Saturday, September 6, 2014

शून्य लागत प्राकृतिक खेती.एक एकड़ खेत का माॅडल.- हिमांशु गंगवार

किसानों के लिए शून्य लागत प्राकृतिक खेती वरदान सिद्ध हो सकती है। जिसके लिए आवश्यक है, किसान के पास एक देशी गाय और मिश्रित खेती करने का तरीका। इस पद्यति से पानी की खपत भी 1/10 ही होती है। सामान्यतः खेत में ली जाने वाली मिश्रित फसलों से लागत मूल्य निकल आता है और मूल फसल लाभ के रूप में बच जाती है। इस पद्यति से खेती करने पर जब किसान के बेटे को लाभ होता है, तो फिर उसे अपने घर-गांव को छोड़कर छोटी-छोटी नौकरियों के लिए मारा-मारा फिरना नहीं पड़ता। अच्छी पढ़ाई का मतलब नौकरी करना नहीं, अपितु स्वंय अपनी खेती द्वारा अच्छी आमदनी और स्वाभिमान की जिन्दगी का नाम ‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती’ है, ऐसा मेरा अनुभव है।
मैने स्वंय बीटेक किया, मेरे पिता जी उŸार प्रदेश पावर कार्पोरेशन में इन्जीनियर थे और लखनऊ में रहते हैं। पर! मैने नौकरी करने की अपेक्षा खेती करने को प्राथमिकता से लिया और फरूखाबाद जिले के अपने गाँव में रहने लगा, तभी 2011 में एक प्रशिक्षण वर्ग में शून्य लागत प्राकृतिक खेती के पुरस्कर्ता सुभाष पालेकर जी से भेट हुई। उनके द्वारा प्रतिपादित कृषि पद्यति समझ में आ गई और तब से उसी विधि से लाभकारी खेती कर रहा हूंँ। हमारे पास 16 एकड़ कृषि भूमि है, जो आज ‘‘शून्य लागत प्राकृतिक विधि’’ खेती का माॅडल बन गया है। यहांँ पर मैं शून्य लागत प्राकृतिक खेती के एक एकड़ खेत का विवरण दे रहा हूंँ, जिससे आप अपने सम्बन्ध में स्वंय निर्णय ले सकेंगे।
एक एकड़ गन्ने की सहफसली में कुल लागत -
बुवाई का समय फसल बुवाई            दर  कुल बीज                     लागत
फरवरी, 2013 गन्ना 6 गुणा 9 फिट        5रू॰/गन्ना  70 गन्ना              350 रू॰
        मूंग गन्ने के बीच में                80रू॰/किग्रा  7  किग्रा              560 रू॰
जून, 2013         हल्दी मूंग के स्थान पर        25रू॰/किग्रा  350 किग्रा           8,750 रू॰
अन्य व्यय -
जुताई (पाटा सहित) गन्ना एवं मूग बुवाई से पूर्व        1100रू॰/एकड़   3 जुताई             3,300 रू॰
गन्ना गड़ाई                        200 रू॰/लेबर    2 लेबर             400 रू॰
मूंग बुवाई हल-बैल द्वारा गन्ना के बीच में लाइन से   1000 रू॰/ए.पाटा सहित    1,000 रू॰
निराई-गुड़ाई गन्ना, मूंग एवं हल्दी में        4000रू॰/निराई    4 निराई             16,000 रू॰
सिंचाई पूरे कार्यकाल में                 750रू॰/एकड़    6 सिंचाई                    4,500 रू॰
मूंग कटाई,मड़ाई                2500रू॰/एकड़     ............                  2,500 रू॰
हल्दी खुदाई                        2500रू॰/एकड़     ............                  2,500 रू॰
हल्दी सफाई                        3500रू॰/एकड़ ............          3,500 रू॰
गन्ना ढुलाई                          50 रू॰/कुन्तल    250 कुन्तल                12,500 रू॰
सुपरवीजन पूरे कार्यकाल में                  1000रू/माह     12 माह                      12,000 रू॰
कुल लागत                                                      66,610 रू॰

एक एकड़ गन्ने की सहफसली में कुल उत्पादन -
कटाई का समय         फसल उत्पादन दर                                    उत्पादन मूल्य
20 मई, 2013 मूंग        4 कुन्तल 8,000 रू॰/कुन्तल                    32,000  रू॰
दिसम्बर, 2013 हल्दी        50 कुन्तल         2000 रू॰/कन्तल                      1,00,000  रू॰
फरवरी, 2014 गन्ना      250 कुन्तल         270 रू॰/कुन्तल                    67,750  रू॰
कुल उत्पादन                                          1,99,750 रू॰

कुल लागत                                              66,610 रू॰
बचत                                                   1,33,140 रू॰

एक एकड़ खेती से एक वर्ष में 1,33,140 रू॰ के अनुसार प्रति माह आय हुई - 11,995 रू॰। इस प्रकार कुल मेरी 16 एकड़ खेती से प्रति वर्ष कुल बचत - 21,30,240 रू॰ हो जाती है, जो किसी भी नौकरशाह की सुख-शान्ति की तुलना में कम नहीं है। विचार कीजिए! यदि कम नहीं है, तो रासायनिक खेती से मुक्ति का मार्ग अपनाएंँ और दूसरों की गुलामी से अच्छा है, अपनी खेती करें और स्वावलम्बी व गौरवपूर्ण जिन्दगी जिएंँं।
एक एकड़ खेती वाला व्यक्ति भी कम से कम 12 हजार रू॰/महीना घर बैठे कमाई कर सकता है। जिसके लिए गन्ने के साथ सहफसली के रूप में अन्य कई फसलें ली जा सकती हैं, आइये देखें-
जायद के समय (फरवरी से मई तक, 4 माह) - लोबिया, मूंगफली, मक्का, प्याज तथा विभिन्न सब्जियाँ। 
खरीफ के समय (जून से सितम्बर तक, 4 माह)- लोबिया, ग्वार, मक्का, अरहर, तिल्ली तथा विभिन्न सब्जियांें की फसलें ली जा सकती हैं। पर! कम से कम एक फसल दलहन वर्ग की अवश्य लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि गन्ने की बुबाई अक्टूबर में करनी हो तो, सहफसली के रूप में रबी की फसलों की सभी फसलें जैसे - बरसीम, सरसों, चना, मटर, जौ, गेहूंँ, आलू,, टमाटर, व अन्य सब्जियां मिट्टी व वातावरण के अनुसार ली जा सकती हैं।
मुझे शून्य लागत प्राकृतिक खेती करते हुए चार साल हो गये हैं। हमारी खेती सहफसली है, जिसमें मुख्य फसल आवश्यकतानुसार चैडे़ बेड पर निश्चित दूरी पर लाइन से बोई जाती है। उसके दोनो ओर नाली रहती है जिसके माध्यम से फसल को पानी दिया जाता है। नाली तथा मुख्य फसल के बीच खाली खेत में लाइन से मौसम के अनुसार सहफसल लेते हैं। उसमें भी कम पानी वाली सहफसल मुख्य फसल की ओर तथा अधिक पानी की माँग वाली फसल नाली की ओर लेते हैं। खेती में निकलने वाले फसलों के अपशिष्ट तथा निराई-गुड़ाई से निकलने वाला सभी खर-पतवार नली में आच्छादन के रूप में डालते हैं। इसके अतिरिक्त फसल के बेड पर भी आच्छादन करते हैं, जिससे फसल में खर-पतवार नहीं उगता। पूरी फसल में आच्छादन के कारण नमी अधिक समय तक टिकती है, जिससे पानी लगाने की अवधि व मात्रा दोनो घट जाती है। खेेत की परत पर आच्छादन के कारण अंधेरा रहता है, जिससे केंचुवा रात-दिन काम करता है, जिसके परिणाम स्वरूप खेत की मिट्टी इतनी मुलायम हो गई है कि, खेत में चलने से पैर जमीन में धसने लगते हैं। इससे दूसरी फसल लेने पर जुताई की आवश्यकता बहुत कम रह गई है। कई सहफसलों की तो बुवाई बिना जुताई-खुदाई के खुरपी या नुकीली लकड़ी से ही कर दी जाती है। फसल बोने से पूर्व जुताई के समय एक बार में 50 किलो के दो कट्टे घन-जीवामृत एक एकड़ में डाल कर जुताई द्वारा मिला देते हैं तथा प्रत्येक पानी के साथ एक टंकी जीवामृत का प्रयोग करते हैं, जिसकी मात्रा का अनुपात फसल के आयु-क्रम के साथ बदलता रहता है।
बीज का शोधन भी इसी विधि से बनने वाले बीज शोधक से करने के बाद ही बुवाई करते हैं, जिससे बीज का जमाव अधिक व रोग रहित होता है। भूमि का उपजाऊपन निरन्तर बढ़ने के साथ ही, उत्पादन दर बिना घटे, गुणवŸाा युक्त, अधिक टिकाऊ, अधिक स्वाद से युक्त व आरोग्यवर्धक होती है। अतः सामान्य बाजार मूल्य पर भी फसल में प्रति एकड़ अधिक बचत होती है। परन्तु इस विधि के उत्पादन की गुणवŸाा के कारण सामान्य रूप से इसका मूल्य बाजार मूल्य से न्युनतम 10 से 20 प्रतिशत अधिक ही मिलता है।