवेशों विशेषकर कीटनाशकों के मूल्य निर्धारण नीतियों में भूजल प्रदूषण का स्पष्ट विवरण लेना और उनके उपयोग पर आधारित सष्य प्रणालियों का प्रसार करना। प्रदेश में निर्मित होने वाली समस्त आवासीय परियोजनाओं मेें सीवेज उपचार संयन्त्रों की व्यवस्था को सुनिश्चित किया जाना। नगरीय ठोस अपशिष्टों, जैव चिकित्सीय अपशिष्टों एवं उद्योगों से जनित होने वाले परिसंकटमय ठोस अपशिष्टों के निस्तारण का वांछित उपाय करना। उद्योगों के स्थापना हेतु जोनिंग एटलस तैयार कराया जाना तथा महायोजना में उनका समावेश कराया जाना। (4) मृदा प्रदूषणः परिसंकटमय अपशिष्ट ढ़ेरों को हटाने की रणनीतियाँ विकसित करना तथा उन्हें लागू करना, विशेषकर औद्योगिक क्षेत्रों में तथा ऐसी भूमियों को सतत् उपयोग में लाने हेतु सुधार करना। उद्योगों से जनित परिसंकटमय अपशिष्टों एवं जैवचिकित्सीय अपशिष्टों के निस्तारण हेतु विभिन्न उपाय जैसे सुरक्षित लैंड फिल्स एवं भष्मीकरण संयन्त्रों की व्यवस्था करना। इनकी स्थापना हेतु उपयोग कर्ताओं से शुल्क बसूल करके सार्वजनिक - निजी सहायता के माॅडल विकसित करना तथा लागू करना। विभिन्न अपशिष्ट पदार्थों को इकट्ठा करने वाले तथा पुनःचक्रण करने वाली अनौपचारिक सेक्टर प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना तथा उन्हें विधिक मान्यता देना, विशेष रूप उनकी संस्थागत वित्त और सुसंगत प्रौद्योगिकियों में पहुँच बढ़ाना। नगरीय ठोस अपशिष्टों के कार्बनिक तथा अकार्बनिक अंश को पृथक-पृथक करके अकाबर्निक अंश के पुनःचक्रण और पुनः प्रयोग करने हेतु स्थानीय निकायों की क्षमताओं को सुदृढ़ करना तथा कार्बनिक अंश के प्रसंस्करण हेतु ऐसी विधि एवं उपाय को विकसित करना जिसमें सेनेट्री लैण्ड फिल्स हेतु भूमि की न्युनतम आवश्यकता पड़े। इस हेतु बाहरी प्रबन्धन सेवाओं में प्रतिस्पर्धा का सिद्धान्त अपनाना। पारम्परिक फसल की किस्मों की खेती को अनुसंधान के माध्यम से बढ़ावा देना। अपघटित भूमि, ऊसर भूमि तथा कृषि रसायनों के कारण प्रदूषित/प्रभावित भूमि के सुधार हेतु प्रोद्योगिकी का प्रसार। जैविक उपज के विपणन को बढ़ावा देना। प्लास्टिक अपशिष्टों के पुनर्चक्रण, पुनः प्रयोग और अन्तिम रूप से पर्यावरण संगत निस्तारण हेतु रणनीतियों का विकास एवं क्रियावयन। इस हेतु सुसंगत प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना तथा इन्सेन्टिव आधारित संयन्त्रों का प्रयोग करना। कीट एवं रोगों के नियन्त्रण हेतु कृषि रक्षा रसायनों के प्रयोग के स्थान पर जैविक नियन्त्रण/जैविक पेस्टीसाइड के प्रयोग एवं एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन को प्रोत्साहित करना। एकीकृत पौध तत्व प्रबन्धन एवं जैविक उर्वरक तथा नाडेप, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट, हरीखाद एवं जीवाणु उर्वरकों को प्रोत्साहित करना। परिसंकटमय अपशिष्ट जनित करने वाली औद्योगिक इकाइयों और जैव चिकित्सीय अपशिष्ट जनित करने वाली चिकित्सा इकाइयों तथा उनके द्वारा प्रयोग की जा रही अपशिष्ट निस्तारण सुविधाओ के विवरण का आन लाइन डाटावेस तैयार किया जाना। (4) ध्वनि प्रदूषणः भारत सरकार द्वारा निर्धारित ध्वनि मानकों के प्रवर्तन के संबन्ध में लाउडस्पीकर और अन्य ध्वनि विस्तारक यन्त्रों के उपयोग को नियमित करने के उपाय करना।इसके अलावा शान्त क्षेत्रों की पहचान कर ध्वनि प्रदूषण नियन्त्रण हेतु उपाय करना। परिवेशीय ध्वनि प्रदूषण के प्रभावी अनुश्रवण हेतु जनपद स्तर पर तन्त्र विकसित करना। परिेवेशीय ध्वनि मानकों के पालन में जन सहभागिता को प्रोत्साहित करने के उपाय करना। वाहनों में प्रेशर हार्न के प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाना। आवासीय, वाणिज्यिक और अन्य क्षेत्रों में केवल ध्वनि प्रदूषण नियन्त्रण व्यवस्था से युक्त जनरेटरों को ही प्रयोग को अनुमति देना। ध्वनि प्रदूषण से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जन जागरूकता का प्रसार किया जाना। 5.2.6- मानव निर्मित ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक तथा पुरातत्विक महत्व की धरोहरों का संरक्षण। मानव निर्मित धरोहरों की राज्य सूची का आन लाइन डाटावेस तैयार करना। धरोहर स्थलों पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए वायु गुणवŸाा के गहन अनुश्रवण की व्यवस्था करना। अतुलनीय मूल्यवान’ समझी जाने वाली धरोहरों के लिए पर्यावरण संगत एकीकृत क्षेत्रीय विकास योजनाओं का विरचन एवं क्रियान्वयन करना। उद्योग तथा विकास परियोजनाओ की स्थापना से धरोहर स्थलों पर पड़़ने वाले प्रभावों के आंकलन हेतु पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन की शर्तोें में विशिष्ट समावेश किया जाना। पुरातात्विक महत्व की धरोहरों के समीप परियोजनाओं की स्थापना/अन्य क्रियाकलापों को प्रारम्भ करने से पूर्व परियोजना प्रस्तावक द्वारा पुरातत्व विभाग से भी सहमति प्राप्त किये जाने की व्यवस्था लागू किया जाना। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित प्राचीन टीलों को खेती एवं आवास आदि के लिए पट्टा पर न दिया जाय। नगरीय क्षेत्रो में स्थित ऐसे स्थलों को आवासीय समितियों को विक्रय न किया जाये। प्रदेश के समस्त जिलों मे उपलब्ध प्राचीन टीलों एवं पुरास्थलों पर अतिक्रमण को रोका जाय। उन्हें संरक्षित रखने हेतु उन पर घास एवं छोटी झाडि़यों का रोपड़ किया जाये। साथ ही उन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाये। प्रदूषण से बचाने हेतु प्राचीन स्माराको के समीप कल/कारखाने न लगाये जायें। प्रदेश में विकास संबन्धी कोई भी योजना बनाते समय विद्यमान प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्मारकों पर पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन अनिवार्यतः कराया जाये। 5.3-पर्यावरणीय अपघटन का आर्थिक मूल्यांकन। पर्यावरणीय गुणवŸाा बनाये रखने के लिए विकास योजनाओं के क्रियान्वयन से या अन्य कारणों से होने वाले पर्यावरणीय अपघटन का आर्थिक मूल्यांकन कराने तथा उसकी भरपाई कराने के लिए उतनी ही धनराशि पर्यावरण संरक्षण हेतु व्यय किये जाने एवं अन्य ठोस उपाय किये जाने की व्यवस्था की जाये। ु