उत्तराखंड की भीषण आपदा और भयानक तबाही ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह प्रकृतिक आपदा नहीं, बल्कि अन्धाधुन्ध विकास के नाम पर प्रकृति के साथ किए गये अत्याचार का प्रतिकार है। विकास के नाम पर उपजी परियोजनाओं ने पर्वत के नैसर्गिक स्वरूप को बिगाड़ दिया जिसने मौसम का मिजाज बदलने में अहं भूमिका निभाई। प्रकृति अपनी नैसर्गिक अवस्था में वायुमण्डल में जमा वाष्प को समान रूप से वितरित करती है, परन्तु मानवीय हस्तक्षेप से इसमें बाधा उत्पन्न होती है और उसका नतीजा बादलों के फटने के रूप में सामने आता है।
हिमालय क्षेत्र में उत्तर भारत का सदावहार व सघन वन था, जो अब नष्ट हो चुका है। भूमि को सहेजने और संवारने में कारगर वनस्पतियों का विनाश 10वीं सदी में फ्रेडरिक बिल्सन के समय ही शुरू हो गया था, जब हिमालयन वृक्ष बांझ को नष्ट कर उसकी जगह चीड़़ के जंगलों में तब्दील कर दिया गया। परिणामस्वरूप मृदा की गुणवत्ता नष्ट हुई, वर्षा जल को संजोने की क्षमता घटी और उसके कारण धीरे-धीरे पहाड़ी नाले व झरने कमजोर पड़ते गये, उपयोगी वनस्पितियांँ नष्ट प्राय हो गईं, अन्ततः जैवविविधता की अपूरणीय क्षति हुई।
हिमालय का सौंदर्य और ऐश्वर्य ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन साबित हुआ। विकास के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया किया, विस्फोंटों का बेतहाशा इस्तेमाल कर पहाड़ काटे व लम्बी सुरंगें बनाई गईं। वर्तमान समय उŸाराखण्ड़ में 70 से अधिक परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिनके और बढ़ने की सम्भावना है।
यह सब पहाड़ों को कमजोर करने के लिए काफी था। वस्तुतः यह स्वार्थ, लालच और भ्रष्टाचार के बोये बीज की उपज है। पर अब! यह सरकार और समाज के चेतने और जागने का वक्त है। प्रकृति और उसकी धाराओं के साथ छेड़-छाड़ बंद कर सृजन के अविरल और निर्मल मार्ग को अपनाना ही उपयुक्त निदान है। - पर्यावरण विशेषज्ञ
हिमालय क्षेत्र में उत्तर भारत का सदावहार व सघन वन था, जो अब नष्ट हो चुका है। भूमि को सहेजने और संवारने में कारगर वनस्पतियों का विनाश 10वीं सदी में फ्रेडरिक बिल्सन के समय ही शुरू हो गया था, जब हिमालयन वृक्ष बांझ को नष्ट कर उसकी जगह चीड़़ के जंगलों में तब्दील कर दिया गया। परिणामस्वरूप मृदा की गुणवत्ता नष्ट हुई, वर्षा जल को संजोने की क्षमता घटी और उसके कारण धीरे-धीरे पहाड़ी नाले व झरने कमजोर पड़ते गये, उपयोगी वनस्पितियांँ नष्ट प्राय हो गईं, अन्ततः जैवविविधता की अपूरणीय क्षति हुई।
हिमालय का सौंदर्य और ऐश्वर्य ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन साबित हुआ। विकास के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया किया, विस्फोंटों का बेतहाशा इस्तेमाल कर पहाड़ काटे व लम्बी सुरंगें बनाई गईं। वर्तमान समय उŸाराखण्ड़ में 70 से अधिक परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिनके और बढ़ने की सम्भावना है।
यह सब पहाड़ों को कमजोर करने के लिए काफी था। वस्तुतः यह स्वार्थ, लालच और भ्रष्टाचार के बोये बीज की उपज है। पर अब! यह सरकार और समाज के चेतने और जागने का वक्त है। प्रकृति और उसकी धाराओं के साथ छेड़-छाड़ बंद कर सृजन के अविरल और निर्मल मार्ग को अपनाना ही उपयुक्त निदान है। - पर्यावरण विशेषज्ञ





