वर्तमान विश्व में विकास की पराकाष्ठा को प्राप्त कर ब्रह्माण्ड के भौतिक रहस्यों का भेदन करने वाली अन्तर्राष्ट्रीय महाशक्तियाँ एक ओर विश्वशान्ति, विश्वकल्याण तथा मानवतावाद की प्रतिष्ठा द्वारा ‘एक’ तथा श्रेष्ठ विश्व के स्वप्न को साकार करने हेतु कृत संकल्प हैं, तो दूसरी ओर भौतिक संसाधनों के प्रति अनौचित्यपूूर्ण आकर्षण तथा वैयक्तिक स्वार्थ साधन में प्रवृत्त संकीर्ण मानसिकता के कारण निश्चित रूप से नैतिक मूल्यों के प्रति मानवीय व्यवहार में पर्याप्त सीमा तक नकारात्मक परिवर्तन आया है। परिणामतः राष्ट्रीय चेतना को प्रभावित करने वाली नीतियों के प्रति भी सामाजिक आस्था विचलित हुई है। वस्तुतः स्वार्थ की राजनीति ने राष्ट्र के कर्णधारों को भ्रष्टाचार के पंक से कलंकित कर दिया है। अभी कुछ समय पूर्व एक रोचक अध्ययन के आधार पर जिन नब्बे भ्रष्ट देशों की सूची प्रकाशित हुई। उनमें भारत भी 67वें स्थान पर है। सत्य, नैतिकता और एकत्व का सन्देश विश्व को प्रदान करने वाले भारत के लिए यह चिन्ता का विषय है।
इससे भी अधिक दुःखद विडम्बना की बात यह है, कि लोक-हितों के लिए मनसा-वाचा- कर्मणा समर्पण कर शपथ लेने वाले लोक प्रतिनिधियों तथा जन सेवा के पुण्य उद्देश्य से शासन का दायित्व वहन करने वाले प्रशासन-तन्त्र में अनुशासन एवं व्यवस्था केवल आदर्श के विषय रह गए हैं। जन-सामान्य राजनैतिक तथा सामाजिक सुरक्षा के प्रति सदैव आशंकित तथा भयभीत रहता है। फलतः प्रशासन के प्रति लोक-विश्वास एवं आस्था स्थिर नहीं हो पा रही है। भौतिक इच्छाओं की पूर्ती में परस्पर स्पर्धा ने उन जीवन मूल्यों का हनन किया है, जो व्यक्ति तथा राष्ट्र के उन्नयन के लिए सदैव उपादेय हैं। ऐसा प्रतीत होता है, कि समाज का एक बड़ा भाग, चाहें वह शासन तन्त्र हो, अथवा जनता, दिग्भ्रमित हो गया है।
इस स्थिति में ‘सनातन मूल्य’ के पुनरीक्षण द्वारा जनमत-समर्थित लोकतान्त्रिक प्रशासन का मूल्याप्रेक्षत्व प्रासंगिक चर्चा का विषय है, क्योंकि लोक शासन अथवा लोक प्रशासन का सम्बन्ध अपने अधिकार क्षेत्र के प्रत्येक व्यक्ति के हित-चिन्तन तथा सर्वतोमुखी विकास से है, जो समर्पण और सेवाभावना द्वारा असत् (अनुचित तथा अयथार्थ) के उन्मूलन तथा सत् (उचित एवं यथार्थ) के प्रतिष्ठापन से ही सम्भव है।
उक्त सन्दर्भ में ‘सनातन मूल्य’ के स्वरूप पर अनुचिन्तन तथा इस परिप्रेक्ष्य में लोकशासन के स्वरूप, उद्देश्य एवं कार्यप्रणाली का मूल्यांकन आवश्यक है। विकसित तथा विकासशील देशों, विशेषतः आध्यात्मिक पृष्ठभूमि वाले भारत जैसे राष्ट्र में सनातन मूल्य न केवल मानव, अपितु समग्र जैविक अस्तित्व का मूलाधार है। ‘सनातन’ पद का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है ‘सदा होने वाला’। इस दृष्टि से कालिक-समष्टि के नित्य-सत्तात्मक प्रत्यय का वाचक ‘सनातन’ नित्य, चिरन्तन, अविच्छिन्न सत्ता का विशेषण है। मूल प्रतिष्ठायाम् धातु से व्युत्पन्न ‘मूल्य’ पद का अर्थ है ‘प्रतिष्ठा के योग्य।’ अतः देशकाल की मर्यादा से परे सर्वदा, सर्वत्र, मूलतः प्रतिष्ठित किए जाने योग्य तत्व ‘सनातन मूल्य’ है। वह तत्व क्या है? इस पर भौतिक विचार की आवश्यकता है।
मानव जीवन पुरूषार्थमूलक है, जिसका प्रयोजन परक पर्यवसान ‘परम आनन्द’ की प्राप्ति में है, तथा क्रियाजन्य उपलब्धि निरन्तर विकासोन्मुखी चेतना के सतत जागरण में है। इस प्रकार समस्त पुरूषार्थगत चेतना का सार भी वही निरपेक्ष सत् है, जो जगत् को अबाध सन्चालित करने वाली नैसर्गिक व्यवस्था का मूल कारण है। वह अक्षर (अविनाशी), ब्रह्म (सर्वव्यापक), चैतन्य (शक्तिमान्), आनन्द (दुःखनिवृत्तिरूप) तथा परम पुरूषार्थ होने के कारण परम साध्य है। अतः सनातन मूल्य है, सदा प्रतिष्ठेय है। वस्तुतः सत् पदार्थ मात्र का स्वभाव है। ‘एंक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ की कल्पना में यही तात्पर्य निहित है। इसी कारण वनस्पति आदि जड़ पदार्थ तथा जीव-जन्तु आदि अक्षर कोटि के प्राणी भी आश्चर्यजनक रूप से अनुशासन तथा व्यवस्था में रह कर स्वधर्म का पालन करते हैं। फिर मेधा के अक्षय वरदान से सम्पन्न मानव का तो जीवनाधार ही धर्मनिष्ठ नैतिक आचरण है। निम्न से निम्न कोटि की मानसिकता वाला मनुष्य भी जानबूझ कर अनैतिक (अनुचित) कार्य नहीं करना चाहता और अपने कृत्य के अधर्म तथा पाप युक्त होने का बोध होने पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, व्यक्त अथवा अव्यक्त रूप में आत्मग्लानी, सन्ताप तथा ईश्वर से समायाचना का भाव यह प्रमाणित करते हंै, कि उसकी आत्म-चेतना सन्मूलक है।
व्यवहारिक रूप से सत् (उचित) मानव का साक्ष्य तथा उसकी प्रतिष्ठार्थ किया गया लोकशंसित आचरण (धर्म) साधन है। तात्विक रूप से साध्य तथा साधन, मूल्य तथा धर्म एक है, क्योंकि ‘धर्म’ ‘सत्’ की अभिव्यक्ति से भिन्न कुछ नहीं। वैयक्तिक तथा सामाजिक, भौतिक तथा आध्यात्मिक, प्राकृत तथा सांस्कृतिक, शाश्वत तथा सामयिक धर्म लोकदर्श के रूप में सनातन मूल्य के प्रति निष्ठा करता है। उसका प्रतिमान श्रेष्ठ व्यक्तियों का आचरण होता है। जैसा कि श्रीमद्भगवद गीता में भगवान कहते हैं -
यद्यदाचरित श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
काल सापेक्ष हो कर वह युग तथा देश सापेक्ष होकर लोक धर्म बन जाता है। भारतीय मनीषियों ने सार्वभौम तथा शाश्वत सद्रूप मूल्य की प्रतिष्ठा हेतु पुरूषार्थ चतुष्टय की कल्पना कर धर्म, अर्थ तथा काम (त्रिवर्ग) को प्रवृत्तिमूलक, अतः क्रियात्मक यथार्थ के रूप में तथा मोक्ष को निवृत्तिमूलक, अतः मूल सत्तात्मक यथार्थ के रूप में स्वीकार किया। वैशेषिक दर्शन ने उसी यथार्थ को लोक व्यवहार की सरलता की दृष्टि से अभ्युदय तथा निःश्रेयस के रूप में स्वीकार कर उन्हें धर्मसाक्ष्य बतलाया -
यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस सिद्धिः सधर्मः।
अभ्युदय द्वारा भौतिक उपलब्धि जन्य आनन्द तथा निःश्रेयस द्वारा आत्मानुभूति जन्य आनन्द की प्राप्ति सम्भव है। उल्लेखनीय है, कि उत्तरोत्तर उच्च से उच्चतर अवस्था को प्राप्त करने की सहज आकांक्षा मानव का स्वभाव है। यह निरन्तर ऊध्र्वगति ही अभ्युदय है, जो लौकिक प्रतिष्ठा के भाग से होकर आत्मप्रतिष्ठा की पराकाष्ठा पर पहुँचकर निःश्रेयस कहलाता है, जिससे परे कोई श्रेय अवशिष्ट नहीं रहता। इस प्रकार ‘अभ्युदय’ तथा ‘निःश्रेयस’ ‘प्रेय’ तथा ‘श्रेय’ के योग से जीवन की पूर्णता प्राप्त होती है। पूर्णता की प्राप्ति ही सत् की प्रतिष्ठा है। लोक के धरातल पर ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की अनुभति उस पूर्णता का स्वरूप है तथा ‘आत्मंनः प्रतिकूलानि परेषां न समायरेत्’ की भावना पूर्णत्वानुभूति का साधन। व्यागपूर्वक भोग तथा निर्लोभ का आदर्श तदनुकूल आचरण का मन्त्र।
भोग का यह आदर्श जन-जन को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सन्देश देता है, जिसके मूल में ‘मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्’ की सौहार्दपूर्ण कामना निहित है। विश्वात्मवाद की यह कल्पना व्यष्टि और समष्टि के अन्तर को मिटाकर जातिवर्ग के भेदभाव से रहित लोक के उस स्वरूप को व्यक्त करती है, जहाँ आत्मीयता, करूणा और प्रेम की त्रिवेणी विश्व शान्ति, विश्व कल्याण तथा एकात्वानुभूति की पावन धारा में जन-मन को आप्लावित कर देती है। व्यष्टि और समष्टि का यह समन्वय निश्चित रूप से निःश्रेयस (कल्याण), प्रयोजनरूप क्रिया की सिद्धि (अपवर्ग) अशिव तथा अवान्छनीय से मुक्ति (मोक्ष) तथा विवेकपूर्ण एकत्वानूभूति (कैवल्य) का व्यावहारिक तात्पर्य है। समग्र रूप में सनातन मूल्य का यही स्वरूप है।
विश्व के अन्य देशों के चिन्तक पुरूषार्थ जैसे किसी तत्व को नहीं स्वीकार करते, किन्तु सत्य, शिव, सुन्दर के एकत्र-अवस्थान भूत नैतिक यथार्थ को सनातन मूल्य स्वीकार कर विश्व मंगल तथा शिव संकल्प को मानव जीवन का लक्ष्य मानते हैं। काण्ट और प्लेटो जैसेे दार्शनिक शिव को क्रमशः निरपेक्ष तथा नैतिक मूल्य के रूप में परिभाषित करते हैं, जबकि अर्बन ने मानवीय मूल्य के प्रसंग में आत्मानुभूति एवं आत्मसिद्धि प्रम्यय को अनिवार्य मानते हुए जैविक (शारीरिक, आर्थिक तथा मनोरन्जन सम्बन्धी) तथा अति जैविक (सामाजिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक, सौन्दर्यात्मक तथा धार्मिक) मूल्यों का विभाग किया है। उनके अनुसार सत्य शिव तथा सुन्दर अन्योऽन्य सम्बद्ध रूप में मानवीय क्रियाओं के ज्ञानात्मक, संकल्पात्मक तथा भावात्मक पक्ष हैं। इस दृष्टि से भी निरपेक्ष सत् ही सनातन मूल्य है, जिसकी सापेक्ष अभिव्यक्ति शिवसंकल्प है।
निरपेक्ष मूल्य की प्रतिष्ठा सापेक्ष मूल्यों की सकारात्मक अभिव्यक्ति द्वारा ही सम्भव है, जिसके अनुकूल लोक-व्यवहार के नियन्त्रण हेतु प्रत्येक मानव समाज में सामाजिक व्यवस्था तथा आचार-संहिता निर्मित की गई। भारतीय समाज में वर्ण तथा वर्णाश्रम के विभाग द्वारा सामाजिक व्यवस्था कर विशिष्ट तथा सामान्य आचार-संहिता प्रस्तुत कर समाज के बौद्धिक, नेतृत्वशील तथा उन्नत चेतना वाले वर्ग विशेष को व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस व्यवस्था के सूत्रधार शासक वर्ग से ऐसे शासन की अपेक्षा की गई, जो सर्वप्रकारेण प्रजा के कल्याण में रत रहकर एक ऐसे निश्चित लक्ष्य वाले, निश्चित तथा भयमुक्त समाज का निर्माण करे, जिसमें दण्ड नीति (न्याय) पूर्वक आत्मानुशासन तथा आत्म-चेतना की समग्र अभिव्यक्ति के अवसर सभी को प्राप्त हो सकें। इस मूल्य परक शासन का उद्देश्य आत्महित चिन्तन न होकर प्रजारन्जन कहा गया। प्राचीन भारत में शासन का सूत्र राजा के हाथ में होता था, जो प्रजा से किसी न किसी रूप में सम्पर्क सूत्र बनाए रख कर, कर्तव्यनिष्ठा, समर्पित तथा विश्वासपात्र सेवकों को नियुक्त कर लोकहितार्थ कार्य सम्पादन करता था।
भारतीय इतिहास में पर्याप्त समय तक राजतन्त्र तथा लोकतन्त्र का भेद नहीं था। इसका कारण सम्भवतः राजसत्ता द्वारा प्रजा के प्रति सर्वथा पारिवारिक भावना और प्रजा की शासकीय नीतियों के प्रतिनिष्ठा तथा उनके न्यायपूर्ण क्रियान्वयन के प्रति विश्वास ही रहा होगा। लोकेच्छा का सम्मान करते हुए सामाजिक संस्कार तथा परिष्कार हेतु दण्डनीय (न्याय व्यवस्था) का आश्रय ग्रहण करने वाली प्रभुसत्ता के रूप में जो शासन लोक शंसित हुआ, उसमें आमात्यों तथा सचिवों के मण्डल की सहायता से शासन करने वाला राजा भी अनुशासन की मर्यादा को भंग नहीं कर सकता था। रामायण, महाभारत, मनुस्मृति तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मूल्यनिष्ठ शासन के सदस्यों का विस्तारपूर्वक विवेचना किया गया है।
मनुस्मृति में राजधर्म के प्रसंग में शासन की धर्म मूलकता तथा सत्यनिष्ठा की रक्षा के लिए सभासदों को उत्तरदायी मानते हुए कहा गया है कि, जहाँ सभासदों के सक्षम अधर्म द्वारा धर्म तथा अनृत द्वारा सत्य का हनन किया जाता है वहाँ सभासदों का भी विनाश हुए बिना नहीं रहता -
यत्र धर्मो हयधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च।
हन्यते प्रेक्षमाणानां, हतास्तत्र सभासदः।।
इस अर्थ के फलभाक् धर्म-विधायक, साक्षी, सभी सभासद तथा राजा, चार लोग होते हैं। इस कथन से स्पष्ट होता है, कि प्रशासन में लोक तथा शासक दोनों पक्षों का समान उत्तरदायित्व है।
कौटिल्य ने राज्य को सहायसाध्य कहकर सचिवों तथा अध्यक्षों (प्रशासनिक अधिकारियों) की नियुक्ति तथा राजा द्वारा उनके मत को विचारपूर्वक सुनने का परामर्श दिया है-
सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं च वर्तते।
कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च श्रृणुयान्मतम्।।
विशिष्ट विभागों के सन्चालनार्थ सम्बन्धित सचिव के अधीनस्थ विभिन्नस्तरीय अध्यक्षों की नियुक्ति प्रक्रिया तथा उनके कर्तव्यों का विस्तृत विवेचन ‘अर्थशास्त्र’ में प्राप्त होता है। प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से कोष, राजस्व, आय-व्यय, कोषागार, आयात-निर्यात, सेना तथा उसके अंग, आयुधागार, मापतोल आदि विभागों में नियुक्त अधिकारी न्यायपूर्वक निःस्वार्थ सेवाभाव से कार्य करते हुए सुख-समृद्धि तथा संस्कार युक्त सामाजिक वातावरण का सृजन करें, यही प्रशासनिक व्यवस्था का उद्देश्य कहा गया है।
कौटिल्य की यह प्रशासन नीति उदारवादी होने के साथ ही जनता के ज्ञान के लिए भी उपयोगी थी। विचार करने पर वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रशासन के मूल तत्वों की पृष्ठभूमि में भी अर्थशास्त्र सम्मत दण्डनीति ही है। अन्तर केवल इतना है कि वर्तमान शासन पूर्णरूप से लोकाश्रित है, क्योंकि इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नीति निर्धारण करने वाले लोक अन्तर्दृष्टिपूर्वक नीतियों के सुचारू क्रियान्वयन हेतु श्रंखलाबद्ध प्रशासन की संरचना करते हैं। प्रशासन बिना किसी भेदभाव के कुछ निश्चित मूल्यों के आधार पर न्यायपूर्वक जन-जन का योग-क्षेम वहन करता है। इस प्रकार जन-हित में अन्यान्य संगठनात्मक इकाइयों की व्यवस्था तथा उनकी कार्य-योजनाओं द्वारा अभ्युदय की अविच्छिन्न परम्परा का सृजन कर समग्र विकास के लक्ष्य की पूर्ती ही लोकानुगत प्रशासन का मुख्य दायित्व होता है।
‘लोक-प्रशासन’ शब्द संकुचित अर्थ में अधिक प्राचीन नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जर्मनी तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में लोकतान्त्रिक प्रशासन के सुनियोजित तथा वैज्ञानिक मूल्यांकनपरक अध्ययन की दृष्टि से अनेक घटो के आधार पर उसे परिभाषित किया गया। बहुवचनवाचक ‘लोक’ शब्द तथा गुणात्मक प्रकर्ष को घोषित करने वाले ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘प्रशासन’ शब्द का परस्पर संयोजन बहुसंख्यक जन समुदाय के लिए उत्कृट राज्य व्यवस्था सूचक है। इस व्यवस्था में शासन के समान ही लोक का उत्तरादायित्व भी कम नहीं होता, क्योंकि उत्कृष्ट नागरिक चेतना के बिना प्रशासन अपने लक्ष्य को सुगमता पूर्वक नहीं प्राप्त कर सकता तथा अच्छी नागरिक-चेतना के लिए अनुशासन, मानवीय संवेदना तथा चरित्र आवश्यक है। इस आधार पर प्रशासन तथा जनता के समान लक्ष्यों तथा सम्मिलित प्रयासों का संगठन ही लोक प्रशासन है। बिना दोनों पक्षों की सहभागिता तथा सहज सम्बन्धों के, लोकहितों की सम्पूर्ण रक्षा, सभी मानवों को भेद रहित सुख समृद्धि के अवसर उपलब्ध कराना, सभी मानवों-संसाधनों का यथायोग्य नियोजन तथा इसके द्वारा स्वस्थ एवं मूल्य निष्ठ सामाजिक वातावरण का निर्माण सम्भव नहीं।
स्वरूप की सृष्टि से लोक-प्रशासन के वे ही तीन घटक हंै, जो लोकतन्त्रात्मक शासन के। वे हैं जनता के लिए जनता के द्वारा जनता का शासन। उल्लेखनीय है, कि प्रशासक वर्ग भी जनता के मध्य रहने वाला सामाजिक व्यक्ति होता है, अतः पहले वह लोक-समूह का सदस्य है, तत्पश्चात् प्रशासक। अतः बहुत सी व्यावहारिक समस्याएं लोक-सामान्य तथा लोक-प्रशासक के समक्ष एकरूप में ही होती हैं, जिनका निराकरण भी दोनों के तादात्म्यपूर्ण व्यवहार द्वारा ही सम्भव है। यह तभी सम्भव है, जब लोक प्रशासक स्वयं को ‘लोक सेवक’ के रूप में प्रस्तुत करें। इसकेलिए उसमें मानवीय साम्य की भावना, नैतिकतापूर्ण आचरण, मूल्यपरक अन्तर्दृष्टि, विधिसम्मत निर्णय, पारदर्शी कार्यप्रणाली, दृढ इच्छाशक्ति एवं निर्णयों के प्रति वैयक्तिक, विशेषतः आत्महित तथा आत्माभिरूचि के स्थान पर जनहित तथा सद्विवेक पूर्वक ‘उचित’ के क्रियान्वयन का संकल्प होना आवश्यक है। इन विशेषताओं की व्यावहारिक सम्पूर्ति के लिए व्यक्तिनिष्ठ तथा वस्तुनिष्ठ यथार्थ में स्पष्ट नैतिक अन्तर का ज्ञान अनिवार्य है।
सरकारी नीतियों के विधिसम्मत, औचित्यपूर्ण तथा जनहितार्थ क्रियान्वयन हेतु अपेक्षित तथा प्रासंगिक प्रबन्धतक्नीकों के प्रयोग द्वारा समग्र क्षमता तथा कौशलपूर्वक कार्यनियोजन में सन्तुलन स्थापित करके, न्यूनतम आर्थिक संसाधनों द्वारा अधिकतम उपलब्धि प्रशासन की सफलता का रहस्य है। यह लोक प्रशासन के नीति कौशल का परिचालक है। उक्त विषयक उपलब्धियों का जन-कल्याण तथा सामूहिक लाभ के लिए उपयोग की भावना को जागृत करता है, जो प्रशासन के सेवा कौशल का द्योतक है। इस दृष्टि से लोक-प्रशासन ‘लोक’ का मस्तिष्क तथा ‘लोकतान्त्रिक शासन’ का मेरूदण्ड है।
एक आदर्श प्रशासन का मूल्यांकन इस तथ्य पर किया जा सकता है, कि उसके कार्य क्षेत्र में निवास करने वाली जनता कितनी जाग्रत तथा दायित्वपूर्ण है। प्रशासन का लोक तथा सरकार के मध्य किस सीमा तक समायोजन है। इस प्रकार लोक प्रशासन सामूहिक चेतना से सन्चालित होने वाला, सरकारी नीतियों का क्रियात्मक पक्ष है, जो अपने कार्याें द्वारा वैयक्तिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय तथा मानवीय नैतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति द्वारा सनातनमूल्य ‘सत्’ की प्रतिष्ठा में महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह करता है। इस रूप में मूल्य-निरपेक्ष प्रशासन की कल्पना निराधार तथा असम्भव है।
जैसा कि पूर्व अनुच्छेदों से स्पष्ट है, कि मूलरूप में सत्य-निष्ठा तथा नैतिक चेतना प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव है, जो उसे औचित्यानौचित्य की आत्म चेतना प्रदान करती है। किन्तु, अनेक वाह्य कारण तथा संवेदनागत मानवीय न्यूनताएं प्रायः उसके आचरण को प्रभावित करती हैं। फलतः अनेक नैतिक, सामाजिक तथा आर्थिक अपराध जन्म लेते हैं। शास्त्रों में ये व्यक्तिगत न्यूनताएं काम क्रोध लोभ मोह, मद तथा मात्सर्य के नाम से उल्लिखित हैं, जो सनातन मूल्य का हनन करने वाली हैं। इस स्थिति में लोक प्रशासन का बहुत बड़ा दायित्व लोक नियन्त्रण भी होता है। कभी प्रशासनिक स्तर पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कार्यक्रमों, प्रचारमाध्यमों, कार्यशालाओं, शिविरों तथा अन्य योजनाओं द्वारा जनता में आत्मानुशासन, राष्ट्र-चेतना तथा समाज के प्रति नैतिक दायित्व-बोध के रूप में लोक-नियन्त्रण की आवश्यकता होती है, तो कभी दण्ड प्रक्रिया के द्वारा सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिक अपराधों के उन्मूलन के रूप में। इस स्थिति में नीर-क्षीर-विवेक द्वारा सदसत् का अन्वीक्षण तथा निष्पक्ष न्याय आदर्श समाज के स्वरूप को चित्रित कर सकता है।
वर्तमान परिस्थितियों में नैतिक, ईमानदार तथा सिद्धान्तवादी प्रशासक के लिए कार्य करना एक जटिल चुनौती है तथा भ्रष्ट प्रशासक के लिए लज्जा तथा आत्म-विश्लेषण का विषय। क्योेंकि प्रशासन के मूल में लोक-सेवा तथा लोक न्याय की जो भावना निहित होती है, उसका समादर तथा अनुपालन प्रशासन का नैतिक तथा वैधानिक दायित्व है।
द्वितीय व्यावहारिक कठिनाई है प्रशासन पर कठोर सरकारी नियन्त्रण। प्रायः राजनीति (जिसे कूटनीतिक कहना अधिक उपयुक्त होगा) प्रभाव तथा प्रच्छन्न दबाव के कारण प्रशासक जानते तथा चाहते हुए भी कार्य-योजनाओं का निस्तारण इस प्रकार नहीं कर पाता कि उसका सम्पूर्ण लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग को मिले। इस प्रकार की कठिनाई सर्वाधिक आर्थिक नियोजन से सम्बन्धित होती है। लोभ का आवरण लोकहित तथा राष्ट्रहित को अदृश्य तथा अविचार्य बना देता है। फलतः जनता में न केवल असन्तोष तथा विद्रोह जागृत होता है, अपितु अचेतन रूप से सामूहिक स्तर पर नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है। अतः विवेक, अन्तर्दृष्टि एवं आत्मानुशासन द्वारा सत्य-पालन की दृढ़ इच्छाशक्ति ‘बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय’ के आदर्श तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के लक्ष्य की पूर्ती हेतु आवश्यक है, जिसके लिए लोक प्रशासन की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह लोक का ‘आदर्श’ तथा सर्वाधिक सुलझे हुए व्यक्तियों द्वारा सन्चालित होता है, जो राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लोक-हित की आवश्यकताओं से सर्वाधिक अवगत होते हैं, ऐसा समझा जाता है।
चिन्ता का विषय यह है, कि अनृतपूर्ण स्वार्थ लिप्सा के पंक में आपदमस्तक डूबा हुआ समाज भौतिक समृद्धि की येन-केन प्रकारेण प्राप्ति को ही जीवन मूल्यों की कसौटी समझने लगा है। फलतः पारिवारिक तथा सामाजिक विघटन, अपराध तथा राष्ट्र द्रोह की समस्या विकराल रूप ले रही है। प्रशासन भी इस संक्रामक रोग से अछूता नहीं है। ‘लोक’ के स्थान पर राजनेताओं को ‘सन्तुष्ट’ करने तथा अधिकारों के दुरूपयोग में प्रशासन की क्षमता सर्वाधिक व्यय हो रही है। प्रशासकों का एक बहुत छोटा वर्ग ऐसा भी है, जो निष्ठापूर्वक, कर्तव्य मार्ग पर चलता हुआ किसी प्रभाव अथवा दबाव की चिन्ता किए बिना लोक सेवा में रत है। ऐसे प्रशासक जनता की प्रशंसापूर्ण दृष्टि के अतिरिक्त, पुरस्कार के स्थान पर प्रायः अपने समकक्ष, उच्चस्तरीय तथा निम्नस्तरीय भ्रष्ट अधिकारियों के आक्रोश का शिकार होकर अनेक प्रकार से उत्पीडि़त हैं। अनैतिक के झन्झावात में वे कब तक अस्तित्व की रक्षा कर पाएंगें, यह विचार का विषय है, किन्तु ऐसे प्रशासकों को निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
वस्तुतः आज सामान्य प्रशासकीय चरित्र में अनुशासन, संकल्प शक्ति तथा दृढ़ता की आवश्यकता है। अपने राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अशोक चक्र, में अंकित आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ के मर्म को हृदयङगम कर अपने-अपने विभागों द्वारा स्वीकृत आदर्श वाक्यों में निहित मूल्यों के अनुरूप आचरण की आवश्यकता है। उदाहरणार्थ पुलिस विभाग जिसका लोक से सर्वाधिक घनिष्ट सम्बन्ध है, सबसे अधिक सन्दिग्ध तथा विवादास्पद बन गया है। ‘परित्राणाय साधूनाम्’ का आदर्श चैकियों, थानों तथा अन्य उच्चस्तरीय कार्यालयों की दीवार की शोभा न बन कर सम्बन्धित कर्मचारियों का चरित्र बन जाए, इसके लिए सर्वप्रथम पुलिस प्रशासन को आदर्श प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। सामाजिक असुरक्षा और भय के वातावरण को परिवर्तित किये बिना व्यक्ति तथा राष्ट्र के अभ्युदय की कल्पना असम्भव है। अतः लोक प्रशासन की सफलता मूल्यपरक, निष्पक्ष तथा न्याय सम्मत कार्य-प्रणाली पर निर्भर है। प्रशासन के क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र चुनने वालों को कुछ तथ्यों का ध्यान प्रतिपल रखना आवश्यक है। संक्षेप में वे इस प्रकार हैं-
1. सामाजिक, आर्थिक तथा मनोवैज्ञानिक स्तर पर सर्वहित में कार्य करना लोक प्रशासन का उद्देश्य।
2. लोक चेतना का नियन्त्रण तथा उसकी सहभागिता का सम्मान।
3. प्रशासकीय चरित्र में सेवा-भाव, समयबद्धता तथा अनुशासन का दृढ़तापूर्वक समावेश।
4. अपने क्षेत्र की जन समस्याओं तथा उनके निस्तारण का व्यापक ज्ञान।
5. संविधान प्रशासन का आदर्श, किन्तु मानवीय हित सर्वोपरि।
इस प्रकार विवेक, निष्ठा तथा समर्पणपूर्वक सम्पादित प्रत्येक कार्य लोक कल्याण के साथ ही आत्मतोष का हेतु है। उसके लिए लौकिक व्यवधानों, कष्टों तथा असुविधाओं की गणना निर्मूल्य है। सादा जीवन, सरल व्यवहार, संवेदनात्मक तथा सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि के साथ ही औचित्य तथा न्यायपूर्ण निर्णय की दृढ़ता तथा क्षणिक जीवन स्तर के स्थान पर स्थायी मूल्यों की ओर अपनी महात्वकांक्षाओं को उन्मुख करना एक प्रतिबद्ध प्रशासक के लक्ष्यपूर्ति के मूलमन्त्र हैं। इस प्रकार निश्चित रूप से मूल्य केन्द्रित, परिष्कृत तथा श्रेष्ठ समाज की रचना कर लोक प्रशासन सनातन मूल्य सत् की ही प्रतिष्ठा का वाहक होगा। ु
- वी॰एस॰एस॰डी॰ कालेज, कानपुर।
इससे भी अधिक दुःखद विडम्बना की बात यह है, कि लोक-हितों के लिए मनसा-वाचा- कर्मणा समर्पण कर शपथ लेने वाले लोक प्रतिनिधियों तथा जन सेवा के पुण्य उद्देश्य से शासन का दायित्व वहन करने वाले प्रशासन-तन्त्र में अनुशासन एवं व्यवस्था केवल आदर्श के विषय रह गए हैं। जन-सामान्य राजनैतिक तथा सामाजिक सुरक्षा के प्रति सदैव आशंकित तथा भयभीत रहता है। फलतः प्रशासन के प्रति लोक-विश्वास एवं आस्था स्थिर नहीं हो पा रही है। भौतिक इच्छाओं की पूर्ती में परस्पर स्पर्धा ने उन जीवन मूल्यों का हनन किया है, जो व्यक्ति तथा राष्ट्र के उन्नयन के लिए सदैव उपादेय हैं। ऐसा प्रतीत होता है, कि समाज का एक बड़ा भाग, चाहें वह शासन तन्त्र हो, अथवा जनता, दिग्भ्रमित हो गया है।
इस स्थिति में ‘सनातन मूल्य’ के पुनरीक्षण द्वारा जनमत-समर्थित लोकतान्त्रिक प्रशासन का मूल्याप्रेक्षत्व प्रासंगिक चर्चा का विषय है, क्योंकि लोक शासन अथवा लोक प्रशासन का सम्बन्ध अपने अधिकार क्षेत्र के प्रत्येक व्यक्ति के हित-चिन्तन तथा सर्वतोमुखी विकास से है, जो समर्पण और सेवाभावना द्वारा असत् (अनुचित तथा अयथार्थ) के उन्मूलन तथा सत् (उचित एवं यथार्थ) के प्रतिष्ठापन से ही सम्भव है।
उक्त सन्दर्भ में ‘सनातन मूल्य’ के स्वरूप पर अनुचिन्तन तथा इस परिप्रेक्ष्य में लोकशासन के स्वरूप, उद्देश्य एवं कार्यप्रणाली का मूल्यांकन आवश्यक है। विकसित तथा विकासशील देशों, विशेषतः आध्यात्मिक पृष्ठभूमि वाले भारत जैसे राष्ट्र में सनातन मूल्य न केवल मानव, अपितु समग्र जैविक अस्तित्व का मूलाधार है। ‘सनातन’ पद का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है ‘सदा होने वाला’। इस दृष्टि से कालिक-समष्टि के नित्य-सत्तात्मक प्रत्यय का वाचक ‘सनातन’ नित्य, चिरन्तन, अविच्छिन्न सत्ता का विशेषण है। मूल प्रतिष्ठायाम् धातु से व्युत्पन्न ‘मूल्य’ पद का अर्थ है ‘प्रतिष्ठा के योग्य।’ अतः देशकाल की मर्यादा से परे सर्वदा, सर्वत्र, मूलतः प्रतिष्ठित किए जाने योग्य तत्व ‘सनातन मूल्य’ है। वह तत्व क्या है? इस पर भौतिक विचार की आवश्यकता है।
मानव जीवन पुरूषार्थमूलक है, जिसका प्रयोजन परक पर्यवसान ‘परम आनन्द’ की प्राप्ति में है, तथा क्रियाजन्य उपलब्धि निरन्तर विकासोन्मुखी चेतना के सतत जागरण में है। इस प्रकार समस्त पुरूषार्थगत चेतना का सार भी वही निरपेक्ष सत् है, जो जगत् को अबाध सन्चालित करने वाली नैसर्गिक व्यवस्था का मूल कारण है। वह अक्षर (अविनाशी), ब्रह्म (सर्वव्यापक), चैतन्य (शक्तिमान्), आनन्द (दुःखनिवृत्तिरूप) तथा परम पुरूषार्थ होने के कारण परम साध्य है। अतः सनातन मूल्य है, सदा प्रतिष्ठेय है। वस्तुतः सत् पदार्थ मात्र का स्वभाव है। ‘एंक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ की कल्पना में यही तात्पर्य निहित है। इसी कारण वनस्पति आदि जड़ पदार्थ तथा जीव-जन्तु आदि अक्षर कोटि के प्राणी भी आश्चर्यजनक रूप से अनुशासन तथा व्यवस्था में रह कर स्वधर्म का पालन करते हैं। फिर मेधा के अक्षय वरदान से सम्पन्न मानव का तो जीवनाधार ही धर्मनिष्ठ नैतिक आचरण है। निम्न से निम्न कोटि की मानसिकता वाला मनुष्य भी जानबूझ कर अनैतिक (अनुचित) कार्य नहीं करना चाहता और अपने कृत्य के अधर्म तथा पाप युक्त होने का बोध होने पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, व्यक्त अथवा अव्यक्त रूप में आत्मग्लानी, सन्ताप तथा ईश्वर से समायाचना का भाव यह प्रमाणित करते हंै, कि उसकी आत्म-चेतना सन्मूलक है।
व्यवहारिक रूप से सत् (उचित) मानव का साक्ष्य तथा उसकी प्रतिष्ठार्थ किया गया लोकशंसित आचरण (धर्म) साधन है। तात्विक रूप से साध्य तथा साधन, मूल्य तथा धर्म एक है, क्योंकि ‘धर्म’ ‘सत्’ की अभिव्यक्ति से भिन्न कुछ नहीं। वैयक्तिक तथा सामाजिक, भौतिक तथा आध्यात्मिक, प्राकृत तथा सांस्कृतिक, शाश्वत तथा सामयिक धर्म लोकदर्श के रूप में सनातन मूल्य के प्रति निष्ठा करता है। उसका प्रतिमान श्रेष्ठ व्यक्तियों का आचरण होता है। जैसा कि श्रीमद्भगवद गीता में भगवान कहते हैं -
यद्यदाचरित श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
काल सापेक्ष हो कर वह युग तथा देश सापेक्ष होकर लोक धर्म बन जाता है। भारतीय मनीषियों ने सार्वभौम तथा शाश्वत सद्रूप मूल्य की प्रतिष्ठा हेतु पुरूषार्थ चतुष्टय की कल्पना कर धर्म, अर्थ तथा काम (त्रिवर्ग) को प्रवृत्तिमूलक, अतः क्रियात्मक यथार्थ के रूप में तथा मोक्ष को निवृत्तिमूलक, अतः मूल सत्तात्मक यथार्थ के रूप में स्वीकार किया। वैशेषिक दर्शन ने उसी यथार्थ को लोक व्यवहार की सरलता की दृष्टि से अभ्युदय तथा निःश्रेयस के रूप में स्वीकार कर उन्हें धर्मसाक्ष्य बतलाया -
यतोऽभ्युदयनिःश्रेयस सिद्धिः सधर्मः।
अभ्युदय द्वारा भौतिक उपलब्धि जन्य आनन्द तथा निःश्रेयस द्वारा आत्मानुभूति जन्य आनन्द की प्राप्ति सम्भव है। उल्लेखनीय है, कि उत्तरोत्तर उच्च से उच्चतर अवस्था को प्राप्त करने की सहज आकांक्षा मानव का स्वभाव है। यह निरन्तर ऊध्र्वगति ही अभ्युदय है, जो लौकिक प्रतिष्ठा के भाग से होकर आत्मप्रतिष्ठा की पराकाष्ठा पर पहुँचकर निःश्रेयस कहलाता है, जिससे परे कोई श्रेय अवशिष्ट नहीं रहता। इस प्रकार ‘अभ्युदय’ तथा ‘निःश्रेयस’ ‘प्रेय’ तथा ‘श्रेय’ के योग से जीवन की पूर्णता प्राप्त होती है। पूर्णता की प्राप्ति ही सत् की प्रतिष्ठा है। लोक के धरातल पर ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की अनुभति उस पूर्णता का स्वरूप है तथा ‘आत्मंनः प्रतिकूलानि परेषां न समायरेत्’ की भावना पूर्णत्वानुभूति का साधन। व्यागपूर्वक भोग तथा निर्लोभ का आदर्श तदनुकूल आचरण का मन्त्र।
भोग का यह आदर्श जन-जन को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सन्देश देता है, जिसके मूल में ‘मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्’ की सौहार्दपूर्ण कामना निहित है। विश्वात्मवाद की यह कल्पना व्यष्टि और समष्टि के अन्तर को मिटाकर जातिवर्ग के भेदभाव से रहित लोक के उस स्वरूप को व्यक्त करती है, जहाँ आत्मीयता, करूणा और प्रेम की त्रिवेणी विश्व शान्ति, विश्व कल्याण तथा एकात्वानुभूति की पावन धारा में जन-मन को आप्लावित कर देती है। व्यष्टि और समष्टि का यह समन्वय निश्चित रूप से निःश्रेयस (कल्याण), प्रयोजनरूप क्रिया की सिद्धि (अपवर्ग) अशिव तथा अवान्छनीय से मुक्ति (मोक्ष) तथा विवेकपूर्ण एकत्वानूभूति (कैवल्य) का व्यावहारिक तात्पर्य है। समग्र रूप में सनातन मूल्य का यही स्वरूप है।
विश्व के अन्य देशों के चिन्तक पुरूषार्थ जैसे किसी तत्व को नहीं स्वीकार करते, किन्तु सत्य, शिव, सुन्दर के एकत्र-अवस्थान भूत नैतिक यथार्थ को सनातन मूल्य स्वीकार कर विश्व मंगल तथा शिव संकल्प को मानव जीवन का लक्ष्य मानते हैं। काण्ट और प्लेटो जैसेे दार्शनिक शिव को क्रमशः निरपेक्ष तथा नैतिक मूल्य के रूप में परिभाषित करते हैं, जबकि अर्बन ने मानवीय मूल्य के प्रसंग में आत्मानुभूति एवं आत्मसिद्धि प्रम्यय को अनिवार्य मानते हुए जैविक (शारीरिक, आर्थिक तथा मनोरन्जन सम्बन्धी) तथा अति जैविक (सामाजिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक, सौन्दर्यात्मक तथा धार्मिक) मूल्यों का विभाग किया है। उनके अनुसार सत्य शिव तथा सुन्दर अन्योऽन्य सम्बद्ध रूप में मानवीय क्रियाओं के ज्ञानात्मक, संकल्पात्मक तथा भावात्मक पक्ष हैं। इस दृष्टि से भी निरपेक्ष सत् ही सनातन मूल्य है, जिसकी सापेक्ष अभिव्यक्ति शिवसंकल्प है।
निरपेक्ष मूल्य की प्रतिष्ठा सापेक्ष मूल्यों की सकारात्मक अभिव्यक्ति द्वारा ही सम्भव है, जिसके अनुकूल लोक-व्यवहार के नियन्त्रण हेतु प्रत्येक मानव समाज में सामाजिक व्यवस्था तथा आचार-संहिता निर्मित की गई। भारतीय समाज में वर्ण तथा वर्णाश्रम के विभाग द्वारा सामाजिक व्यवस्था कर विशिष्ट तथा सामान्य आचार-संहिता प्रस्तुत कर समाज के बौद्धिक, नेतृत्वशील तथा उन्नत चेतना वाले वर्ग विशेष को व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस व्यवस्था के सूत्रधार शासक वर्ग से ऐसे शासन की अपेक्षा की गई, जो सर्वप्रकारेण प्रजा के कल्याण में रत रहकर एक ऐसे निश्चित लक्ष्य वाले, निश्चित तथा भयमुक्त समाज का निर्माण करे, जिसमें दण्ड नीति (न्याय) पूर्वक आत्मानुशासन तथा आत्म-चेतना की समग्र अभिव्यक्ति के अवसर सभी को प्राप्त हो सकें। इस मूल्य परक शासन का उद्देश्य आत्महित चिन्तन न होकर प्रजारन्जन कहा गया। प्राचीन भारत में शासन का सूत्र राजा के हाथ में होता था, जो प्रजा से किसी न किसी रूप में सम्पर्क सूत्र बनाए रख कर, कर्तव्यनिष्ठा, समर्पित तथा विश्वासपात्र सेवकों को नियुक्त कर लोकहितार्थ कार्य सम्पादन करता था।
भारतीय इतिहास में पर्याप्त समय तक राजतन्त्र तथा लोकतन्त्र का भेद नहीं था। इसका कारण सम्भवतः राजसत्ता द्वारा प्रजा के प्रति सर्वथा पारिवारिक भावना और प्रजा की शासकीय नीतियों के प्रतिनिष्ठा तथा उनके न्यायपूर्ण क्रियान्वयन के प्रति विश्वास ही रहा होगा। लोकेच्छा का सम्मान करते हुए सामाजिक संस्कार तथा परिष्कार हेतु दण्डनीय (न्याय व्यवस्था) का आश्रय ग्रहण करने वाली प्रभुसत्ता के रूप में जो शासन लोक शंसित हुआ, उसमें आमात्यों तथा सचिवों के मण्डल की सहायता से शासन करने वाला राजा भी अनुशासन की मर्यादा को भंग नहीं कर सकता था। रामायण, महाभारत, मनुस्मृति तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मूल्यनिष्ठ शासन के सदस्यों का विस्तारपूर्वक विवेचना किया गया है।
मनुस्मृति में राजधर्म के प्रसंग में शासन की धर्म मूलकता तथा सत्यनिष्ठा की रक्षा के लिए सभासदों को उत्तरदायी मानते हुए कहा गया है कि, जहाँ सभासदों के सक्षम अधर्म द्वारा धर्म तथा अनृत द्वारा सत्य का हनन किया जाता है वहाँ सभासदों का भी विनाश हुए बिना नहीं रहता -
यत्र धर्मो हयधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च।
हन्यते प्रेक्षमाणानां, हतास्तत्र सभासदः।।
इस अर्थ के फलभाक् धर्म-विधायक, साक्षी, सभी सभासद तथा राजा, चार लोग होते हैं। इस कथन से स्पष्ट होता है, कि प्रशासन में लोक तथा शासक दोनों पक्षों का समान उत्तरदायित्व है।
कौटिल्य ने राज्य को सहायसाध्य कहकर सचिवों तथा अध्यक्षों (प्रशासनिक अधिकारियों) की नियुक्ति तथा राजा द्वारा उनके मत को विचारपूर्वक सुनने का परामर्श दिया है-
सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं च वर्तते।
कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च श्रृणुयान्मतम्।।
विशिष्ट विभागों के सन्चालनार्थ सम्बन्धित सचिव के अधीनस्थ विभिन्नस्तरीय अध्यक्षों की नियुक्ति प्रक्रिया तथा उनके कर्तव्यों का विस्तृत विवेचन ‘अर्थशास्त्र’ में प्राप्त होता है। प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से कोष, राजस्व, आय-व्यय, कोषागार, आयात-निर्यात, सेना तथा उसके अंग, आयुधागार, मापतोल आदि विभागों में नियुक्त अधिकारी न्यायपूर्वक निःस्वार्थ सेवाभाव से कार्य करते हुए सुख-समृद्धि तथा संस्कार युक्त सामाजिक वातावरण का सृजन करें, यही प्रशासनिक व्यवस्था का उद्देश्य कहा गया है।
कौटिल्य की यह प्रशासन नीति उदारवादी होने के साथ ही जनता के ज्ञान के लिए भी उपयोगी थी। विचार करने पर वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रशासन के मूल तत्वों की पृष्ठभूमि में भी अर्थशास्त्र सम्मत दण्डनीति ही है। अन्तर केवल इतना है कि वर्तमान शासन पूर्णरूप से लोकाश्रित है, क्योंकि इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नीति निर्धारण करने वाले लोक अन्तर्दृष्टिपूर्वक नीतियों के सुचारू क्रियान्वयन हेतु श्रंखलाबद्ध प्रशासन की संरचना करते हैं। प्रशासन बिना किसी भेदभाव के कुछ निश्चित मूल्यों के आधार पर न्यायपूर्वक जन-जन का योग-क्षेम वहन करता है। इस प्रकार जन-हित में अन्यान्य संगठनात्मक इकाइयों की व्यवस्था तथा उनकी कार्य-योजनाओं द्वारा अभ्युदय की अविच्छिन्न परम्परा का सृजन कर समग्र विकास के लक्ष्य की पूर्ती ही लोकानुगत प्रशासन का मुख्य दायित्व होता है।
‘लोक-प्रशासन’ शब्द संकुचित अर्थ में अधिक प्राचीन नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जर्मनी तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में लोकतान्त्रिक प्रशासन के सुनियोजित तथा वैज्ञानिक मूल्यांकनपरक अध्ययन की दृष्टि से अनेक घटो के आधार पर उसे परिभाषित किया गया। बहुवचनवाचक ‘लोक’ शब्द तथा गुणात्मक प्रकर्ष को घोषित करने वाले ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘प्रशासन’ शब्द का परस्पर संयोजन बहुसंख्यक जन समुदाय के लिए उत्कृट राज्य व्यवस्था सूचक है। इस व्यवस्था में शासन के समान ही लोक का उत्तरादायित्व भी कम नहीं होता, क्योंकि उत्कृष्ट नागरिक चेतना के बिना प्रशासन अपने लक्ष्य को सुगमता पूर्वक नहीं प्राप्त कर सकता तथा अच्छी नागरिक-चेतना के लिए अनुशासन, मानवीय संवेदना तथा चरित्र आवश्यक है। इस आधार पर प्रशासन तथा जनता के समान लक्ष्यों तथा सम्मिलित प्रयासों का संगठन ही लोक प्रशासन है। बिना दोनों पक्षों की सहभागिता तथा सहज सम्बन्धों के, लोकहितों की सम्पूर्ण रक्षा, सभी मानवों को भेद रहित सुख समृद्धि के अवसर उपलब्ध कराना, सभी मानवों-संसाधनों का यथायोग्य नियोजन तथा इसके द्वारा स्वस्थ एवं मूल्य निष्ठ सामाजिक वातावरण का निर्माण सम्भव नहीं।
स्वरूप की सृष्टि से लोक-प्रशासन के वे ही तीन घटक हंै, जो लोकतन्त्रात्मक शासन के। वे हैं जनता के लिए जनता के द्वारा जनता का शासन। उल्लेखनीय है, कि प्रशासक वर्ग भी जनता के मध्य रहने वाला सामाजिक व्यक्ति होता है, अतः पहले वह लोक-समूह का सदस्य है, तत्पश्चात् प्रशासक। अतः बहुत सी व्यावहारिक समस्याएं लोक-सामान्य तथा लोक-प्रशासक के समक्ष एकरूप में ही होती हैं, जिनका निराकरण भी दोनों के तादात्म्यपूर्ण व्यवहार द्वारा ही सम्भव है। यह तभी सम्भव है, जब लोक प्रशासक स्वयं को ‘लोक सेवक’ के रूप में प्रस्तुत करें। इसकेलिए उसमें मानवीय साम्य की भावना, नैतिकतापूर्ण आचरण, मूल्यपरक अन्तर्दृष्टि, विधिसम्मत निर्णय, पारदर्शी कार्यप्रणाली, दृढ इच्छाशक्ति एवं निर्णयों के प्रति वैयक्तिक, विशेषतः आत्महित तथा आत्माभिरूचि के स्थान पर जनहित तथा सद्विवेक पूर्वक ‘उचित’ के क्रियान्वयन का संकल्प होना आवश्यक है। इन विशेषताओं की व्यावहारिक सम्पूर्ति के लिए व्यक्तिनिष्ठ तथा वस्तुनिष्ठ यथार्थ में स्पष्ट नैतिक अन्तर का ज्ञान अनिवार्य है।
सरकारी नीतियों के विधिसम्मत, औचित्यपूर्ण तथा जनहितार्थ क्रियान्वयन हेतु अपेक्षित तथा प्रासंगिक प्रबन्धतक्नीकों के प्रयोग द्वारा समग्र क्षमता तथा कौशलपूर्वक कार्यनियोजन में सन्तुलन स्थापित करके, न्यूनतम आर्थिक संसाधनों द्वारा अधिकतम उपलब्धि प्रशासन की सफलता का रहस्य है। यह लोक प्रशासन के नीति कौशल का परिचालक है। उक्त विषयक उपलब्धियों का जन-कल्याण तथा सामूहिक लाभ के लिए उपयोग की भावना को जागृत करता है, जो प्रशासन के सेवा कौशल का द्योतक है। इस दृष्टि से लोक-प्रशासन ‘लोक’ का मस्तिष्क तथा ‘लोकतान्त्रिक शासन’ का मेरूदण्ड है।
एक आदर्श प्रशासन का मूल्यांकन इस तथ्य पर किया जा सकता है, कि उसके कार्य क्षेत्र में निवास करने वाली जनता कितनी जाग्रत तथा दायित्वपूर्ण है। प्रशासन का लोक तथा सरकार के मध्य किस सीमा तक समायोजन है। इस प्रकार लोक प्रशासन सामूहिक चेतना से सन्चालित होने वाला, सरकारी नीतियों का क्रियात्मक पक्ष है, जो अपने कार्याें द्वारा वैयक्तिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय तथा मानवीय नैतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति द्वारा सनातनमूल्य ‘सत्’ की प्रतिष्ठा में महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह करता है। इस रूप में मूल्य-निरपेक्ष प्रशासन की कल्पना निराधार तथा असम्भव है।
जैसा कि पूर्व अनुच्छेदों से स्पष्ट है, कि मूलरूप में सत्य-निष्ठा तथा नैतिक चेतना प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव है, जो उसे औचित्यानौचित्य की आत्म चेतना प्रदान करती है। किन्तु, अनेक वाह्य कारण तथा संवेदनागत मानवीय न्यूनताएं प्रायः उसके आचरण को प्रभावित करती हैं। फलतः अनेक नैतिक, सामाजिक तथा आर्थिक अपराध जन्म लेते हैं। शास्त्रों में ये व्यक्तिगत न्यूनताएं काम क्रोध लोभ मोह, मद तथा मात्सर्य के नाम से उल्लिखित हैं, जो सनातन मूल्य का हनन करने वाली हैं। इस स्थिति में लोक प्रशासन का बहुत बड़ा दायित्व लोक नियन्त्रण भी होता है। कभी प्रशासनिक स्तर पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष कार्यक्रमों, प्रचारमाध्यमों, कार्यशालाओं, शिविरों तथा अन्य योजनाओं द्वारा जनता में आत्मानुशासन, राष्ट्र-चेतना तथा समाज के प्रति नैतिक दायित्व-बोध के रूप में लोक-नियन्त्रण की आवश्यकता होती है, तो कभी दण्ड प्रक्रिया के द्वारा सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिक अपराधों के उन्मूलन के रूप में। इस स्थिति में नीर-क्षीर-विवेक द्वारा सदसत् का अन्वीक्षण तथा निष्पक्ष न्याय आदर्श समाज के स्वरूप को चित्रित कर सकता है।
वर्तमान परिस्थितियों में नैतिक, ईमानदार तथा सिद्धान्तवादी प्रशासक के लिए कार्य करना एक जटिल चुनौती है तथा भ्रष्ट प्रशासक के लिए लज्जा तथा आत्म-विश्लेषण का विषय। क्योेंकि प्रशासन के मूल में लोक-सेवा तथा लोक न्याय की जो भावना निहित होती है, उसका समादर तथा अनुपालन प्रशासन का नैतिक तथा वैधानिक दायित्व है।
द्वितीय व्यावहारिक कठिनाई है प्रशासन पर कठोर सरकारी नियन्त्रण। प्रायः राजनीति (जिसे कूटनीतिक कहना अधिक उपयुक्त होगा) प्रभाव तथा प्रच्छन्न दबाव के कारण प्रशासक जानते तथा चाहते हुए भी कार्य-योजनाओं का निस्तारण इस प्रकार नहीं कर पाता कि उसका सम्पूर्ण लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग को मिले। इस प्रकार की कठिनाई सर्वाधिक आर्थिक नियोजन से सम्बन्धित होती है। लोभ का आवरण लोकहित तथा राष्ट्रहित को अदृश्य तथा अविचार्य बना देता है। फलतः जनता में न केवल असन्तोष तथा विद्रोह जागृत होता है, अपितु अचेतन रूप से सामूहिक स्तर पर नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है। अतः विवेक, अन्तर्दृष्टि एवं आत्मानुशासन द्वारा सत्य-पालन की दृढ़ इच्छाशक्ति ‘बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय’ के आदर्श तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के लक्ष्य की पूर्ती हेतु आवश्यक है, जिसके लिए लोक प्रशासन की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह लोक का ‘आदर्श’ तथा सर्वाधिक सुलझे हुए व्यक्तियों द्वारा सन्चालित होता है, जो राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लोक-हित की आवश्यकताओं से सर्वाधिक अवगत होते हैं, ऐसा समझा जाता है।
चिन्ता का विषय यह है, कि अनृतपूर्ण स्वार्थ लिप्सा के पंक में आपदमस्तक डूबा हुआ समाज भौतिक समृद्धि की येन-केन प्रकारेण प्राप्ति को ही जीवन मूल्यों की कसौटी समझने लगा है। फलतः पारिवारिक तथा सामाजिक विघटन, अपराध तथा राष्ट्र द्रोह की समस्या विकराल रूप ले रही है। प्रशासन भी इस संक्रामक रोग से अछूता नहीं है। ‘लोक’ के स्थान पर राजनेताओं को ‘सन्तुष्ट’ करने तथा अधिकारों के दुरूपयोग में प्रशासन की क्षमता सर्वाधिक व्यय हो रही है। प्रशासकों का एक बहुत छोटा वर्ग ऐसा भी है, जो निष्ठापूर्वक, कर्तव्य मार्ग पर चलता हुआ किसी प्रभाव अथवा दबाव की चिन्ता किए बिना लोक सेवा में रत है। ऐसे प्रशासक जनता की प्रशंसापूर्ण दृष्टि के अतिरिक्त, पुरस्कार के स्थान पर प्रायः अपने समकक्ष, उच्चस्तरीय तथा निम्नस्तरीय भ्रष्ट अधिकारियों के आक्रोश का शिकार होकर अनेक प्रकार से उत्पीडि़त हैं। अनैतिक के झन्झावात में वे कब तक अस्तित्व की रक्षा कर पाएंगें, यह विचार का विषय है, किन्तु ऐसे प्रशासकों को निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
वस्तुतः आज सामान्य प्रशासकीय चरित्र में अनुशासन, संकल्प शक्ति तथा दृढ़ता की आवश्यकता है। अपने राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अशोक चक्र, में अंकित आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ के मर्म को हृदयङगम कर अपने-अपने विभागों द्वारा स्वीकृत आदर्श वाक्यों में निहित मूल्यों के अनुरूप आचरण की आवश्यकता है। उदाहरणार्थ पुलिस विभाग जिसका लोक से सर्वाधिक घनिष्ट सम्बन्ध है, सबसे अधिक सन्दिग्ध तथा विवादास्पद बन गया है। ‘परित्राणाय साधूनाम्’ का आदर्श चैकियों, थानों तथा अन्य उच्चस्तरीय कार्यालयों की दीवार की शोभा न बन कर सम्बन्धित कर्मचारियों का चरित्र बन जाए, इसके लिए सर्वप्रथम पुलिस प्रशासन को आदर्श प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। सामाजिक असुरक्षा और भय के वातावरण को परिवर्तित किये बिना व्यक्ति तथा राष्ट्र के अभ्युदय की कल्पना असम्भव है। अतः लोक प्रशासन की सफलता मूल्यपरक, निष्पक्ष तथा न्याय सम्मत कार्य-प्रणाली पर निर्भर है। प्रशासन के क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र चुनने वालों को कुछ तथ्यों का ध्यान प्रतिपल रखना आवश्यक है। संक्षेप में वे इस प्रकार हैं-
1. सामाजिक, आर्थिक तथा मनोवैज्ञानिक स्तर पर सर्वहित में कार्य करना लोक प्रशासन का उद्देश्य।
2. लोक चेतना का नियन्त्रण तथा उसकी सहभागिता का सम्मान।
3. प्रशासकीय चरित्र में सेवा-भाव, समयबद्धता तथा अनुशासन का दृढ़तापूर्वक समावेश।
4. अपने क्षेत्र की जन समस्याओं तथा उनके निस्तारण का व्यापक ज्ञान।
5. संविधान प्रशासन का आदर्श, किन्तु मानवीय हित सर्वोपरि।
इस प्रकार विवेक, निष्ठा तथा समर्पणपूर्वक सम्पादित प्रत्येक कार्य लोक कल्याण के साथ ही आत्मतोष का हेतु है। उसके लिए लौकिक व्यवधानों, कष्टों तथा असुविधाओं की गणना निर्मूल्य है। सादा जीवन, सरल व्यवहार, संवेदनात्मक तथा सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि के साथ ही औचित्य तथा न्यायपूर्ण निर्णय की दृढ़ता तथा क्षणिक जीवन स्तर के स्थान पर स्थायी मूल्यों की ओर अपनी महात्वकांक्षाओं को उन्मुख करना एक प्रतिबद्ध प्रशासक के लक्ष्यपूर्ति के मूलमन्त्र हैं। इस प्रकार निश्चित रूप से मूल्य केन्द्रित, परिष्कृत तथा श्रेष्ठ समाज की रचना कर लोक प्रशासन सनातन मूल्य सत् की ही प्रतिष्ठा का वाहक होगा। ु
- वी॰एस॰एस॰डी॰ कालेज, कानपुर।





