भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी गंगा जो भारत और बांग्लादेश में मिलाकर 2510 किमी की दूरी तय करती हुई उत्तरांचल में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू-भाग को सींचती है, देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं बल्कि जन-जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि 16 वीं तथा 17 वीं शताब्दी तक गंगा-यमुना प्रदेश घने वनों से आच्छादित था। इन वनों में जंगली हाथी, भैंसा, गैंडा, शेर, बाघ आदि का शिकार होता था। गंगा का तटवर्ती क्षेत्र अपने शांत व अनुकूल पर्यावरण के कारण रंग-बिरंगे पक्षियों का संसार अपने आंचल में संजोए हुए है। इसमें मछलियों की 140 प्रजातियाॅं, 35 सरीसृप तथा इसके तट पर 42 स्तनधारी प्रजातियाॅं पाई जाती हैं। इस नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियाॅं तो पाई ही जाती हैं मीठे पानी वाले दुर्लभ डालफिन भी पाए जातें हैं। डालफिन की दो प्रजातियाॅं गंगा में पाई जाती हैं। जिन्हें गंगा डालफिन और इरावदी डालफिन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा गंगा में पाई जाने वाले शार्क की वजह से भी गंगा की प्रसिद्धि है। गंगा तट के तीन बड़े शहर हरिद्वार, इलाहाबाद एवं वाराणसी जो तीर्थ स्थलों में विशेष स्थान रखते है। इस कारण यहाॅं श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या निरंतर बनी रहती है और धार्मिक पर्यटन में महत्वपूर्ण योगदान करती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते है। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावजूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। गंगा के तट पर घने बसे औद्योगिक नगरों के नालों व दूषित जल (सीवर) की गंदगी सीधे गंगा नदी में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों में भारत सरकार और जनता की चिंता का विषय बना हुआ है। औयोगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने भी गंगा जल को बेहद प्रदूषित किया है। विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की 12 प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। इस गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए घडि़यालों की भी मदद ली जा रही है। शहर की गंदगी को साफ करने के लिए संयंत्रों को लगाया जा रहा है और उद्योगों के कचरों को इसमें गिरने से रोकने के लिए कानून बने हैं। ‘‘पर्यावरण (संरक्षा) अधिनियम 1986’’ के अनुच्छेद 3 के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार को अधिकार दिये गये हैं कि वह विभिन्न पर्यावरणीय पहलुओं के दृष्टिगत गुणवत्ता के मानक तय कर सकती हैं - अनुच्छेद 3 (2,पपप), तथा विभिन्न प्रदूषण के स्रोत स्थलों (यथा उद्योग, नगर पालिकाएं आदि) के उत्प्रवाहों के लिए मानक तय कर सकती है - अनुच्छेद 3 (2,पअ)। इसी अधिनियम के अनुच्छेद 6 के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार को विभिन्न स्थलों व उपयोगों के लिए प्रदूषण संबंधी गुणवत्ता मानक तय करने-अनुच्छेद 6 (2 अ), व विभिन्न स्थलों के लिए पर्यावरणीय प्रदूषकों (शोर सहित) की अधिकतम सघनता की सीमा तय करने अनुच्छेद 6 (2 ब), के अधिकार दिये गये हैं। इस प्रकार यह अधिनियम जल के विभिन्न उपयोगों के लिए प्रदूषण के अधिकतम स्तर तथा प्रदूषण उत्पन्न करने वाली इकाईयों के उत्प्रवाह में प्रदूषक तत्वों की अधिकतम सीमा तथा वातावरण में प्रदूषकों की अधिकतम सीमा तय करने के निमित्त है। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण तथा राज्य पर्यावरण नीति 2010 (विचाराधीन) के अन्तर्गत केवल अशोधित उत्प्रवाह पर प्रतिबंध लगाते हुए शोधित उत्प्रवाह को नदी में डालना वर्तमान प्राविधानों के अनुरूप किया गया है। पुनः सरकार द्वारा पवित्र नदी गंगा में वर्ष 2020 की समय सीमा में सीवर व कचरा नही डाला जायेगा की घोषणा तो की गई है परन्तु वर्ष 2010 समाप्ति की ओर है और समग्र रणनीति की प्रगति धीमी लग रही है। गंगा जलवायु परिवर्तन से अत्यधिक प्रभावित नदियो में से एक है तथा जलवायु परिवर्तन पर अन्र्तराष्ट्रीय पैनेल की रिपोर्ट श्ज्ीम न्छ ब्सपउंजम ब्ींदहम ब्वदमितमदबमष् पद ष्ठंसपश् के अनुसार यह अनुमान है कि यदि जलवायु परिवर्तन की स्थिति यथावत रही तो वर्ष 2030 तक ग्लेशियर का आकार 80 प्रतिशत कम हो जायेगा जो कि मीठे पानी का óोत है। ग्लोबल वार्मिंग से हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे है। अतः लम्बी अवधि मे जल बहाव कम हो सकता है जिससे प्रदूषण की सघनता बढेगी। पुनः शोधित उत्प्रवाह डालने हेतु शोधित संयत्रो का अविराम कार्य करना असंभव है अतः संयत्रांे के खराब होने की स्थिति में एक यथार्थ परक जमीन से जुडी रणनीति बनाने की शीघ्र आवश्यकता है जिसे क्षेत्रीय ग्रामीणों की सहायता से ही बनाया जा सकता है। अतः मिशन क्लीन गंगा की सफलता हेतु प्रत्येक स्तर पर जन सहभागिता अति आवश्यक है। ु - पर्यावरण विषेशज्ञ, स्वारा/पैक्ट





