Tuesday, November 18, 2014

शून्य लागत (जीरो बजट) प्राकृतिक कृषि अभियान - गोपाल उपाध्याय

भारत में हरित क्रान्ति के नाम पर अन्धाधुन्ध रासायनिक उर्वरकों हानिकारक कीटनाशकों, हाईब्रिड बीजों एवं अधिकाधिक भूजल उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति, उत्पादन, भूजल स्तर और मानव स्वास्थ्य में निरन्तर गिरावट आयी है। किसान बढ़ती लागत एवं बाजार पर निर्भरता के कारण खेती छोड़ रहे हैं और आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो रहे हैं। बाद में आयी विदेशी तकनीक जैविक खेती, जिसमें वर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट, बायोडायनामिक आदि विधियांँ जटिल होने के कारण अन्ततः किसान को बाजार पर ही निर्भर बनाती हैं। अतः आवश्यकता है ऐसी कृषि पद्धति की, जिसमें किसान को बार-बार बाजार न जाना पडे़, उत्पादन न घटे, खेत उपजाऊ बने रहें तथा मानव रोगी न बनें। ऐसी कृषि पद्धति है ‘शून्य लागत प्राकृतिक खेती’, जिसमें 1 देशी गाय से 10-30 एकड़ खेती सम्भव है।
पिछले दो वर्षों में लोक भारती द्वारा पांँच दिवसीय, 13 स्थानों पर प्रशिक्षण वर्गों के आयोजन सम्पन्न हुए हैं, जिनके माध्यम से अब तक लगभग छः हजार किसान इस पद्धति का प्रशिक्षण प्राप्त कर सफलतापूर्वक लाभाकारी खेती कर रहे हैं।
शून्य लागत कैसे? -
1. मुख्य फसल का लागत मूल्य, साथ में उत्पादित सह फसलों के विक्रय से निकाल लेना और मुख्य फसल को बोनस (शून्य लागत) के रुप में लेना।
2. खेती के लिये कोई भी संसाधन - बीज, खाद, कीटनाशक आदि बाजार से न लेकर इसका निर्माण अपने घर या खेत में करके बाजारी लागत शून्य करना, जिससे गाँव का पैसा गाँव में रहेगा बाहर नहीं जायेगा। किसान को खेती करने के लिए बाजार से कुछ खरीदना नहीं होगा, तो कर्ज भी नहीं लेगा।
शून्य लागत खेती का आधार - प्रकृति में सभी जीवों एवं वनस्पति इकाईयों के भोजन की एक स्वालम्बी व्यवस्था है, जिसमेें मानव की भूमिका नहीं है। जिसका प्रमाण है बिना किसी मानवीय सहायता के जंगलों में खड़े हरे-भरे पेड़ व उनके साथ रहने वाले लाखों जीव-जन्तुओं का स्वाभाविक विकास होना। इस प्राकृतिक व्यवस्था को समझना व उसके अनुरुप खेती करना।
क्या है प्राकृतिक व्यवस्था? - पौधों के पोषण के लिये आवश्यक सभी 16 तत्व प्रकृति में उपलब्ध रहते हंै, जिन्हें पौंधे के भोजन के रुप (।अंपसंइसम थ्वतउद्ध में बदलने का कार्य मिट्टी में पाये जाने वाले करोड़ों सूक्ष्म जीवाणु करते हैं। यदि यह सूक्ष्म जीवाणु पर्याप्त संख्या में मिट्टी में उपलब्ध रहें तो अच्छी उपज के लिए किसी बाहरी पदार्थ की जरुरत नहीं पड़ेगी। इस पद्धति में पौधों को भोजन न देकर भोजन बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं की उपलब्धता पर जोर दिया जाता है। प्रकृति में इन सूक्ष्म जीवाणुओं की भी उपलब्धता की एक विशिष्ट व्यवस्था है? पौधा अपने पोषण के लिये मिट्टी से सभी तत्व लेता है। फसल के पकने के बाद उसका काष्ठ पदार्थ कूड़ा-करकट के रुप में मिट्टी के साथ अपघटित (क्मबवउचवेम) होकर, मिट्टी को उर्वरा-शक्ति लौटाता है।
देशी गाय का कृषि में महत्व - एक ग्राम देशी गाय के गोबर में 300-500 करोड़ सूक्ष्म जीवाणु पाये जाते हैं। गाय के गोबर में गुड़ एवं अन्य पदार्थ डालकर किण्वन (थ्मतउमदजंजपवद) से सूक्ष्म जीवाणु बढ़ाने की क्रिया तेज कराके तैयार जीवामृत व घनजीवामृत जब खेत में पड़ता है तो करोड़ांे सूक्ष्म जीवाणु भूमि में पहुंचते हैं, जो पौधों का भोजन निर्माण करते हैं। किसी बाहरी पदार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती।
देशी कंेचुओ का कृषि में महत्व - कंेचुआ मिट्टी, बालू, पत्थर (कच्चा व चूना) खाता हुआ धरती के नीचे 15 फुट गहराई तक भूमि के नीचे जाता है। धरती के नीचे से पोषक तत्वों को ऊपर लाता है तथा पौधे की जड़ के पास धरती के ऊपर अपनी विष्टा छोड़ता है जिसमें फसल के लिये सभी आवश्यक तत्वों का भण्डार होता है। केंचुआ जिस छेद से नीचे जाता है कभी उससे ऊपर नहीं आता है। भूमि में दिन रात करोड़ो छिद्र कर भूमि की जुताई करता रहता है। भूमि को मुलायम बनाता है एवं जब बारिश होती है तो इन्हीं छिद्रों से पूरा वर्षा जल भूमि में संग्रहित होता है।
शून्य लागत प्राकृतिक कृषि के चरण -
1. बीजामृत (बीज शोधन) - 5 किलो देशी गाय का गोबर, 5 ली0 गोमूत्र, 50 ग्राम चूना, एक मुट्ठी खेती की मिट्टी को 20 ली0 पानी में मिलाकर 24 घंटे रखें। दिन में दो बार लकड़ी से घोलें। तैयार बीजामृत को 100 किलो बीजों पर छिड़क कर उपचार करें। बीज को छांव में सुखायें एवं बोयें।
2. जीवामृत - जीवामृत सूक्ष्म जीवाणुओं का महासागर है जो पेड़ पौधों के लिए कच्चे पोषक तत्वों को पकाकर उनके लिये भोजन तैयार करते हैं। इसे बनाने के लिए, गौमूत्र 5-10 लीटर, गोबर 10 किलो, गुड़ 1-2 किलो, दलहन आटा 1-2 किलो, एक मुट्ठी जीवाणुयुक्त मिट्टी (100 ग्राम) तथा पानी 200 लीटर, इन सभी सामग्री को एक साथ मिलाकर, ड्रम में जूट की बोरी से ढककर छाया में रखें। सुबह व शाम डंडे से घड़ी की सुई की दिशा में घोलें। 48 घंटे बाद छानकर निम्न प्रकार से दें। इसका प्रयोग सात दिन के अन्दर ही करें।
(क) सिंचाई पानी के साथ:- 1 एकड़ में 200 लीटर जीवामृत सिंचाई करते समय पानी के साथ टपक विधि से या धीमे-धीमे बहा दें।
(ख) छिड़काव द्वारा:- पहला छिड़काव बुवाई के 1 माह बाद 1 एकड़ में 100 लीटर पानी, 5 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। दूसरा छिड़काव 21 दिन बाद 1 एकड़ में 150 लीटर पानी व 10 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। तीसरा व चैथा छिड़काव 21-21 दिन बाद 1 एकड़ में 200 लीटर पानी व 20 लीटर जीवामृत मिलाकर दंे। आखिरी छिड़काव दाने की दूध की अवस्था (डपसापदह ैजंहम) में प्रति एकड़ में 200 लीटर पानी, 5-10 लीटर खट्टी छाछ (मट्ठा) मिलाकर छिड़काव करें।
घन जीवनामृत - घन जीवनामृत, जीवाणुयुक्त सूखी खाद है जिसे बुवाई के समय या पानी के तीन दिन बाद भी दे सकते हैं। बनाने की विधि इस प्रकार है - गोबर 100 किलो, गुड़ 1 किलो, आटा दलहन 1 किलो, मिट्टी जीवाणुयुक्त 100 ग्राम उपर्युक्त सामग्री में इतना गौमूत्र (लगभग 5 ली0) मिलायें जिससे हलवा/पेस्ट जैसा बन जाये, इसे 48 घंटे छाया में बोरी से ढ़ककर रखें। इसके बाद छाया में ही फैलाकर सुखा लें फिर बारीक करके बोरी में भरें। इसका 6 माह तक प्रयोग कर सकते हैं। एक एकड़ खेत में 1 कुन्तल तैयार घन जीवामृत देना चाहिए।
अच्छादन ;डनसबीपदहद्ध - देशी केंचुओं एवं सूक्ष्म जीवाणुओं के कार्य करने के लिये आवश्यक ‘‘सूक्ष्म पर्यावरण’’ उपलब्ध कराने हेतु एवं भूमि की नमी को सुरक्षित करने हेतु भूमि को ढ़कना (आच्छादन) पड़ता है। सूक्ष्म पर्यावरण का आशय है पौधों के बीच हवा का तापमान 25-32 डिग्री, नमी 65-72 प्रतिशत व भूमि सतह पर अंधेरा। जब हम भूमि का काष्ठ पदार्थो से या अन्य प्रकार से आच्छादन करते है तो सूक्ष्म पर्यावरण का निर्माण होता है जिसमें देशी केंचुओं व सूक्ष्म जीवाणु को उपयुक्त वातावरण मिलता है एवं भूमि की नमी का वाष्पन नहीं हो पाता। बाद में काष्ठाच्छादन भूमि में अपघठित होकर उर्वरा शक्ति का निर्माण करता है। सहफसलों द्वारा भी भूमि को सजीव आच्छादन के द्वारा ढ़का जा सकता है।
बेड व नाली व्यवस्था द्वारा जल की बचत - पौधों की जडं़े सीधे पानी नहीं लेतीं, बल्कि मिट्टी कणों के बीच 50 प्रतिशत हवा व 50 प्रतिशत वाष्प के मिश्रण (वाफसा) होते हैं, जिन्हें पौधे लेते हैं। अतः सतह से ऊचे तैयार बेड पर फसलो को नालियों द्वारा पौधों की आवश्यक सिंचाई वाफसा के रुप में उपलब्ध कराने से पानी की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है। नालियों को भी आच्छादन से ढ़क दिया जाता है, जिससे नमी का वाष्पन कम से कम हो।
बहुफसली पद्धति - उचित मिश्रित फसलों को लेने पर फसलों की जड़े अलग-अलग स्तर से उचित खुराक ले लेती हैं एवं सहअस्तित्व के आधार पर रोगों एवं कीटों से बचाव तथा नाइट्रोजन का बटवारा कर लेती हैं। उचित फसल चक्र अपनाने से भूमि को नाइट्रोजन स्वतः ही प्राप्त हो जायेगा, ऊपर से यूरिया देने की आवश्यकता नहीं होगी।
फसल सुरक्षा - इस पद्धति में कीट नियंत्रको की आवष्यकता ही नहीं पड़ती क्योंकि कीट आते ही नहीं, फिर भी आवश्यकता पड़ने पर गोबर, गौमूत्र, छाछ एवं वनस्पतियों द्वारा तैयार नीमास्त्र, ब्रह्यास्त्र, अग्नियास्त्र, फफूदनाशक, दशपर्णी अर्क आदि बनायी जाती है। इस प्रकार स्वयं तैयार कीट नियन्त्रकों का प्रयोग कर फसल सुरक्षा कर सकते हैं।
विशेष प्रयोग - शाहजहांँपुर प्रशिक्षण वर्ग में वहांँ स्थित गन्ना शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने भी पूरे समय रहकर प्रशिक्षण लिया और उसके बाद उसका प्रयोग गन्ने की खेती में स्वयं गन्ना संस्थान में भी एक एकड़़ में प्रारम्भ किया गया है तथा क्षेत्र के अन्य प्रयोगधर्मी पांच किसानों के यहांँ भी संस्थान के निरीक्षण में एक-एक एकड़ खेत के प्रयोग प्रारम्भ कराए गये है, जिससे आवश्यक समस्त आंकड़े एकत्र किए जा सकें। इस प्रयोग में फसल की बुवाई अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में की गई है, जिसकी अन्य  विशेष बातें इस प्रकार हैं -
1. गन्ना उŸार-दक्षिण की लाइनों में बोया गया है।
2. गन्ने की लाइन की दूरी 8 फिट है तथा गन्ने से गन्ने की दूरी 4 फिट रखी है।
3. गन्ने की लाइनों के मध्य चार लाइन मसूर तथा उनके मध्य एक लाइन सरसों की बोई गई है।
4. बुवाई से पूर्व खेत में 4 कुन्तल घनजीवामृत का प्रयोग किया गया है। जीवामृत का प्रयोग सिंचाई के साथ किया जायेगा।
5. फसल की बुवाई अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में सभी बीजों को बीजामृत में शोधित कर की गई।
6. नौ अक्टूबर को क्षेत्र के प्रमुख किसानों तथा लोक भारती के कार्यकर्ताओं नें गन्ना शोध संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ खेत का निरीक्षण किया, तब तक सभी फसलें अच्छी तरह जम चुकी हैं और सभी पौधे स्वस्थ, बढ़वार युक्त हंै।
7. साथ में ही एक एकड़ रासायनिक परम्परागत पद्धति से गन्ना बोया गया है, जिसमें रासायनिक खाद के कारण घासों की मात्रा अधिक है।
8. अन्य खेतों में सहफसली के रूप में मसूर के स्थान पर चना, मटर का भी प्रयोग किया गया है।
ध्यान देने योग्य बातें -
- प्राकृतिक कृषि में देशी बीज ही प्रयोग करें।
- प्राकृतिक कृषि में किसी भी भारतीय नस्ल का देशी गोवंश ही प्रयोग करें। जर्सी या होलस्टीन का प्रयोग हानिकारक है।
- जीवाणुयुक्त मिट्टी हेतु वट वृक्ष, पीपल के नीचे या मेंड़ की मिट्टी लें।
- पेड़ पौधों व फसल की पक्ंितयों की दिशा उत्तर दक्षिण होगी।
- दलहन फसलों की सहफसली खेती करना अच्छा रहता है।
- वर्मी कम्पोस्ट बनाने में जो आयसेनिया फीटिडा नामक जन्तु प्रयोग होता है, जो केंचुआ नहीं है। यह जन्तु कैडमीयम, आर्सेनिक, पारा सीसा आदि विषैले तत्व छोड़ता है, जो कि भूमि के लिये अत्यन्त हानिकारक हैं।
माडल कृषक -
1. हिमांशु गंगवार, फर्रुखाबाद, उ0प्र0-09319856993
2. श्री किशन जाखड़, हनुमानगढ़,
राजस्थान - 09414091200
3. ठाकुर धरमपाल सिंह, थाना भवन, शामली,
उ0प्र0 - 09627376363
4. आचार्य श्याम बिहारी, झाॅसी, उ0प्र0-09889196787
5. श्री विवेक चतुर्वेदी, कानपुर, उ0प्र0-09839039997
6. श्री कालूरामजी, मुजफ्फरनगर, उ0प्र0-09758571008
7. श्री राजकुमार आर्य, लाडवा, कुरुक्षेत्र-09416914051
8. श्री आर0एस0 यादव, चित्रकूट, उ0प्र0-09455712183
9. श्री नरेन्द्र सिंह ठाकुर, टीकमगढ़, म0प्र0 -08720019830
10. श्रीकृष्ण चैधरी, हरैया, बस्ती, उ0प्र0-9919257534
11. श्री गोपाल भाईजी, अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान, चित्रकूट, उ0प्र0-09450221331
अभियान के नारें -
- गाँव का पैसा गाँव में, गाँव का पैसा शहर में नहीं, शहर का पैसा गाँव में।
- एक गाय देशी 10-30 एकड़ खेती।
- प्राकृतिक खेती के दो उपाय- देशी केंचुआ देशी गाय।
- सहफसलो से मिलेगी लागत, मुख्य फसल होगी सब लाभ।
- कम पानी होगी खेती, किसान बनेगा तब खुशहाल।
- न खाद, न कीटनाशक, न कम्पनी, न बाजार। न होगी किसान को कर्ज की दरकार।
- बच्चे पियेंगे गाय का दूध, खेती करायेंगा गोबर गौमूत्र।
- गाय बैल बचेंगे अन्न मिलेगा।
- गाय बैल बचेंगे-किसान बचेगा, किसान बचेगा- गाँव बचेगा।
- गाँव बचेगा- देश बचेगा। ु